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उत्तराखण्ड

सत्ता को सब कुछ केंद्रीकृत चाहिए, धर्म व मंदिर के नाम पर आस्था भड़काकर पूरे देश की सत्ता कब्जाने की कोशिश….

महिपाल नेगी, नैनीताल। (परंपरागत रूप से 365 गाँवों के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण महर्षि अगस्त्य मुनि की चल विग्रह डोली (देव डोली) करीब 15 साल बाद अगस्त्य ऋषि मंदिर से विधि-विधान के साथ देवरा यात्रा पर रवाना हुई। इसे मुनि महाराज का गद्दीस्थल-तपस्थली माने जाने वाले अगस्त्यमुनि मैदान में प्रवेश करना था। लेकिन वहाँ स्टेडियम निर्माण के लिए लगे गोल गेट की ऊँचाई कम होने के कारण 14 जनवरी को डोली वापस लौट गई। 15 जनवरी को सैकड़ों श्रद्धालुओं ने गेट तोड़ कर मैदान में प्रवेश किया। इससे भारी हंगामा मचा और केदारनाथ हाईवे पर कई घंटे जाम लगा रहा। प्राप्त सूचना के अनुसार प्रशासन ने 52 लोगों पर आपराधिक मामला दर्ज कर दिया है। इससे सीमान्त जनपद उत्तरकाशी में तनाव फैल गया। –सम्पादक) बीते दिनों उत्तराखण्ड के अगस्तमुनि में जो कुछ हुआ, वह शायद होने दिया गया। पिछले कुछ महीनो से वहां लगातार खींचातानी चल रही थी। लेकिन अब लगता है कि ऐसी घटना का इंतजार किया जा रहा था और वह हो भी गई। दरअसल सत्ता को सब कुछ केंद्रीकृत चाहिए। धर्म मंदिर के नाम पर आस्था भड़काकर पूरे देश की सत्ता कब्जाने वालों को अगस्त्यमुनि में स्थानीय समुदाय द्वारा धर्म आस्था की बात करना पसंद नहीं आया। क्योंकि यह उनकी छù आस्था की पोल खोलती है। बाकी लोगों की आस्था न जागे, उन्हें सब कुछ केंद्रीकृत चाहिए। आस्था भी स्वतंत्र नहीं चाहिए, उनकी गुलाम चाहिए। एक देश तो ठीक है, लेकिन एक देश में विविधता उन्हें पसंद नहीं। एक ही मंदिर चाहिए, एक ही ईश्वर, एक ही देवता, एक ही आस्था, एक ही भाषा, एक ही रंग, एक ही नेता, एक ही पार्टी, एक ही संगठन …… कोई दूसरा पसंद नहीं, देवता भी नहीं। और लोक देवता (भूमि का भुम्याळ) तो बिल्कुल भी नहीं। क्योंकि वह केंद्रीकृत आस्था और विश्वास को चुनौती देता है। बनारस में बड़े मंदिर के प्रति आस्था जगाने के लिए दर्जनों छोटे मंदिर ध्वस्त हुए और मूर्तियाँ कबाड़खाने में पहुँचा दी गयीं। अयोध्या में भी ऐसा हो चुका है, कुछ दिन पहले दिल्ली में भी हुआ। देश भर में बड़े मंदिरों तक पहुँच के लिए छोटे मंदिरों को ध्वस्त कर कॉरिडोर बनाए जा रहे हैं। यहाँ पहाड़ में लोक देवताओं के पहले से ही अपने कॉरिडोर हैं। यहाँ उनके अपने थान हैं। रही बात गेट की, वह यात्रा पथ में इसलिए नहीं बनाए जाते रहे होंगे कि डोली और देव निशानों को झुकना न पड़े, या फिर टकरा न जाए। जिन्होंने चंडिका की देवरा यात्रा देखी होगी या नन्दा जात के देव निशान, उन्हें ज्ञात होगा कि कई निशान 11, 14 या 15 फीट तक ऊँचे होते हैं। इसीलिए उनके मार्ग अवरोध विहीन रखे जाते हैं। यह सिर्फ आस्था ही नहीं, व्यावहारिक पक्ष भी है। लेकिन केंद्रीकृत सत्ता को जैसे छोटे-मोटे नेता और पार्टियाँ पसंद नहीं, वैसे ही छोटे-मोटे देवता (लोक देवता) भी पसंद नहीं। हालाँकि यह आज की ही बात नहीं है, पहले से होता आया है और इस पर अलग से विस्तार से लिखे जाने की दरकार है। अयोध्या मामले में सुप्रीम कोर्ट ने आस्था को कानून से ऊपर बता दिया था, लेकिन अगस्त्यमुनि में ऐसा नहीं होगा। क्योंकि यहाँ तो मुठ्ठी भर लोग हैं। 52 लोगों  पर  मुकदमे दर्ज कर दिए गए हैं। मुठ्ठी भर लोगों की क्या आस्था और क्या विश्वास ….!!

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