उत्तराखण्ड
संस्मरण…..दीवान भी चला गया…जहां भी रहोगे, वादा करो कि गाते ही रहोगे : हेमंत बिष्ट
सीएन, नैनीताल।……ये आज, किसने ? किताबों को खुला छोड़ दिया….हर वर्क पर तेरी तस्वीर नज़र आती है…दीवान के जाने की खबर सुन कर हर किसी के मन का वेदना से भर जाना स्वाभाविक था. अभी अट्ठाईस फरवरी को देहरादून में आयोजित ए प्लस स्टूडियो के स्थापना समारोह में गेट से भीतर प्रविष्ट हुआ ही था कि रंजीत भाई और डा. अजय ढोंढियाल ( द्वी दिनों का ड्यार शेरुआ . ..) बातें कर रहे थे. अजय कह रहे थे जल्दी जाना है दीवान दा कनवाल जी का स्वास्थ्य ठीक नही है, मुझे भी (राजभवन ) लोक भवन जाना था. मैंने पूछा, “कहां है? ” उन्होने कहा हल्द्वानी में हैं वैसे सुधार है.अब ऐसी खबर आई तो उसके साथ बिताए एक एक पल चल चित्र की भांति ऑखों में चल रहे हैं.
(1 ) काशीपुर के रिकार्डिंग स्टूडियो से साउण्ड इन्जीनियर हीरोज महता का फोन आया,- आठ भजनों का ट्रैक भेज रहा हूँ, शब्द लिखो, दीवान दा गाने वाले हैं. दीवान के साथ कौन नहीं जुड़ना चाहेगा, हालांकि दीवान के साथ मंचों पर, उत्सवों में बहुत ही बार संगत हुई ठहरी. मैंने गाने लिख कर भेजे, कुछ ही दिनों मे हीरोज ( राजू महता ) का फोन आ गया कि दीवान दा कह रहे हैं कि रिकार्डिंग में हेमंदा का होना जरूरी हैं. दीवान अल्मोड़ा से हल्द्वानी होते हुए कालाढूंगी पहुंचा, मैं खुर्पाताल से कालाढूगी….रात में दस बजे गाने शुरू किये रात दो बजे तक आठ गाने रिकार्ड हो चुके थे. दूसरों के शब्दों को ऐसे पकड़ता था कि यकीन नहीं होता था. उत्तराखण्डे कि देव भूमि प्यारी, गोल्ल ज्यू, कृष्ण ज्यू, सैम ज्यू, शिव ज्यू के भजन थे, दो भजन मेरी दीदी स्व. हंसा दी ने भी लिखे थे नन्दा -सुनन्दा, गोलज्यू वाले. एक गीत का वीडियो स्व. रितेश ने बनाया, इन्ज्वाय म्यूजिक चैनल में खूब चला था, अभिनय सोनू बिष्ट, पूर्णिमा, भास्कर, आशू, प्रदीप, चेतन पाण्डे आदि ने किया था, खूब चला था, यह गीत भी. स्व. हंसा दी का लिखा था. रिकार्डिग की रात जब चार बजे हम होटल में थे, तो धान मिल के निकट का होटल होने के कारण कमरे में बहुत ही कीड़े उड़.उड़ कर आ रहे थे. मजाकिया दीवान मेरी ओर संकेत करके कहता”, ये लेटी है बासमती, हम तो मोटे चावल है, हमें काट कर क्या करोगे ? “हर परिस्थिति में हास परिहास उसके स्वभाव में था. सुबह जब होटल चैक आउट कर रहे थे तो अत्यंत घिसा हुआ साबुन का छिक्कल जैसा बचा था मैंने पहाड़ी में मजाक में कहा, “दिवान ये साबुन छोड़ जाएं “( दिवान य सापुण छोड जां ?”) दिवान का उत्तर था, “बिल्कुल दाज्यू, जो होटल में चैक इन करेगा, कहेगा तो सही, “कोई दिलेर रहा होगा यहाँ,दिलेरी दिखायी साबुन छोड़ गया
“हंसते ही रहते थे हम हमेशा. हर मुस्कराते नयन को, एक दिन रोना पड़ेगा…मिला है मीत मन का..उसे खोना पड़ेगा और सर पर नाचते गगन के प्राण बादल को एक दिन, सिन्धु की गहराई में रोना पड़ेगा…सचमुच आज खोना ही पड़ा है तुमको दीवान.
(2 ) मैं उसका आग्रह कोई टाल नही पाता था. फिल्म पधानी लाली के गीत रिकार्ड हो चुके थे मैं स्क्रिप्ट लिख रहा था. कि दीवान, राजू जीना, प्रेम गोस्वामी आदि घर खुर्पाताल आ गए ” दाज्यू कल आडियो की लांचिंग है, संचालन आपको ही करना है “एक गाने का फिल्मांकन मेघा आ वाले जीवन बिष्ट भी कर रहे हैं. मैंने कहा, “दीवान ! मेरे सगे साले की शादी है अल्मोड़ा, में, कैसे होगा। ?..”ना दाज्यू ! हम कलाकारों पर घर वालों से ज्यादा जनता का अधिकार है “उसका आग्रह न टाल सका, और रात में कार्यक्रम निबटा कर सुबह तड़के अल्मोड़ा को निकल कर बारात जाने से पहले अल्मोड़ा पहुंचा. खुद ही आग्रह करके ले गया और कई बार मंचों से मजाक भी करता था, चिढाता था. “अरे ! हम में से ऐसे भी कलाकार हैं जो गीत – संगीत – संचालन के लिए सगे साले की बारात तक छोड़ देते है.”
