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नैनीताल

नाम लेने भर से उत्सव नहीं आयोजित हो जाते…नैनीताल साहित्य उत्सव पर साहित्यकार बटरोही की बेवाक टिप्पणी

प्रो. लक्ष्मण सिंह बिष्ट बटरोही, नैनीताल। खेत के रेसॉर्ट में कुछ श्वेतकेशी लोग नैनीताल को उत्सव के रूप में मनाने चले थे. मगर वहाँ कोई नैनीताल नहीं था, इस शहर का इंग्लिस्तानी भ्रम जरूर था. सुबह-सुबह एक सज्जन अपने वीडिओ में बतिया रहे थे कि उनका समूचा सपनीला बचपन नैनीताल के सैंट जोसेफ में बीता था, मगर आज इतने सालों के बाद यहाँ आकर देखा तो पाया कि यह शहर अब पाँव टिकाने लायक नहीं रह गया है!… वो लानत दे रहे थे : ‘क्या कर रहे हैं यहाँ के शासक, प्रशासक, यहाँ के लोग और नौजवान?… बगल में ही यूपी के योगी आदित्यनाथ ने अपने प्रदेश को कैसे चमका कर रख दिया है, मगर नैनीताल आज बुरी तरह गंधा रहा है… कहाँ है हमारा वह शहर, जिसे हम कभी छोड़कर गए थे। तीन दिनी यह उत्सव साहित्योत्सव के रूप में मनाया गया, एक ऐसा लिट्फेस्ट,  जिसमें कहीं भी नैनीताल का न अतीत था, न वर्तमान; न यहाँ की समृद्ध सांस्कृतिक थाती, न क्षेत्र के साहित्यकार और संस्कृतिकर्मी; न थोकदार नर सिंह बोरा थे, न हेनरी रैमजे, ट्रेल, पीटर बैरन, चिलम शौज्यू थे; न फांसी गधेरा, गोरख्योल, सुबह-सुबह नाक से लेकर माथे तक पिठ्याँ चमकाए नंदादेवी-पाषाणदेवी के दर्शन के लिए भागती औरतें थीं, न शरद-ऋतु में टीन की छतों में तेल मलकर बड़ी-मुंगोड़ी डालती प्रौढ़ायें थीं और न बाज़ार के दुमंजिलों पर से पर्यटकों को देखकर सौल-कठौल करती घरेलू औरतें लडकियाँ!…जाहिर है, वह अतीत अब लौटकर नहीं आ सकता, जब कि हमारे ये श्वेतकेशी नए ज़माने से आज के नैनीताल को चीन्हने के लिए हू-ब-हू उसे स्वीकार करने के लिए गुहार लगा रहे हैं. अब आज के दौर में उस पुराने नैनीताल के गुण-गान का क्या मतलब हो सकता है?… इस बीच तो एक नया नैनीताल बन चुका और बन रहा है. नया नैनीताल तो हरी आँखों के सामने है और उसका वर्तमान तो आने वाली नस्लों के माध्यम से ही निर्मित होना है, उनके सहयोग के बिना हम अपने शहर के भविष्य की प्रमाणिक तस्वीर कैसे खींच सकते हैं? आज का यह उत्सव हमारे श्वेतकेशी बुजुर्गों ने दरअसल, अपनी पक चुकी दाढ़ी की खूबसूरती को अपनी नयी पीढ़ी के सामने प्रदर्शित करने के लिए आयोजित किया था. इस बीच अर्जित अकूत संपत्ति और वैभव से लबालब उनका यह चेहरा जाहिर है, उन्होंने वर्षों की साधना से सँवारा-पोषा था; उसका फ़िल्मी मेकअप किया था; उस पर किसी तरह की टिप्पणी करने का हमें भला क्या अधिकार हो सकता है; मगर मेरे सामने तो आज के नैनीताल के बेहद खूबसूरत और कर्मठ कलाकर्मी और नौजवान चेहरे साक्षात् बैठे हैं, जिन्होंने इस शहर की सांस्कृतिक परंपरा को रात-दिन की मेहनत से संजोये रखकर अपने सपनों के जरिए आज के मुकाम तक पहुँचाया है. आप ही बताइए, चुक गए बूढ़े लोगों की इस बारात को हम अपने इस संस्कृति-समृद्ध शहर की पहचान के रूप में भला कैसे खुद के वर्तमान को सौंप सकते हैं? मजेदार बात यह है कि ऐसा उन्होंने किसी गलत मंशा से नहीं किया है. उन्हें दरअसल इतना ही अपना अतीत याद है, स्मृति और