उत्तराखण्ड
रंगदारी का ककहरा : समाजसेवा अब सेवा नहीं, सेवा शुल्क, पत्रकारिता अब मिशन नहीं, कमीशन….
केशव भट्ट, बागेश्वर। बचपन में अकसर मास्टरों से अनगिनत बार मार खाते हुवे मैंने ज्ञान का पहला अक्षर ‘अ’ और फिर ‘क’ सीखा. आज के वक्त को देख मैं उन मास्टरों को गरियाता रहता हूं जिन्होंने इन शब्दों को मात्र ज्ञान का ही बताया. जबकि आज के वक्त में, समाज में ‘क’ का अर्थ अब ‘कानून’ नहीं, ‘कलेक्शन’ हो गया है, और जब ‘क’ से कलेक्शन, ‘ख’ से खड़िया, ‘ग’ से गुंडागर्दी और ‘घ’ से घाट-घाट का पानी पी चुके समाजसेवी जुड़ जाएँ, तो तैयार होता है, रंगदारी का पूरा ककहरा. तथाकथित पत्रकारों की यह बात कि, खबरें बनाने से कुछ नहीं होता, यह बात अब उतनी ही सत्य मानी जाने लगी हैं जितना कि चुनाव से पहले किए गए नेताओं के झूठे वादे. खबरें बनती हैं, छपती हैं, टीवी में भी चलती हैं, वायरल भी खूब होती हैं, और फिर ये खबरें अगले दिन चाय के गिलास के साथ चर्चा में बह जाती हैं. फर्क बस इतना हो गया है कि, पहले खबरें बदलाव की उम्मीद जगाती थीं, अब खबरें सेटिंग की दर तय करती हैं. खड़िया, चरस और शराब की गर्त में डूबे इस जिले का नाम अब कईयों की महत्वाकांक्षाओं को विस्तार देने में लगा है. जनता कहती है कि, कुछेक साल पहले स्मैक ने एंट्री मारी तो रंगदारी टाइप के ऐजेंटो ने भी उसका रेड कार्पेट बिछाकर स्वागत किया बल्. वैसे पहाड़ों में विकास का यह एक नया मॉडल उभर कर आया है जहाँ अपराध भी अपग्रेड होते हैं, और समाजसेवा भी. है ना हैरत की बात..! आजादी से पहले पहाड़ों की कहानी लोगों की तरह ही बड़ी मासूम थी. लोग नदियों के किनारे बसे, क्योंकि पानी जीवन देता है. पर उन्हें क्या पता था कि एक दिन यही किनारे कानून की धाराओं में बहा दिए जाएंगे. धीरे—धीरे ये बसावतें बढ़ती चली गई. तहसीलें बनी, जिले बने और लंबे जनसंर्घषों के बाद राज्य बना तो सरकारी नुमाइंदे अपने साथ मैदानी क्षेत्रों के नियम—कानूनों की पोटली भी पहाड़ी राज्यों में लेते आये. नदियों के किनारों की बसावत को कामधेनू जान नेताओं और अफसरानों की मिलीभगत से प्राधिकरण के नाम से कानून लागू कर जनता को दुहना शुरू कर दिया. जनता आज तक भी गुहार लगाने में है कि, मैदानी क्षेत्रों के नियमों को पहाड़ों में तो लागू ना करो. लेकिन सुनने वाला कोई नही है. नदियों के किनारे की बसावट पर अचानक से प्राधिकरण की नजर में आ गई और फिर शुरू हुआ कामधेनु मॉडल. जनता गाय है, दूध दो, नहीं तो ध्वस्तीकरण का नोटिस लो. हाल ये हैं कि, नेता और अफसर इस गाय के असली मालिक बन बैठे हैं, और प्राधिकरण उनका दुहने का आधुनिक यंत्र बन गया है. अब तो जनता रूपी कामधेनू गाय को ब्लैकमेलर टाइप के तथाकथित समाजसेवी और पत्रकार भी दुहने में कोई कसर नही छोड रहे हैं. जनता गुहार लगाती रहती है कि, पहाड़ में मैदान का कानून मत लगाओ. लेकिन उनकी आवाज फाइलों में ऐसे दब जाती है जैसे सरकारी दफ्तर में पड़ी धूल. हर कोई उसे देखता है, लेकिन कोई हटाता नहीं. सुनने वाले कान व्यस्त रहते हैं. कहीं समीक्षा बैठक में, कहीं निरीक्षण में और कहीं समझौते में.