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पर्यावरण

संकट में होगा भारत जब गंगा 2050 तक सूख जाएगी, 87 साल में गंगोत्री का ग्लेशियर 1700 मीटर पिघला

संकट में होगा भारत जब गंगा 2050 तक सूख जाएगी, 87 साल में गंगोत्री का ग्लेशियर 1700 मीटर पिघला
सीएन, नईदिल्ली।
प्रयागराज में गंगा-यमुना के संगम पर महाकुंभ चल रहा है। अब तक 56 करोड़ से अधिक श्रद्धालु डुबकी लगा चुके हैं। लेकिन इस बीच एक सवाल भी उठ रहा है कि क्या गंगा 2050 तक सूख जाएगी, ये सवाल इस वजह से किए जा रहे हैं क्योंकि यूनाइटेड नेशन्स की ताजा रिपोर्ट इसी तरफ इशारा कर रही है। दूसरा पुराण में भी 5000 साल बाद गंगा के वापस लौट जाने की बात भी लिखी है। गंगोत्री ग्लेशियर के पिघलने से गंगा नदी के भविष्य पर खतरा मंडरा रहा है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार तक गंगा का जलस्तर ऐतिहासिक रूप से कम हो सकता है। पिछले 87 वर्षों में ग्लेशियर 1700 मीटर तक पिघल चुका है। वैज्ञानिकों का मानना है कि अगर यही स्थिति रही तो गंगा सूख सकती है, जिससे महाकुंभ जैसे धार्मिक आयोजन प्रभावित होंगे। यही नही 50 करोड़ लोग पानी को तरसेंगे। यूनाइडेट नेशंस ने साल 2025 को इंटरनेशनल ईयर ऑफ ग्लेशियर्स घोषित किया है। इसकी वजह दुनियाभर में ग्लेशियर का जलवायु परिवर्तन की वजह से तेजी से पिघलना है। विश्व धरोहर स्थलों में 1 लाख 86 हजार ग्लेशियरों की पहचान की गई है। ये ग्लेशियर 66 हजार वर्ग किमी क्षेत्र में फैले हैं। ये कुल ग्लेशियर का 10 प्रतिशत है। हिमालय सहित विश्व भर में 10 वर्ग किमी क्षेत्र में फैले ग्लेशियर अगले 25 वर्षों में सूख जाएंगे। वहीं 100 वर्ग किमी क्षेत्र में फैले ग्लेशियर अगले 75 साल में सूख जाएंगे। विश्व धरोहर ग्लेशियर हर साल औसतन 58 बिलियन टन बर्फ खो देते हैं। इससे समुद्र का जलस्तर हर साल 4.5 फीसदी की दर से बढ़ रहा है। हिमालय के ग्लेशियर से निकलने वाली दो धाराओं अलकनंदा और भागीरथी के देवप्रयाग में संगम से गंगा अस्तित्व में आती है। अलकनंदा की धारा केदारनाथ स्थित सतोपथ ग्लेशियर से निकलती है। वहीं गंगा की मुख्यधारा मानी जाने वाली भागीरथी गंगोत्री से निकलती है। हालांकि वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के विशेषज्ञों के मुताबिक गंगा की मुख्य जलधारा अलकनंदा ही है। इसकी वजह अलकनंदा की विशाल जलराशि है। अलकनंदा में रुद्रप्रयाग तक बद्रीनाथ से निकलने वाली धौलीगंगा, नंदाकिनी, पिंडर और मंदाकिनी की धाराएं मिलती हैं। ये अलकनंदा का औसत प्रवाह 15,516 घन फीट प्रति सेकेंड तक पहुंचा देती है। देवप्रयाग तक 195 किमी की दूरी अलकनंदा 20 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से तय करती है। जबकि भागीरथी 16 किमी प्रति घंटा की रफ्तार से 205 किमी की दूरी तय कर देवप्रयाग पहुंचती हैं। भागीरथी का औसत प्रवाह 9,103 घन फीट प्रति सेकेंड है। यूनाइटेड नेशंस और वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी की ताजा रिपोर्ट बताती है कि दोनों जलधाराओं का मुख्य स्रोत हिमालय के ग्लेशियर ही हैं। जो ग्लोबल वार्मिंग के चलते वर्तमान समय में 38 मीटर प्रति वर्ष की दर से पिघल रही हैं। 1996 से 2016 तक यहां के ग्लेशियर के पिघलने की रफ्तार 22 मीटर प्रतिवर्ष थी।मिजोरम विश्वविद्यालय आइजोल के प्रोफेसर विशंभर प्रसाद सती और सुरजीत बनर्जी ने हिमालय में पिछले 38 साल में होने वाले बदलावों अध्ययन किया है। मूल रूप से चमोली के रहने वाले प्रोफेसर विशंभर प्रसाद सती अपनी रिपोर्ट में बताते हैं कि हिमालय तेज बदलाव से गुजर रहा है। अभी कई बदलाव दिख रहे। हिमालय क्षेत्र के 135 जिलों के मौसम में बड़ा बदलाव आया है। 