वर्तमान की तो उन्हें कोई जानकारी है ही नहीं. जो है ही नहीं, उसे ये महान संस्कृतिकर्मी भला कैसे पकड़ सकते हैं? करीब एक सदी के इन बीते वर्षों में नैनीताल में एक-से-एक रचनाकार, नाट्यकर्मी, लोकधर्मी स्वर, पत्रकार, अभिनेता, अभिनेत्रियाँ, गीतकार, वर्षों के  रियाज़ से उभरे संगीतकार, प्रेरक ‘मिस, मिसेज और मिस्टर नैनीताल’; मीडिया विशेषज्ञ, भाषा और संस्कृति से जुड़े आयामों को एकदम अछूता आकार देने वाले अनगिनत प्रयास, कला-शैलियाँ सामने आई हैं, जिन पर इन मोतियाबिंदी बूढ़ी आँखों की नज़र भला कैसे पड़ सकती थी ?किसी ज़माने में सैंट-जोसेफ और शेरवुड के युवा नैनीताल से जुड़े ग्लैमर के प्रतीक रहे होंगे ये लोग, मगर वो लोग तो अपनी छवि को भुनाने के लिए जवान होते ही मायानगरी की चकाचौंध में डूब गए थे; अपनी जड़ों से कट गए थे सो अलग. दुर्भाग्य यह है कि वो लोग आज के नौजवानों से उनके पुराने वैभव को अपनाकर हमारे शहर का उत्सव मनाने की नसीहत दे रहे हैं.  शायद यह भी गलत नहीं है, गलत यह है कि वो लोग ऐसा करके नए नैनीताल को खुले आम अपमानित कर रहे हैं. आखिर किसने दिया उन्हें यह अधिकार? यह फतवा देने का अधिकार कि ‘दो लाख की अस्थायी/स्थायी जनसंख्या वाले यहाँ के लोग, सरकारी- अर्धसरकारी कर्मचारी, प्रशासक, स्वयंसेवी संगठन, पुलिस और अर्द्ध-सुरक्षा दल, सब सोये हुए मुर्दा लोग हैं, जो उनके शहर की चेतना जगाने की कोई पहल नहीं कर रहे हैं!  वास्तविकता यह है कि उनके लिए तो नैनीताल का एकमात्र अर्थ है इन श्वेतकेशी महानुभावों का अतीतराग! जिस खुशवंती दिल्ली का मॉडल ये स्वयंभू कलाकार अपने माथे पर पोस्टर की तरह चिपकाये हर वक़्त रोब ग़ालिब किये रहते हैं, दरअसल वह किताब विलासी नवाबों, रंडियों, सत्तासीनों के वर्चस्व को अपदस्त करके खुद को स्थापित करने भर का इतिवृत्त नहीं है. करवट लेती भारतीय अस्मिता की बानगी है, जिसे आने वाले वर्षों में भारतीय संस्कृति की परिभाषा रचनी है. एक राजधानी का इतिहास बनना है; और राजधानी के महल का ढांचा संस्कृति और स्मृति के अनेक कोनो-अंतरों से होकर गुजरता है; जिसे आम लोगों के सरोकारों से देखने की दरकार होती है. 1927 में नैनीताल के डिप्टी कमिश्नर रहे जे. एम. क्ले. ने अपनी पुतक ‘नैनीताल: ए हिस्टोरिकल एंड डिस्क्रिपटिव अकाउंट’ में लिखा था कि ‘1829 में जॉर्ज विलियम ट्रेल और 1941 में नैनीताल आए पीटर बैरन से पहले नैनीताल का कोई इतिहास नहीं था’. तब से लेकर आज तक औपनिवेशिक मानसिकता के सारे इतिहासकार यही तोता-रटंत लगाते आ रहे हैं. इतिहास को पढ़ने, देखने और महसूस करने की इस बीच जाने कितनी नयी दृष्टियाँ उभरी हैं, मगर मोतियाबिंद लगी आँख से कैसे वास्तविकता दिखाई दी सकती है? कम-से-कम पढ़े-लिखे प्रबुद्ध लोगों से तो इतिहास की अंधी लकीर की वास्तविकता को पहचानने की उम्मीद की जाती है, वो भी पुरानी लकीर पीटते चले जा रहे हों तो उन्हें कैसे दृष्टि-संपन्न कलाकार कहा जा सकता है; कैसे वो अपनी नयी नस्लों के सामने परंपरा का वास्तविक मार्ग प्रशस्त कर सकेंगे? कथित विद्वानों के लिए इशारा ही काफी होना चाहिए.

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