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गांधी गोली से नहीं मरते…. गांधी गाली से भी नहीं मरते, क्योंकि गांधी एक व्यक्ति नहीं, गांधी एक विचार है….हे राम!

सतीश कुमार, नैनीताल। आज के दिन 30 जनवरी, 1948, को महात्मा गांधी के सीने पर गोलियां चलीं। गांधी गोली से नहीं मरे और गांधी गाली से भी नहीं मरते, क्योंकि गांधी एक व्यक्ति नहीं, गांधी एक विचार हैं, गांधी एक राष्ट्रीय जीवन दृष्टि हैं और आधुनिक भारत राष्ट्र निर्माण स्वप्न की बुनियाद हैं। सदी के सबसे बड़े रामभक्त गांधी भी राम की तरह लोक के हैं। इसलिये कालजयी हैं। गांधी के राम दशरथ के हों या कबीर के हों, पर गांधी को राम में वैसा ही अटूट विश्वास था, जैसा भक्त शिरोमणि हनुमान जी को था। हनुमान ने वक्ष खोल दिखा दिया कि उसमें राम के अलावा कुछ नहीं। एक सिरफिरे की नफरत की पिस्तौल ने गांधी का वक्ष छेदा, तो उसके भीतर से भी ‘हे राम’ के अलावा और कुछ नहीं निकला। जिन सद्गुणों ने राम को मर्यादा पुरुषोत्तम बनाया, उनके अनुकरण ने राजनीतिज्ञ गांधी को महात्मा गांधी बना दिया। गांधी ने राम नाम की अणुशक्ति को भारत के स्वतंत्रता संघर्ष का मंत्र बनाया। लाखों से जहां रामधुन गान कराया, वहीं करोड़ों को उसकी प्रेरणा सौंप गये। राम भक्ति के सबसे बड़े पंथ रामानंद संप्रदाय के गांधी दौर के शीर्ष आचार्य जगु रामानंदाचार्य स्वामी भगवदाचार्य जी महज गांधी के स्वतंत्रता आन्दोलनों में जेल ही नहीं गये, महात्मा गांधी पर संस्कृत में अति विद्वतापूर्ण श्लोकों में आबद्ध काव्य ग्रंथ लिख गये। रामभक्ति प्रवर्तक रामानंद ने रामभक्ति को जनान्दोलन बनाया था, तो रामभक्त गांधी ने रामनाम की शक्ति से देश की स्वतंत्रता के राष्ट्रीय आन्दोलन को, राष्ट्रीय जनान्दोलन बना दिया। राम का जीवन आदर्शों की प्रयोगशाला रथा, तो गांधी का जीवन सत्य की। राजा राम ने वनवासी वेश में भारत घूमकर जन जन से तादात्म्य बनाया, शबरी के बेर खाये, कुटी बनाकर रहे। गांधी भी भारत को घूमने के क्रम में गरीब भारतीयों की भांति खुद को ढालते हुये लंगोटी वाले गांधी बन देश में जनतादात्म्य का सार्वजनिक जीवन जीने के प्रतीक बने, झोपड़ों में रहे, दलित बस्तियों में सहजता से रहे। राम के स्पर्ष से अहिल्या तर गईं, तो आजादी के गांधीयुगीन जनान्दोलनों में गांधी के नेतृत्व का स्पर्ष कर सुदूर गांव गिरांव, खेत खलिहान का आम आदमी भी बड़े उद्देश्य की गतिशील धुरी से जुड़ कर बड़ा आदमी बन गया। राम लोकानुरूप प्रत्यक्ष प्रमाण मानते थे और सब जानते हुये भी सीता की अग्नि परीक्षा कराई। गांधी भी किसानों की पीड़ा का सत्य जानते थे, पर उसकी लोक प्रत्यक्ष जांच के लिये चंपारण गये। वहां अपनी जांच को ही सत्याग्रह की युगांतरकारी प्रयोगशाला बना दिया। राम के ऐसे अनुकरणकर्ता गांधी भला किसी की गोली से मर कैसे सकते थे ? इसलिये 30 जनवरी 1948 की गोलियों से गांधी नहीं मरे। महात्मा गांधी अतीत ही नहीं, भविष्य भी हैं के व्यापक विश्वास संग जीवंत हैं। दुनिया में अकेली शख्सियत हैं, जो करीब पौने दो सौ देशों में लोगों की श्रद्धा की प्रतीक मूर्तियां बन कर खड़े हैं। भारत में लोगों के दिलों में तो राष्ट्रपिता के रूप में सुभाष बाबू उन्हें स्थापित कर गये, जिनका गांधी से मतभेद गिनाया जाता है। बड़े वैज्ञानिक आइंस्टीन कह गये कि आने वाली नस्लें आश्चर्य करेंगी कि कभी ऐसा व्यक्ति हाड़ मांस के पुतले के रूप में हमारे बीच था। इस वैज्ञानिक वाक्य के भी तो यही निहितार्थ हैं कि एक प्रेरक आदर्श के रूप में गांधी अमर हैं। देश और दुनिया में गांधी को मानने वाले असंख्य लोगों का वजूद है और रहेगा भी। फिर भी गांधी से असहमतियां थीं और गांधी असहमति के कायल भी थे। असहमति की ही तो वो पिस्तौल थी, जो गांधी पर दगी थी, अन्यथा गांधी ने किसी की दुकान नहीं कब्जा की, किसी का खेत नहीं जोता था। इसके बावजूद आज का सच यह है कि गांधी से असहमत भी, गांधी से सहमत हैं। कोई गांधी को भर बांह पकड़ता है। उन्हें पकड़ने क वह में संकुचित सीमा के नाते कोई बांह या ऊंगली मात्र पकड़ता है। कोई अपने लिये जानलेवा वैचारिक संक्रमण के भय से गांधी पकड़ता नहीं, महज गांधी को छू लेता है। उनमें कोई उन्हें हांथ या ऊंगली से छूता है , तो कोई राष्ट्रनिर्माण के देवता की जगह महज सफाई का देवता मानकर झाड़ू से ही छू लेता है, लेकिन गांधी को पकड़ना या गांधी को छूना अपरिहार्य बन गया है। जैसे श्री गणेशाय नमः कहे बिना किसी हिन्दू की पूजा या बिस्मिल्लाह के बिना किसी मुसलमान की इबादत हो नहीं सकती, उसी तरह गांधी के नाम के बिना देश दुनिया में सियासत की बातचीत नहीं हो पाती है। गांधी को मिटाने की हर कोशिश वैसे ही नाकाम रहेगी, जैसे गांधी को मारने की कोशिश नाकाम रही। सो गांधी जीवंत हैं, गांधी सर्वकालिक रूप से प्रासंगिक हैं और सच यह है कि गांधी अतीत ही नहीं, भविष्य भी हैं। आस्था एवं विश्वास के इस भाव के साथ गांधी पर गोली दागने के कायर कृत्य की शर्मनाक तारीख 30 जनवरी को गांधी की कालजयी प्रासंगिकता और गांधी की चिर जीवन्तता को हमारा सेल्यूट। सतीश कुमार के फेसबुक वाल से साभार

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