राष्ट्रीय
केन्द्र सरकार ने यूजीसी के नये नियम लागू किये, जिसका देश भर में शुरू हो गया विवाद
सीएन, दिल्ली। केन्द्र सरकार ने यूजीसी के नये नियम लागू कर दिये है। जिसका देश भर में विवाद शुरू हो गया है। नए नियमों में कहा गया है कि हर उच्च शिक्षण संस्थान को छात्रों और वहाँ काम करने वाले लोगों के ख़िलाफ़ भेदभाव खत्म करने के लिए ज़रूरी कदम उठाने होंगे. साथ ही जाति, समुदाय, धर्म, भाषा, जातीय पहचान, लिंग या विकलांगता के आधार पर किसी के प्रति कोई पक्षपात न करते हुए उनके हितों की रक्षा करनी होगी। इस नोटिफ़िकेशन का विरोध करने वालों का तर्क है कि ये सामान्य वर्ग के लोगों के ख़िलाफ़ है, क्योंकि इसमें सामान्य वर्ग के छात्र-छात्राओं के ख़िलाफ़ फ़र्जी आरोप लगाए जा सकते हैं जो उनके लिए मुश्क़िलें पैदा कर सकते हैं.नए नियमों के तहत बनाई जाने वाली समता समितियों में अनुसूचित जाति, जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, महिलाएं और विकलांगजनों का प्रतिनिधित्व अनिवार्य है लेकिन जनरल कैटेगरी का प्रतिनिधित्व अनिवार्य नहीं है. साथ ही इक्विटी स्क्वॉड्स को कैंपस में संवेदनशील स्थानों की निगरानी का व्यापक अधिकार दिया गया है. एक बड़ी चिंता ये है कि समता समूह या इक्विटी स्क्वॉड्स जैसी व्यवस्थाएँ कैंपस को लगातार निगरानी वाले माहौल में बदल देंगी. अंतिम ड्राफ्ट से झूठी शिकायत पर दंड का प्रावधान हटाए जाने के बारे में विरोध करने वालों का तर्क है कि इन नियमों का दुरुपयोग हो सकता है. इस मसले पर देश के कई इलाक़ों से विरोध प्रदर्शनों की ख़बरें आ रही हैं. कुछ समूहों ने एक फरवरी को भारत बंद का भी ऐलान किया है. प्रदर्शनकारियों का कहना है कि नए नियम बिना पर्याप्त चर्चा के लागू किए गए. वहीं दूसरी तरफ समर्थन की आवाजें भी हैं. कुछ विशेषज्ञ और समूह इन नियमों को सही दिशा में कदम मानते हैं. उनके मुताबिक़ पिछले कुछ सालों में कैंपस भेदभाव के मामलों में बढ़ोतरी देखी गई है. नए नियमों का समर्थन करने वालों का ये भी कहना है कि 2012 के पुराने नियम ठीक से लागू नहीं हो पाए थे और इसलिए अब एक मज़बूत व्यवस्था की ज़रूरत थी. इसी बीच नए नियमों के ख़िलाफ़ एक जनहित याचिका सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गई है. इस याचिका में कहा गया है कि नए नियम “चुनिंदा संरक्षण प्रदान करते हैं, जिससे विभिन्न क्षेत्रों और वर्गों से आने वाले छात्रों का एक बड़ा हिस्सा वंचित रह जाता है”. याचिकाकर्ताओं ने कहा कि वे “अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति और पिछड़े वर्गों के लोगों को संरक्षण देने का विरोध नहीं कर रहे हैं, बल्कि समाज के अन्य वर्गों या दूसरे शब्दों में कहें तो ‘सामान्य वर्ग’ के साथ भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए और उन्हें अन्याय, अपमान, अमानवीय व्यवहार, अनुचित कठिनाई और उनकी गरिमा और आत्मसम्मान के विरुद्ध कार्रवाई का शिकार नहीं बनाया जाना चाहिए.’ जाने-माने समाजशास्त्री सतीश देशपांडे ने इस विषय पर ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ अख़बार में लिखा, “यूजीसी के नए नियमों का स्वागत करना चाहिए-भले ही उन पर कई तरह से विरोध हो रहा हो और भले ही आगे चलकर उनमें कुछ बदलाव लगभग तय हों.” देशपांडे ने लिखा, “इन नए नियमों का स्वागत इस वजह से नहीं करना चाहिए कि वे क्या करते हैं या क्या नहीं करते, बल्कि इसलिए करना चाहिए कि वे एक महत्वपूर्ण बदलाव की ओर इशारा करते हैं -शायद अनजाने में ही.” अपनी बात जारी रखते हुए देशपांडे लिखते हैं, “2012 के नियमों का 2026 के नए रूप में फिर से आ जाना अपने‑आप में एक बड़ा बदलाव दिखाता है, क्योंकि यह वही सरकार है जो आम तौर पर पहले की सरकार की नीतियों को बदलने में गर्व महसूस करती है, फिर भी वह इस पुराने नियम को दोहरा रही है.”































