मैदानों के ये कानून पहाड़ों में ऐसे थोपे गए जैसे किसी बच्चे को जबरन बड़ा जूता पहना दिया जाए. अब इस खेल में तथाकथित समाजसेवी और पत्रकार भी नए किरदार के रूप में शामिल हो चुके हैं. पहले ये लोग व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाते थे, अब व्यवस्था के साथ एडजस्ट हो गए हैं. ये तथाकथित समाजसेवी और पत्रकार तो वो योद्धा हैं जिनके पास कलम के साथ ही आरटीआई है. आरटीआई को इन्होंने सूचना का अधिकार नहीं, बल्कि सूचना का व्यापार बना दिया है. सवाल पूछे जाते हैं, जवाब मिलते हैं, और फिर शुरू होता है असली खेल. देख लीजिए, खबर छपवानी है या दबवानी है..? इनका काम करने का तरीका भी बड़ा दिलचस्प होता है. पहले इलाके में घूमो, अवैध निर्माण खोजो. जो कि वैसे भी हर चौथे—पांचवे माले में मिल ही जाता है. फिर फाइल निकालो, आरटीआई लगाओ, और जब सामने वाला घबराकर पसीना-पसीना हो जाए, तब धीरे से कान में कहो, देखिए, हम तो समाजसेवी हैं, समाज के साथ अपनी भी तो सेवा करनी जरूरी हुवी ना. वैसे भी शर्म और हया अब पुराने जमाने की चीजें हो गई हैं. जैसे ब्लैक एंड व्हाइट टीवी या कहें लैंडलाइन फोन. आज का समाजसेवी खुलेआम कहता है, भई! हमें तो आरटीआई से ये सूचना मिली है, अब तुम ही बताओ कि करना क्या है. नेता—अफसरानों को चढ़ावा चढ़ाने के बाद बने अवैध निर्माण पर इनकी चील की जैसी नजर रहती है. वैसे नेता और अफसर भी कोई कम खिलाड़ी नहीं हैं. उन्हें पता है कि यह पूरा खेल कैसे चलता है. इसलिए पहले से ही चढ़ावा ले लिया जाता है, ताकि अवैध निर्माण को वैध नजरों से देखा जा सके. और जो विरोध करता है, वह सबसे बड़ा अपराधी बन जाता है. उसे तुरंत कानूनी नोटिस का प्रसाद दे दिया जाता है. अदालत का नाम ऐसे लिया जाता है जैसे कोई ब्रह्मास्त्र हो. और आम आदमी अदालत का नाम सुनते ही वैसे ही डर जाता है जैसे बच्चा इंजेक्शन देखकर. इस पूरे सिस्टम में सबसे ज्यादा भयानक स्थिति उस आम नागरिक की होती है, जिसका निर्माण न तो पूरी तरह अवैध है, न पूरी तरह वैध. वह बीच में लटका हुआ रह जाता है जैसे सरकार की योजनाओं का लाभ. वह घर बनाता है तो अवैध. टैक्स देता है तो वैध. बिजली का बिल भरता है तो जिम्मेदार नागरिक और अगर रंगदारी के खिलाफ आवाज उठाने की कोशिश करता है तो उपद्रवी तत्व. बहरहाल! इस बात को जनता भी समझने लगी है कि, समाजसेवा अब सेवा नहीं, सेवा शुल्क बन चुकी है. पत्रकारिता अब मिशन नहीं, कमीशन हो गई है. और कानून अब न्याय का माध्यम नहीं, नियंत्रण का औजार बन गया है. मास्टरजी के सिखाये ककहरे की अब नई परिभाषा बनने लगी है. रंगदारी के इस ककहरे में अब हर कोई अपना अक्षर जोड़ने लगा है. कोई च से चुप्पी साधे बैठा है, कोई ज से जुगाड़ में लगा है. सबको पता है कि रंगदारी का यह खेल गलत है, पर कोई भी रंगदारी के इस खेल को छोड़ना नहीं चाहता. क्योंकि इस खेल में हारने वाला भी कुछ न कुछ लेकर ही जाता है और जीतने वाला तो खैर, राजा ही होता है. लगता है हम यूँ ही रंगदारी के इस पाठ को रटते रहेंगे, और अगली पीढ़ी को भी यही सिखाएंगे. क्योंकि इस नए जमाने में सच बोलना जोखिम है, और चुप रहना सबसे सुरक्षित निवेश.








































