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नरीमन चौराहे के मामू…असगर भाई जब भी मिलते हैं मुस्कुराकर मिलते हैं, उनकी मुस्कुराहट में नैनीताल व पहाड़ का झलकता है इतिहास

इस्लाम हुसैन, नैनीताल। काठगोदाम नरीमन चैराहे के कुछ कैरेक्टर भी बड़े बहुआयामी और जबर्दस्त हैं। वक्त के थपेड़ों ने उनके अक्स धुँधले जरूर कर दिए हैं। लेकिन वे अभी भी मौजूदगी बनाए हुए हैं। ऐसे ही एक कैरेक्टर हैं, असगर भाई, जिन्हें सब लोग मामू कहकर बुलाते हैं, इसलिए असगर भाई जगत मामू हैं। करीब 80 साल के असगर भाई पिछले छः-सात दहाई से एक बेहतरीन लकड़ी के कारीगर, शहद के बक्से बनाने  के एक्सपर्ट रहे हैं। 1990 के दशक तक उत्तराखंड और कुमाऊँ में शहद उद्योग की उन्नति में उनका और उनके वालिद का योगदान भुलाया नहीं जा सकता। असगर भाई और उनके बुजुर्गों का ताल्लुक पटवाडाँगर, नैनीताल, ज्योलीकोट, ताड़ीखेत, रानीखेत, बनभूलपुरा (हल्द्वानी) से होता हुआ नरीमन चैराहे में आकर सैट हो गया। असगर भाई बेहद सीधे और मासूम हैं। उन्होंने शादी नहीं की। वैसे तो उनका सीधा कोई परिवार नहीं है, लेकिन ऐसा भी नहीं है। उनके अपने परिवार हैं। उनकी बहन के बच्चे हैं, जिनके भरे पूरा परिवार हैं, उनके भांजे है उनकी बहुएँ हंै और उनके बच्चे हैं। साथ ही भरी पूरी रिश्तेदारियाँ हैं। इसी निस्बत से असगर भाई नरीमन चैराहे में जगत मामू की तरह मशहूर हैं। ब्रिटिश शासन में जब इंफ्रास्ट्रक्चर और संस्थागत आवश्यकताएं हुईं तो बहुत लोगों को तराई या संयुक्त प्रान्त के दूसरे हिस्सों से बुलाया गया। वैसे ही उनके बुजुर्ग भी आए या बुलाए गए। 1903 में नैनीताल के पास पटवाडाँगर में ब्रिटिश सरकार द्वारा वैक्सीन इंस्टीट्यूट स्मॉल पॉक्स का टीका बनाने के लिए स्थापित हुआ था। (बाद में यहाँ एंटी-रेबीज और टिटनेस के टीके भी बने)। यह पूरे भारत में स्मॉल पॉक्स की वैक्सीन का पहला उत्पादन केंद्र बनाया गया था। इस इंस्टीट्यूट के लिए बाहर से टेक्निकल एक्सपर्ट और जानकार बुलाए गए। असगर भाई के दादा मरहूम याकूब अली 1930 से पहले या आसपास पटवाडांगर में एक एक्सपर्ट डाक्टर के रूप में आए। असगर भाई कहते हैं कि उनके दादा याकूब अली साहब पटवाडाँगर में डाक्टर रहे। हो सकता हो कि वे जानवरों के डाॅक्टर रहे हों, क्योंकि वैक्सीन बनाने के लिए जानवरों की जरूरत पड़ती थी। 1938 में याकूब अली साहब इंतेकाल फरमा गए, असगर भाई के पास दादा की पटवाडांगर डाकखाने की पासबुक अभी तक सुरक्षित है जिसमें बाद में दादा को पेंशन भी आती थी। उनकी सर्विस के दौरान पटवाडांगर में रहने और स्कूल की सहूलियत न होने या परिवार के पटवाडांगर जैसी कम सुविधा वाली जगह में एडजस्टमेंट न होने से उनका परिवार हल्द्वानी के बनभूलपुरा में ही रहा। 1948 में उनके वालिद मरहूम गुलाम अहमद नैनीताल के मशहूर कारोबारी परिवार स्व. चन्द्र लाल ठुलघरिया (सीआरएसटी स्कूल वाले) के लिए काम करने लगे। चन्द्रलाल ठुलघरिया जी का शहद का कारोबार  था तो गुलाम अहमद साहब ठुलघरिया जी ज्योलीकोट स्थित वर्गोमेंट स्टेट में शहद की मक्खी पालने वाले लकड़ी के बक्से बनाने लगे। कई साल तक यह काम चलता रहा। बाद में चन्दलाल ठुलघरिया जी ने अपनी बर्गोमेंट स्टेट की जमीन भारत सरकार को बेच दी, जो अब सेना का हिस्सा है। इस वर्गोमेंट स्टेट के चक्कर में एक बार मैंने भी सेना के गार्ड की नाराजगी