उत्तराखण्ड
उत्तराखंड का प्रसिद्ध लोक पर्व फूलदेई नैनीताल नगर के नन्हे मुन्ने बच्चों ने हर्षोल्लास के साथ मनाया
रंग-बिरंगे फूलों से महकी देवभूमि की घाटिया शुरू हुआ बहनों को ‘भिटोली’ का इंतजार
कमलेश बिष्ट,नैनीताल। उत्तराखंड का प्रसिद्ध लोक पर्व फूलदेई नैनीताल नगर के नन्हे मुन्ने बच्चों ने हर्षोल्लास के साथ मनाया। उत्तराखंड की समृद्ध लोकसंस्कृति में कई ऐसे पर्व हैं जो प्रकृति और परंपराओं से गहराई से जुड़े हैं। उन्हीं में से एक है फूलदेई, जिसे पूरे कुमाऊँ-गढ़वाल में बड़ी श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। यह पर्व हर साल चैत्र महीने की संक्रांति (मार्च के मध्य) में मनाया जाता है और इसे वसंत ऋतु के आगमन का प्रतीक माना जाता है। इतिहासकारों की माने तो फूलदेई इतिहासकारों और लोकपरंपराओं के अनुसार, फूलदेई का त्योहार सदियों पुराना है। यह पर्व प्रकृति, नई फसल और समृद्धि से जुड़ा हुआ है। पहाड़ों में जब सर्दियों के बाद वसंत ऋतु आती है तो जंगलों और पहाड़ों में बुरांश, फ्योंली, प्योली, आड़ू-प्लम जैसे फूल खिलने लगते हैं। इन्हीं फूलों के स्वागत के रूप में यह पर्व मनाया जाता है। इस दिन छोटे बच्चे घर-घर जाकर दरवाजों की देहरी पर फूल बिखेरते हैं और घर के लोगों की खुशहाली और समृद्धि की कामना करते हैं। इस दिन छोटे बच्चे दूसरों के घर जाकर फूल देई, छम्मा देई, दैंणी द्वार, भर भकार, ये देली सौं बारंबार के गीत गाकर बसंत ऋतु के आगमन और उनके घर में सुख समृद्धि की कामनाएं करते हैं। आज रविवार को पूरे प्रदेश और नैनीताल में पारंपरिक उत्साह के साथ मनाया गया। चैत्र मास की पहली तिथि यानी मीन संक्रांति के अवसर पर हिमालय की वादियों में वसंत के आगमन का स्वागत बच्चों की किलकारियों और फूलों की खुशबू के साथ किया गया। नैनीताल में सुबह होते ही बच्चे टोकरियों में फ्योंली, बुरांश और सरसों के फूल लेकर घर-घर पहुंचे। यह पर्व न केवल ऋतु परिवर्तन का सूचक है, बल्कि यह पहाड़ के अटूट प्रकृति प्रेम को भी दर्शाता है। पारंपरिक परिधानों में सजे बच्चों ने घरों की देहरी पर फूल चढ़ाकर सुख-समृद्धि की कामना की। इस दौरान “फूल देई, छम्मा देई, दैणी द्वार, भर भकार” के गीतों से देवभूमि के आंगन गूंज उठे। छोटे बच्चों ने दूसरों के घर जाकर उनके आंगन में पूजन करने आए इन नन्हे मेहमानों को उपहार, गुड़ और चावल भेंट किए। वहीं अगर इस संस्कृति को जिंदा रखना है हमें अपने बच्चों को अपने उत्तराखंड और यहां पारंपरिक त्योहार के बारे में बताना चाहिए। जिससे आगे आने वाली पीढ़ी इन त्योहारों को आगे अपने बच्चों को बताएं।




























