उत्तराखण्ड
शराब में डूबता उत्तराखंड : राजस्व के नाम पर शराब की दुकानों को पहाड़ के कोने-कोने तक पहुंचाने की होड़
केशव भट्ट, बागेश्वर। उत्तराखंड, एक ऐसा राज्य, जिसे बनाने के लिए लोगों ने गोलियां खाईं, लाठियां झेलीं और अपने प्राणों की आहुति दी. एक छोटा सा सपना आम जनता का था, एक ऐसा पहाड़ी राज्य, जहां फैसले पहाड़ की जरूरतों के अनुसार हों, जहां गैरसेण सिर्फ एक भौगोलिक स्थान नहीं, बल्कि जनभावनाओं का केंद्र बने. लेकिन आज सवाल यह है कि, क्या यह वही उत्तराखंड है, जिसके लिए संघर्ष हुआ था ? या फिर यह एक ऐसा प्रदेश बन चुका है, जहां सत्ता की सुविधाएं मैदानी इलाकों में सिमट गई हैं और पहाड़ सिर्फ संसाधनों के दोहन का माध्यम बनकर रह गया है ? गैरसेण पर वर्षों से राजनीति हो रही है, लेकिन किसी भी सरकार में इतना साहस नहीं दिखा कि उसे स्थायी राजधानी घोषित कर सके. इसका एक ही कारण साफ लगता है, सभी को पहाड़ की चिंता से ज्यादा अपनी कुर्सी की सुविधा अहम लगती है. विकास के नाम पर सड़कों का चौड़ीकरण, नदियों का दोहन और जंगलों का कटान इन सबने पहाड़ की प्राकृतिक संरचना को कमजोर कर दिया है. परिणामस्वरूप, आपदाओं की आवृत्ति और तीव्रता दोनों बढ़ी हैं, और इसकी कीमत आम जनता अपनी जान देकर चुका रही है. वहीं दूसरी ओर, हर सरकार ने जिस विषय पर सबसे ज्यादा एकमत दिखाया है, वह है शराब और खनन. राजस्व के नाम पर शराब की दुकानों को पहाड़ के कोने-कोने तक पहुंचाने की जो होड़ लगी है, वह यह साबित करती है कि सरकार को पहाड़ के भविष्य से ज्यादा अपनी आय की चिंता है. इसमें कोई दोराय नहीं कि शराब और खनन को अपनी आर्थिकी मानकर हर सरकार ने यहां के हर पहाड़ी जिले में अधिक से अधिक दुकानें खोलने पर जोर दिया है, जबकि यहां के वासिंदे इन जहर की दुकानों को अपनी शांत वादियों में खुलने से रोकने के लिए सड़कों पर हैं. कुछ अखबारों और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के साथी लगातार यह मुद्दा उठाते हैं कि पहाड़ के गांवों में स्कूल नहीं हैं, अस्पताल नहीं हैं, सड़कें टूटी हैं, पलायन से गांव खाली हो गए हैं, लेकिन शराब की दुकानें समय पर खुल जाती हैं. इस सबके बावजूद कोई यह नहीं सोचता कि सरकार का यह कैसा विकास मॉडल है, जहां एक ओर युवा रोजगार के लिए पलायन कर रहे हैं, और दूसरी ओर जो बचे हैं, उन्हें नशे के दलदल में धकेला जा रहा है ? जल स्रोत सूख रहे हैं, बिजली महंगी है, और खेती जंगली जानवरों के कारण बर्बाद हो रही है. इन सबके बीच जब जनता अपनी जायज मांगों को लेकर आवाज उठाती है, तो उसे अकसर अनदेखा या दबा दिया जाता है. बागेश्वर जिले की ही बात करें तो गरूड़, काफलीगैर, सूपी और शामा जैसे अन्य तमाम क्षेत्रों में महिलाएं सड़कों पर हैं. वे नशे से अपने घर, अपने बच्चों और अपने समाज को बचाने की लड़ाई लड़ रही हैं. लेकिन सत्ता के गलियारों में यह आवाजें सुनाई नहीं देतीं. हर घर जल जैसी योजनाएं कागजों में सफल हैं, लेकिन जमीन पर जल स्रोत सूख चुके हैं. बिजली पहाड़ में बनती है, लेकिन यहीं के लोगों को महंगी मिलती है. खेती जंगली जानवरों के कारण बर्बाद है, और सरकार के पास इसका कोई ठोस समाधान नहीं है. लेकिन इसके बावजूद शराब की आपूर्ति में वह कभी पीछे नहीं रहती. शामा में लोग शामा में शराब की दुकान को बंद करने को लेकर आमरण अनशन पर बैठे हैं. कई गांवों के ग्रामीण अपने काम-धंधे छोड़कर आंदोलन में जुटे हैं. वहीं तंत्र का कहना है कि ये आंदोलन व्यक्तिगत स्वार्थों के चलते किए जा रहे हैं. अब तंत्र शायद यह समझने को तैयार ही नहीं कि इन दुर्गम और शांत क्षेत्रों में शराब की दुकान खोलने की जरूरत आखिर पड़ी ही क्यों ? यदि तंत्र का यह तर्क है कि अवैध शराब की शिकायतें थीं, इसलिए सरकारी दुकान खोलनी पड़ी तो यह समाधान नहीं, बल्कि समस्या को वैधता देना ही हुवा. उत्तराखंड में पहाड़ी क्षत्रों में बसे सैकड़ों गांव खाली हो चुके हैं. घोस्ट विलेज अब सरकारी आंकड़ों का हिस्सा बनते जा रहे हैं. नदियां बेची जा रही हैं, जंगल काटे जा रहे हैं, बुग्याल रौंदे जा रहे हैं. पर्यटन के नाम पर पहाड़ की आत्मा को कुचला जा रहा है. और जब प्रकृति आपदाओं के रूप में जवाब देती है तो वही जनता मारी जाती है, जिसने कभी इस विनाश की मांग नहीं की थी. शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क और रोजगार जैसी बुनियादी सुविधाओं के अभाव में लोग पलायन कर रहे हैं. जो बचे हैं, वे भी अब नशे और सामाजिक विघटन के खतरे से जूझ रहे हैं. बुजुर्गों और आंदोलनकारियों का यह सवाल भी नेपथ्य में डाल दिया गया है कि, क्या उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था अब शराब और खनन पर ही टिकी रहेगी ? क्या पहाड़ के युवाओं का भविष्य नशे में डुबोकर ही राजस्व बढ़ाया जाएगा ? क्या जनता की आवाजें सिर्फ ज्ञापनों तक सीमित रह जाएंगी ?शराब से मिलने वाला राजस्व अल्पकालिक समाधान हो सकता है, लेकिन इसके सामाजिक और सांस्कृतिक दुष्परिणाम दीर्घकालिक और विनाशकारी हैं. बहरहाल, जनता को यह समझना होगा कि सरकारें तभी बदलती हैं, जब जनता अपने सवालों पर अडिग रहती है. जनता को ही तय करना होगा कि वे अपने भविष्य को शराब की बोतलों में डूबने देंगे, या उसके खिलाफ एकजुट होकर खड़े होंगे. नैनीताल समाचार से साभार





































