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संस्कृति

गिर्दा की याद में नैनीताल की होली….शिवज्यू कै मार मुठ्ठी रंगै की,सार हिमाल है गो छौ रंगीलो।’’

भुवन चन्द्र शर्मा, नैनीताल। सी.आर.एस.टी. इन्टर कॉलेज के लगभग 8 से 15 साल के बच्चे एक कमरे में बैठे हैं। मैं भी उसी कमरे में बैठा हूँ। तभी एक आदमी आता है और बसंत तथा होली के बारे में बताने लगता है-
‘‘रात उज्याली कि घाम निमैलो,
डान-काना में केसिया फूलो।
शिवज्यू कै मार मुठ्ठी रंगै की,
सार हिमाल है गो छौ रंगीलो।’’
‘‘इसका मतलब ये है बबा- आजकल रात में भी उजाला है, कि हर तरफ चाँदनी बिखरी पड़ी है। दिन की धूप में गर्माहट आने लगी है। पर्वत शिखरों पर केसिया के फूल खिल रहे है। और तो और बभूत धारण करने वाले औघड़ जोगी (यानी यानी कि शिव) को हमने जो मुठ्ठी भर गुलाल भारा तो सारा हिमालय रंगीन हो गया है। ‘‘क्यों न हो बबा, जब प्रकृति में रंग-बिरंगे फूल खिल रहे है, पक्षी चहक रहे हैं। भौंरे गुन-गुन का संगीत सुना रहे हंै। यानी कि हमारी धरती में नया यौवन आ गया है तो इसका असर मनुष्य पर होना स्वाभाविक है। भारत में इसकी अभिव्यक्ति होली के रूप हुई होगी। पूरी दुनियाँ में जब भी बसंत आता होगा तो उस क्षेत्र में इसी तरह का कोई त्यौहार किसी न किसी रूप में जरूर मनाया जाता होगा।’’ बहरहाल, आज बात हो रही है होली की और ‘युगमंच’ के होली महोत्सव की। आज से लगभग 30 साल पहले जब होली का मतलब सामान्यतः ‘रंग बरस,े भीगे चुनर वाली, रंग बरसे’ हो गया था तो युगमंच के कर्णधारों जैसे प्रो. शेखर पाठक, गिरीश तिवाड़ी ‘गिर्दा’, जहूर आलम, विश्वम्भर नाथ साह ‘सखा’, डाॅ. विजय कृष्ण आदि-आदि ने होली की हमारी पहाड़ की इस अद्भुत सांस्कृतिक धरोहर के परम्परागत स्वरूप से नई पीढ़ी को अवगत कराने हेतु लगभग 28-29 साल पहले ‘युगमंच होली महोत्सव’ की शुरूआत की। कारवाँ चलता ही रहा, जो कि आज तक जारी है। महोत्सव के तहत, विशेषकर पहाड़ की परम्परागत खड़ी होली से पहाड़ की नयी पीढ़ी से अवगत कराने हेतु खड़ी होली के लिए मशहूर चम्पावत (पाटी), ओखलकांडा, बागेश्वर आदि से टीमें आमंत्रित की जाती हैं, जो कि नैनीताल शहर के नुक्कड़ों पर परम्परागत होली के गायन और इसके पदक्रम का प्रदर्शन कर हमें इस गौरवशाली सांस्कृतिक परम्परा से अवगत कराती हैं।इसी होली महोत्सव के कारवाँ के बीच शायद सन् 2003-04 के बीच ‘युगमंच’ ने सोचा कि क्यों न हम अपनी परम्परागत होली से नयी पीढ़ी को अवगत करायें। इसके लिये होली कार्यशाला की परिकल्पना की गयी और उसे धरातल पर उतारा गया। इस कार्यशाला के निर्देशक गिरीश तिवाड़ी ‘गिर्दा’ थे। साथ में उनका सिपहसालार मैं भी। मैं तब तक होली के बारे में बहुत कुछ नहीं जानता था (कौन सा आज जान रहा हूँ)। गिर्दा पूछते हैं कौन सी खड़ी होली बच्चों को बतायी जाये। मेरे मुँह से निकल पड़ता है, ‘‘कह दीजो रघुनाथ भरत से कह दीजो।’’ ‘‘बबा, है तो यह पुरानी होली,’’ गिर्दा बोलते हैं और बच्चों को इस होली तथा उसकी तर्ज आदि पर रिहर्सल शुरू होती है। फिर गिर्दा होली के अन्य आयामों पर चर्चा करने लगते हैं कि जब पहाड़ों में होली के दरमियान तेज-तेज चलते हैं तो तेज लय वाली होली गायी जाती है, जिसे ‘बंजारा होली’ कहते हैं-
अफ बंजारो बनज गयो बन जै रौ छौ,
अंगना नींबू लगाय पिया बन जै रौ छौ।
नींबू निगोड़ा पाकि जानी मन भावे छौ,
खै जा बटुव्वा लोग पिया बन जै रौ छौ।

इस होली की भी रिहर्सल पूरी हो जाती है तो फिर गिर्दा कहते हैं कि हमारी पहाड़ी होली में  अधिकतर ब्रज भाषा का प्रभाव है, क्योंकि यह मध्य काल में हमारे यहाँ आयी। लेकिन ऐसा भी नहीं है कि हमारी बोली में कोई होली ही न हो। फिर कुमाउँनी बोली की होली की रिहर्सल शुरू हो जाती है-
मेरि नथ गढ़ दे छैला सुनारा,
मेरि नथ गढ़ दैं छेला बे।
नथुलि गढ़ै को क्या देलि यारा,
तेरि नथ गढ़ द्योंलो छैला बे।

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इस तरह कार्यशाला सम्पन्न होती है। कदाचित् कुछ और होलियों की भी रिहर्सल हमने कराई थी। बहरहाल अब मौका था इन होलियों वे सार्वजनिक प्रदर्शन का। माँ नयना देवी के मंदिर में बच्चों ने सीखी हुई होलियाँ गाकर सबको अचम्भे में डाल दिया था। वहाँ उपस्थित लोग सोच रहे थे कि ये छोटे-छोटे बच्चेे ऐसी होलियांे को भी इस तरह सुर, लय, ताल में गा सकते हैं! इसके बाद नैनीताल के विभिन्न नुक्कड़ों, चैराहों पर बच्चों ने कार्यशाला के दौरान सीखी गयी होलियों का दो-तीन दिन तक गायन-प्रदर्शन किया। और तो और अंत में बच्चे आशीष देना तक नहीं भूलते थे-
जो नर जीवें, खेलें फाग,
हो हो होलक रे !
बरस दिवाली बरसै फाग,
हो हो होलक रे !
गावें खेले देवें अशीष,
हो हो होलक रे !
आज को बसंत कैका घरा…..
हो हो होलक रे !

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