1980 से 2018 की अवधि में 4640 माैसम संबंधी घटनाएं दर्ज हुई हैं। इसमें भूस्खलन और बादल फटने के साथ भारी बारिश और बाढ़ की कुल 2211 घटनाएं हुईं। इसमें भारी बर्फबारी की 1486 घटनाएं और शीतलहर की 303 घटनाएं शामिल हैं। पूर्वी हिमालय की तुलना में पश्चिमी हिमालयी क्षेत्र में 1990 के दशक के बाद भारी बर्फबारी कम हुई है। वहीं भारी बारिश और बाढ़ के मामले बढ़े हैं। यूपी के बिजनौर में पिछले 3 साल से लगातार बाढ़ आ रही है। सबसे खतरनाक यह है कि बाढ़ तेजी से आती हैए लोगों को संभलने तक का मौका नहीं मिलता। अमरोहा के तिगरी में गंगा की जलधारा तीन से चार किमी दूर हो गई है। प्रयागराज में भी गंगा कई धाराओं में बंट जाती है। बीच में रेत के टापू निकल आते हैं। इस बार कुंभ के लिए प्रशासन ने गंगा नदी की गहराई कर एक धारा बनानी पड़ी। बनारस में जो गंगा के घाट, जो 600 मीटर तक होते थे। अब वे सिमट कर 300.400 मीटर रह गए हैं। अभी ग्लेशियर पिघलने से नदियों का जलस्तर तेजी से बढ़ेगा। इसका असर मैदानी क्षेत्रों में बाढ़ और भूस्खलन से होगा। वर्ष 2100 के बाद नदियों की जलधारा पतली होने लगेगी। ग्लेशियर पर कई झीलें निर्मित होंगी। अभी ऐसी 40 झीलें हैं जो आगे केदारनाथ की तरह फट कर बड़ी तबाही मचाएंगी। ग्लेशियर पिघलने से समुद्र का जलस्तर प्रतिवर्ष 4.5 फीसदी यानी 3.2 मिमी की दर से बढ़ रहा है। समुद्र के कई तट और द्वीप डूब जाएंगे। गंगा-यमुना से यूपी सहित देश के 40 करोड़ लोगों को पेयजल की सप्लाई होती है। यहां भी दिक्कत आएगी। वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालय जियोलॉजी ने हिमालय के गंगोत्री.यमुनोत्री सहित 650 ग्लेशियरों पर 4 दशकों के दौरान बर्फ पिघलने का विश्लेषण किया है। इसकी रिपोर्ट बताती है कि वर्ष 1975 से 2000 के बीच हर साल औसतन 4 बिलियन टन बर्फ पिघल रही थी। 2000 से 2016 के बीच ये रफ्तार दोगुनी हो गई। इसकी वजह तापमान में 1 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी है। डेटा संग्रह और एनालिसिस को बढ़ाने के लिए वैश्विक ग्लेशियर निगरानी प्रणालियों का विस्तार किया जा रहा है। ग्लेशियर से संबंधित खतरों के लिए प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली विकसित करना। ग्लेशियर.निर्भर क्षेत्रों में स्थायी जल संसाधन प्रबंधन को बढ़ावा देना। ग्लेशियर पर्यावरण से संबंधित सांस्कृतिक विरासत और पारंपरिक ज्ञान को संरक्षित करना। कार्बन उत्सर्जन को घटाकर ग्लोबल वार्मिंग को 1.5 डिग्री सेल्सियस के औसत पर लाना।
देवी भागवत पुराण में गंगा के सूखने की कहानी
देवी भागवत पुराण के स्कंध 9 अध्याय. 11 में जिक्र है कि कलियुग के 5 हजार साल बीतने पर गंगा भी पृथ्वी से चली जाएगी। देवी भागवत की कथा के अनुसार एक बार गंगा और सरस्वती में विवाद हो गया। बीच-बचाव को लक्ष्मी पहुंची, तो सरस्वती ने उन्हें वृक्ष के रूप में पृथ्वी पर पापियों का पाप स्वीकार करने का शाप दे दिया। इसके बाद गंगा और सरस्वती ने एक-दूसरे को नदी के रूप में पृथ्वी पर रहने का शाप दे दिया। तीनों देवियों गंगा, सरस्वती और लक्ष्मी का क्रोध शांत हुआ तो पश्चाताप करने लगीं। तब भगवान विष्णु ने कहा कि जब कलयुग के 5 हजार साल पूरे हो जाएंगे तब तीनों देवियां वापस अपने-अपने स्थान को लौट जाएंगी। पौराणिक कथा के मुताबिक गंगा करीब 14 हजार साल पहले पृथ्वी पर आई थीं। गंगा से पहले सरस्वती नदी का अस्तित्व था। ऋग्वेद और महाभारत में इसका जिक्र है। प्रयागराज में त्रिवेणी के रूप में गंगा-यमुना के साथ सरस्वती का संगम बताया गया है। हालांकि हिमालय से निकली सरस्वती हरियाणा, पंजाब, राजस्थान और गुजरात के रास्ते आज के पाकिस्तानी सिंध प्रदेश जाकर अरब की खाड़ी में मिल जाती थीं। सरस्वती अब लुप्त हो चुकी हैं।

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