झेली, हुआ यूँ कि हमारे रिश्तेदार ज्योलीकोट के नीचे गाँजा गाँव में रहते थे। गांजा गांव से हमारे खानदान का पुराना रिश्ता था। हमारे बुजुर्ग जब नैनीताल के बसने के शुरूआती दौर में 1850 के बाद आए तो गांजा में ही रहे थे। एक बार हमारे रिश्तेदारों में कोई शादी थी और अब्बा जी ने मुझे जाने का हुक्म दे दिया। सिर्फ इतना बताया कि गांजा गांव ज्योलीकोट के नीचे है। मैं काठगोदाम से बस में बैठा और ज्योलीकोट उतरकर सीधे वर्गोमेंट स्टेट के रास्ते में उतर गया। जैसे ही थोड़ा नीचे उतरा तो एक फौजी ने रोक लिया। मैंने बताया कि मैं नीचे गांव जा रहा हूँ। उसने कहा यहां से रास्ता नहीं है। मैंने थोड़ा हल्के ढंग से कहा, कैसे नहीं है। उसने मिलिट्री अंदाज में जवाब दिया यह आर्मी एरिया है यहां आना मना है। तो मैं सकपकाया, रानीखेत में हम ऐसे हालात झेलते रहते थे। मैं माफी माँग कर फौरन वापस लौटा और आगे के रास्ते से गाँव गया। असगर भाई के वालिद बाद में हल्द्वानी के रामलीला मुहल्ले में दीवान सिंह, जिनके बेटे प्रताप सिंह थे, के साथ शहद के बक्से बनाने लगे। बाद में असगर भाई इस काम में लगे। उन्होंने काठगोदाम नई बस्ती में अपने घर में यह बक्से बनाना शुरू किया। जिस मकान में उन्होंने बक्से बनाने का कारखाना शुरू किया, उसका एक कमरे के साथ एक बड़ा हाल था। यह मुकाम कभी हमारे रिश्तेदारों के पास किराए पर था। बाद में असगर भाई के परिवार के पास आया, मेरी अम्मा बताती है कि जब वो और उनकी दो और छोटी बहनें ब्याह के बाद विदा होकर 1950 में रानीखेत से काठगोदाम के नारीमैन चैराहे पर उतरीं थीं तो मुन्नी दी और मेरे दोस्त गणेश की आमा (दादी) उन्हें लेकर इसी मकान में आई थी। असगर भाई का शहद के बक्से बनाने की फैक्ट्री कई साल तक खूब चली। खादी और ग्रामोद्योग बोर्ड और उद्योग विभाग के लिए असगर भाई ने बहुत बक्से बनाकर दिए। उनके कारखाने में बहुत से कारीगर और मजदूर काम करते थे। 1980 के बाद उत्तर भारत में शहद कारोबार पर आफत आ गई। विदेश से से सैकब्रुड नाम की बीमारी आई, जिसने  90 प्रतिशत शहद काॅलोनियों को ख्घ्त्म कर दिया। मुझे याद है कि उस दौर में इस बीमारी के बारे में बहुत मीटिंग-कांफ्रेंस बीमारी को रोकने की कोशिशों को लेकर हुई थीं। मैंने भी अखबारों में बहुत रिपोर्टिंग की थी। लेकिन बीमारी फैलती गई। उस बीमारी से शहद उद्योग की कमर टूट गई। बताते हैं कि यह बीमारी थाईलैंड से आई थी। उसे थाई सैकब्रूड भी कहते थे। यह एक वायरल बीमारी थी, जिससे मधुमक्खियाँ मर जाती थीं। 1976 के बाद से इस बीमारी से दक्षिण भारत का शहद उद्योग भी बुरी तरह प्रभावित हुआ था। अब जब शहद की मक्खियां ही नहीं रहीं, तो शहद के बक्से कौन बनवाता ? कुछ लोगों ने 1990 के आसपास फिर से कोशिश की। उसी दौर में असगर भाई ने भाजपा नेता और अटल बिहारी वाजपेयी जी के मंत्रिमंडल के पूर्व मंत्री बची सिंह बिष्ट की ताड़ीखेत रानीखेत स्थित अपेयरी के लिए शहद के बक्से बनाए थे। धीरे-धीरे असगर भाई इस काम से हट गए और लकड़ी के फर्नीचर, घरों-दुकानों में लकड़ी की कारीगरी करने लगे। असगर भाई की दादी नैनीताल के लोकल परिवार की थीं। असगर भाई जब भी मिलते हैं, मुस्कुराकर मिलते हैं। उनकी मुस्कुराहट में नैनीताल और पहाड़ का इतिहास झलकता है। नैनीताल समाचार से साभार

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