अंतरराष्ट्रीय
आज 21 मार्च विश्व वानिकी दिवस पर विशेष : वनं हि जीवनं ध्रुवं, सुखं चैव निरामयं, सर्वे जीवन्तः ध्रुवं, वनं हि आश्रितं सदा
प्रो. ललित तिवारी, नैनीताल। वन जीवन का आधार है । वनं हि जीवनं ध्रुवं, सुखं चैव निरामयं। सर्वे जीवन्तः ध्रुवं, वनं हि आश्रितं सदा।। अर्थात वन ही जीवन का निश्चित आधार है और आरोग्य एवं सुख का स्रोत है। सभी प्राणी मात्र वन पर ही निर्भर रहते हैं। विश्व वानिकी दिवस जिसे अंतर्राष्ट्रीय वन दिवस कहते है हर वर्ष 21 मार्च को मनाया जाता है जो वनों के महत्व के बारे में जागरूकता बढ़ाना और वन संरक्षण के प्रति लोगों को प्रेरित करता है। संयुक्त राष्ट्र ने वनों को संरक्षित करने के लिए यह दिवस स्थापित किया । 21 मार्च 2026 की थीम “वन और अर्थव्यवस्थाएं” है। यह विषय आर्थिक समृद्धि, आजीविका और हरित अर्थव्यवस्था बढ़ावा देने एवं आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण के संतुलन को दर्शाता है। जो सतत विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने में तथा कार्बन-गहन सामग्रियों के विकल्प ,आर्थिक समृद्धि ,सतत विकास , प्रबंधन और संरक्षण का संदेश देता है।
वन पृथ्वी के फेफड़े हैं, जो जीवन के लिए अनिवार्य ऑक्सीजन (प्राणवायु) प्रदान करते हैं, कार्बन डाइऑक्साइड सोखकर जलवायु नियंत्रित करते हैं और वर्षा लाने में सहायक हैं। 80% स्थलीय जैव विविधता का घर हैं, 75 प्रतिशत ताजे पानी का स्रोत के साथ मिट्टी का कटाव रोकते हैं और भोजन व रोजगार (आजीविका) देते हैं। भारत वन स्थिति रिपोर्ट 2023 के अनुसार, भारत का कुल वन और वृक्ष आवरण 8,27,357 वर्ग किमी (भौगोलिक क्षेत्र का 25.17 प्रतिशत ) है। 2021 की तुलना में इसमें 1,445.8 वर्ग किमी की वृद्धि हुई है, जिसमें 156.41 वर्ग किमी वन और 1,289 वर्ग किमी वृक्ष आवरण शामिल है। कुल वनावरण: 7,15,343 वर्ग किमी (देश के भौगोलिक क्षेत्रफल का 21.76 प्रतिशत है ।सबसे अधिक वन क्षेत्र वाले राज्य में मध्य प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, छत्तीसगढ़ है तथा सबसे अधिक वन आवरण (प्रतिशत): मिजोरम (84.53%), अरुणाचल प्रदेश (79.33%), मेघालय (76.00%) है । वन सर्वेक्षण रिपोर्ट 2021 के अनुसार, लगभग 35.46% वन क्षेत्र आग की चपेट में आने की संभावना रखते हैं। कार्बन स्टॉक में वृद्धि हुई है, जो बढ़कर कुल 7,204 मिलियन टन हो गया है। जबकि अरुणाचल, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड मामूली कमी भी देखी गई। अंतरराष्ट्रीय प्रयास में 2030 तक वनों की कटाई रोकने, बंजर भूमि को बहाल करने और कार्बन सिंक बढ़ाने पर केंद्रित हैं। जिसमें 350 मिलियन हेक्टेयर बहाली अफ्रीका और लैटिन अमेरिका में होनी हैं, जो जलवायु परिवर्तन से लड़ने के लिए सतत वनीकरण और पारिस्थितिक तंत्र बहाली को बढ़ावा देते हैं। 2030 तक 350 मिलियन हेक्टेयर अवक्रमित भूमि को वन के अंतर्गत लाना है जिससे विश्व स्तर पर वन क्षेत्र में 3% की वृद्धि हो सके । यह कार्यक्रम विकासशील देशों को वन संरक्षण के लिए आर्थिक प्रोत्साहन प्रदान करता है। भारत दुनिया में वन क्षेत्र में वृद्धि के मामले में शीर्ष 3 देशों में शामिल है तथा 2030 तक 26 मिलियन हेक्टेयर बंजर भूमि को बहाल करने का संकल्प लिया गया है, जो उसके अंतरराष्ट्रीय वादों का हिस्सा है जिसमें केवल पेड़ों की संख्या बढ़ाना है, बल्कि जैव विविधता की रक्षा करना, कार्बन उत्सर्जन कम करना और स्थानीय समुदायों की आजीविका को सुरक्षित
करना है। एक पेड मां के नाम सहित कई कार्यक्रम लागू किये गये है । उत्तराखंड के 65 प्रतिशत से अधिक उष्णकटिबंधीय से लेकर अल्पाइन वन पाए जाते हैं किंतु वनाग्नि से निपटने के लिए नई रणनीतियां जरूरी है। इसीलिए कहा गया है वने तिष्ठति जीवनं सर्वं, तस्माद्वनं रक्षस्व भव। वृक्षाः सुमुखाः सदा देहाय, छायां शीतलं च ददाति।। अर्थ: वन में ही समस्त जीवन निहित है, इसलिए वन की रक्षा करें। वृक्ष हमेशा हमारे शरीर के लिए कल्याणकारी हैं और वे शीतल छाया प्रदान करते हैं।





































