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उत्तराखण्ड

नवल बसंत : फुलि गै छ दैणा,मेरि बैणा ऐगो…म्हैणा..कफुवा बासण फैगो, मेरि बैणा ऐगो… म्हैणा…

चंद्रशेखर तिवारी, नैनीताल। पहाड़ में बसन्त पंचमी आ गयी है लोग कह रहे हैं…अरे देखो…सिरी पंचमी का पर्व आ गया है…डाण्डी कांठी में बसन्त बौराने लगा है, रास्ते और खेतों में प्योंलड़ी फूल गयी है। बांज की डालियों में मौल्यार आ गया है। जहां तहां कुंज के फूल खिल गये हैं। गेहूँ -जौं के खेतों में रंगत दिखने लगी है। पेड़-पौंधों की डालियां नयी कोपलों और फूल-पत्तियों से लद गयीं हैं। कहीं-कहीं घर आंगनों से हारमोनियम की धुन व तबले की गमक में बैठ होली के गीत शनैः शनै बसन्ती बयार में घुलने लगे हैं… गांव के लोग हरे जौं के तिनके देते हुए परिवार की सुफल कामना कर रहे हैं….

‘आई पंचमी माऊ की
बाँटि हरयाली जौ की,
आई मैना चैत को
बाटू बतै ग्ये मैत को,
मैत वाळि मैत होलि
निर मैताणी रोलि यकुलि,
नि रौणु छोरि पापणि
क्वी नि च तेरि आपणी।
काका बौडा मा रौणु नि
अपणु रंग खौणु नि
छक्वै कि रौणु ब्यै मुंग
फिर नि रौणु कै मुंग ‘।

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अहा यह बसन्त ऋतु विवाहित बेटी-बहुओं को उनके मायके की याद भी दिला रही है जो अपनी विवशताओं के कारण मायके तो नहीं जा पा रही हैं। लेकिन वह मायके की राजी-खुसी की कामना तो कर ही रही हैं… ओ मेरी मां! खेतों में पीली सरसों फूली होगी, जंगल में कफू कुहकने लगा होगा…मेरे माता-पिता, भाई-बहन, दूध देने वाली सुरमाली भैंस और वह नटखट बिल्ली न जाने कैसी होगी..मन करता है कि मैं उड़कर आ जाऊं..पर करूं क्या…मैं तो असहाय हूँ..!!

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‘फुलि गै छ दैणा,मेरि बैणा ऐगो…म्हैणा
कफुवा बासण फैगो,मेरि बैणा ऐगो.. म्हैणा
कसि छु इजु मेरि,
लागि छू नराई कसि सुरमाई भैंसी पुसुली बिराई
हिया मेरो कूछ अब कथ न्है जा उड़ि
तुम फुलि जैया, फलि जाया, जस फुलो दैणा।’

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