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कामदा एकादशी का व्रत आज 19 अप्रैल को : व्रत रखने से राक्षस योनि की प्राप्ति नहीं होती

कामदा एकादशी का व्रत आज 19 अप्रैल को: व्रत रखने से राक्षस योनि की प्राप्ति नहीं होती
सीएन, हरिद्वार।
कामदा एकादशी का व्रत 19 अप्रैल 2024 को रखा जाएगा। हिंदू पंचांग के अनुसार एकादशी तिथि का प्रारंभ 18 अप्रैल को शाम में 5 बजकर 32 मिनट पर होगा और इसका समापन 19 अप्रैल को रात 8 बजकर 5 मिनट पर होगा। उदया तिथि के मुताबिक, एकादशी का उपवास और पूजा 19 अप्रैल को ही किया जाएगा। वहीं एकादशी व्रत का पारण की बात करें तो इसके लिए शुभ मुहूर्त 20 अप्रैल को सुबह 5 बजकर 20 मिनट से लेकर रात 8 बजकर 26 मिनट तक रहेगा। हिंदू धर्म में हर एकादशी का विशेष महत्व होता है। हर महीने में 2 एकादशी आती हैं। ऐसे में साल भर में कुल मिलाकर 24 एकादशी होती है। चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को कामदा एकादशी का व्रत रखा जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस व्रत को रखने से व्यक्ति को सभी दुखों से मुक्ति मिलती है। साथ ही व्यक्ति को सुख समृद्धि और वैभव की प्राप्ति होती है। ऐसा कहा जाता है कि एकादशी व्रत को रखने से व्यक्ति को राक्षस योनि की प्राप्ति नहीं होती बल्कि मोक्ष मिलता है। कामदा एकादशी का फलदा एकादशी का नाम से जाना जाता है। शास्त्रों के अनुसार कामदा एकादशी का व्रत रखने से व्यक्ति की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। साथ ही आपके घर परिवार में सुख समृद्धि बनी रहेगी। इस व्रत को रखने से व्यक्ति को अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। साथ ही एकादशी तिथि पर मां लक्ष्मी की भी उपासना करनी चाहिए। मां लक्ष्मी की उपासना करने से व्यक्ति को धनए ऐश्वर्य और सौभाग्य की प्राप्ति होती है। कामदा एकादशी का दिन सुबह जल्दी उठें और अपने इष्ट देवी देवता का ध्यान करें। इसके बाद हो सके तो पीले रंग के वस्त्र धारण करें। फिर एक लकड़ी की चौकी पर साफ कपड़ा बिछाएं। इसके बाद भगवान विष्णु को अक्षत, हल्दी, चंदन और फूल अर्पित करें। इसके बाद घी का दीपक जलाकर भगवान विष्णु की आरती करें। साथ ही विष्णु चालीसा का पाठ भी करें। साथ ही इस दिन सुबह और शाम दोनों समय तुलसी माता के सामने घी का दीपक जलाएं। ऐसा करने से भगवान विष्णु जल्दी प्रसन्न होते हैं।
कामदा एकादशी की व्रत कथा
एक बार युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से चैत्र शुक्ल एकादशी की महिमा बताने का निवेदन किया। तब भगवान श्रीकृष्ण ने उनसे कहा कि चैत्र शुक्ल एकादशी को कामदा एकादशी के नाम से जानते हैं। एक बार राजा दिलीप ने वशिष्ठ ऋषि से भी यही सवाल किया था तो उन्होंने जो बताया, वही आप से कहता हूं। भोगीपुर में पुंडरीक नाम का राजा राज करता था। उस नगर में गंधर्व, अप्सराएं और किन्नर रहते थे। उस राज्य में ललित और ललिता नाम के स्त्री और पुरुष रहते थे। एक बार पुंडरीक की सभा में ललित गंधर्वों के साथ गान कर रहा था। तभी उसका ध्यान ललिता पर चला गया और उसका स्वर बिगड़ गया। गान भी खराब हो गया। तब पुंडरीक ने उस पर नाराज हो गया। उसने ललित को राक्षस बनकर अपराध का फल भोगने का श्राप दे दिया। उसके प्रभाव से ललित विशाल राक्षस बन गया और कष्ट भोगने लगा। इस बारे मे ललिता को पता चला। तो वह दुखी हो गई और एक दिन श्रृंगी ऋषि के आश्रम में गई और अपनी व्यथा उनसे कही। तब श्रृंगी ऋषि ने कहा कि तुम परेशान न हो। चैत्र शुक्ल की एकादशी आने वाली है। कामदा एकादशी का व्रत रखकर उसका पुण्य अपने पति ललित को दे दो। इससे वह राक्षस योनि से मुक्त हो जाएगा और राजा का श्राप भी प्रभावहीन हो जाएगा। ऋषि के सुझाव पर ललिता ने कामदा एकादशी का व्रत रखा और विधि विधान से भगवान विष्णु की पूजा की। द्वादशी के दिन उसने भगवान विष्णु से प्रार्थना की कि इस व्रत का पुण्य उसके पति को प्राप्त हो जाए और वह राक्षस योनि से मुक्त हो जाए। भगवान विष्णु की कृपा से ललित राक्षस योनि से मुक्त हो गया। वशिष्ठ मुनि ने राजा दिलीप से कहा कि जो भी इस व्रत को करता है वह पाप मुक्त हो जाता है। इस व्रत कथा को सुनने और पढ़ने मात्र से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है।

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