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आज 23 मार्च को है शहीद दिवस : भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को याद करने का दिन

सीएन, नैनीताल। हर साल 23 मार्च को पूरे देश में शहीद दिवस मनाया जाता है। यह दिन उन वीर सपूतों, स्वतंत्रता सेनानियों और क्रांतिकारियों को याद करने के लिए समर्पित है जिन्होंने भारत की आज़ादी के लिए अपने प्राणों की आहुति दी। शहीद दिवस केवल भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की याद में ही नहीं मनाया जाता, बल्कि उन सभी वीरों के सम्मान में भी इसे मनाया जाता है जिन्होंने अपनी कुर्बानी से देश की स्वतंत्रता की राह को आसान बनाया। यह दिन हमें उनकी वीरता, साहस और बलिदान की याद दिलाता है और देशभक्ति की भावना को हर दिल में जगाता है। शहीद दिवस का इतिहास भारत के संघर्षपूर्ण स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ा हुआ है। अंग्रेजों ने लगभग दो सौ वर्षों तक भारत पर शासन किया और देशवासियों के जीवन को नियंत्रित किया। लेकिन जब भारत के सपूतों ने स्वतंत्रता की मांग उठाई, तो उन्होंने ब्रिटिश शासन के खिलाफ विद्रोह की आंधी चला दी।
यह विद्रोह केवल कुछ चुनिंदा लोगों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि हर वर्ग और हर घर से लोग स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े। इस दौरान भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव जैसे युवा क्रांतिकारियों ने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ आवाज़ उठाई और पूरे देश में क्रांति की ज्वाला फैलायी। 1928 में भगत सिंह और उनके साथियों ने उस ब्रिटिश पुलिस अधिकारी की हत्या कर दी, जो लाला लाजपत राय की लाठीचार्ज के दौरान हुई मृत्यु के लिए जिम्मेदार था। यह घटना पूरे देश में चर्चा का विषय बनी और स्वतंत्रता आंदोलन को नई ऊर्जा दी। इसके बाद 1929 में भगत सिंह ने अपने एक साथी के साथ मिलकर केंद्रीय असेंबली में बम फेंककर “इंकलाब जिंदाबाद” का नारा लगाया। उन्होंने यह कदम इसलिए उठाया ताकि अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ लोगों में जागरूकता पैदा हो और देश में क्रांति की भावना जागृत हो। इसके बाद कोर्ट में भी उन्होंने अपने बयान में देशभक्ति और स्वतंत्रता संग्राम के महत्व को स्पष्ट किया, जिससे पूरे भारत में उनकी वीरता और साहस की चर्चा होने लगी। 23 मार्च 1931 को ब्रिटिश सरकार ने लाहौर जेल में भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दे दी। यह घटना स्वतंत्रता संग्राम का एक महत्वपूर्ण क्षण बन गई। तीनों क्रांतिकारियों ने अपने साहस और देशभक्ति के बल पर पूरे देश में आज़ादी की चेतना को जगाया। उनके बलिदान ने यह संदेश दिया कि स्वतंत्रता केवल नेताओं या बड़ी संख्या में लोगों के प्रयास से ही नहीं आती, बल्कि व्यक्तिगत साहस और समर्पण से भी इसे हासिल किया जा सकता है।

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