(3) बागेश्वर में उत्तरायणी पर एक सांगीतिक संन्ध्या “प्रतिपक्ष संवाद ” न्यूज चैनल के संस्थापक विनोद जोशी जी को मिली थी. उन्होने कहा,सर, कुछ अलग करने का विचार है क्या किया जाये. हमने तय किया फास्ट रिदम के गीत तो होते ही हैं, कुछ मैलोडियस करें. दिवान, शर्मिष्ठा आदि गायकों को ले गए. पहला ही गीत…”सौणा मेहणा त्यरा थान बेल पतरी चढुला “शर्मिष्ठा – दीवान ने गाया तो एक – रसता टूटी और मेलोडी प्रारम्भ हो गयी.फिर सिलसिला चल पड़ा. इत्तफाक से ये गीत उसी कैसेट का था जो हीरोज महंता के लिये हम लोगों ने लिखा गाया था.
(4) एक फिल्म बननी थी, ” जय हिन्द ” हिमांशु पाठक ( रितिक ), धनन्जय साह आदि कलाकार थे. गीत मुझे लिखने थे, आधा गीत पी.सी जोशी जी का भी था, जिसे मैंने आगे बढ़ाना था. संगीत – प्रख्यात संगीत निर्देशक, कार्यक्रम अधिशाषी आकाश वाणी, स्व. श्री शंकर उप्रेती ने देना था. मुझे उत्तराखण्ड की पाठ्यपुस्तक लेखन कार्यशाला में ऋषिकेष नटराज होटल जाना पड़ा. शंकर उप्रेती जी, दिवान का फोन आया गाने तुरंत फाइनल करके अभी भेजने हैं, उन दिनों व्हाट्स एप वगैरह हुआ नहीं, मैं बगल में ही उत्तराखण्ड पर्यटन के कार्यालय गया. अनुरोध किया कि चार पांच पेज, आकाशवाणी अल्मोड़ा को फैक्स करने हैं. उन्होने मना किया, बाजार से फैक्स करने करने को कहा, बाजार दूर था. मैंने कहा सर मै वर्कशाप छोड़ कर नहीं जा सकता, और भेजने भी जरूरी हैं. उनमें से एक ने पूछा, क्या है ? मैंने कहा- एक गीत हैं. कौन गाएगा? दीवान कनवाल…. दीवान कनवाल का नाम सुनते ही तत्काल फैक्स हो गया, वहां से शंकर उप्रेती जी करैक्शन करके फैक्स करते, मैं पुनः लिखकर भेजता. मैंने फैक्स के पैसे देने चाहे तो वे बोले -“दीवान दा उत्तराखण्डी संस्कृति के लिये इतना कर रहे हैं, तो थोड़ा हाथ बटाने का श्रेय हम भी लेलें। गाजियाबाद के पॉल स्टूडियो में शंकर उप्रेती उप्रेती जी के संगीत निर्देशन में दिवान कनवाल, मकरन्द, शर्मिष्ठा, अंजली जड़िया ने बहुत ही मधुर गीत गाए. दीवान मेरी सराहना करता रहा . .. दाज्यू क्या बात है – “सुवा – सुवा कुनै रओ, मिठ माननी काना हो . .. दाज्यू क्या सोचा है, वाह !! कान मिठ माननी ” ऐसा प्रभाव था दिवान का हर जगह…..
(5) हमेशा मंचों पर मुलाकात होती रहती लेकिन आंखरी बार, रुला गया दीवान….जैंती -सालम क्रांति का कवि सम्मेलन था, दीपांशु कुवर ,आदि युवाओं का आयोजन था. दिनेश कुंजवाल जी, बहुगुणा जी, शंकर जोशी जी आदि की कविता के बाद दीवान कहने लगा,” दाज्यू आपकी कविता से पहले मैं, कविता पढूंगा. अपनी दिवंगत पत्नी की स्मृतियों को उसने शब्दों में ऐसा उकेरा कि सभी की ऑखें नम हो गई. दर्द के साथ उलाहना था कि इतनी दूर तक साथ साथ चले तो अब हाथ छोड़कर क्यों चली गयी. दीवान ! तेरे हाथ छोड़कर जाने में कलाप्रेमियों को भी वैसा ही दुःख, वैसा ही कवमवाट अनुभव हो रहा है. जहाँ भी रहोगे, वादा करो कि गाते ही रहोगे, अपनी मखमली आवाज से हर दुखी हत्दय के घावों को सहलाते रहोगे. अलविदा दिवान ! अलविदा ! !
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