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महाकुंभ विशाल मेले में नागा साधु शाही स्नान के होते है मुख्य आकर्षण के केन्द्र

महाकुंभ विशाल मेले में नागा साधु शाही स्नान के होते है मुख्य आकर्षण के केन्द्र
सीएन, प्रयागराज।
हमारे देश में हर 12 साल में आयोजित होने वाला भव्य आध्यात्मिक समागम महाकुंभ मेला दुनिया भर से लाखों श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करता है। प्रयागराज में महाकुंभ मेला शुरू हो गया है। इस मेले में नागा साधु खास आकर्षण केन्द्र होते हैं। महाकुंभ में सबसे खास होता है शाही स्नान जिस पर दुनियाभर के लोगों की आंखें टिकी होती हैं। शाही स्नान के साथ.साथ इस मेले का मुख्य आकर्षण नागा साधु होते है। इस विशाल मेले में नागा साधुओं की विशेष महत्ता है। यह खासतौर पर नागा साधुओं का पर्व होता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार नागा साधु सन्यासी संप्रदाय से जुड़े होते हैं। ये अपने शरीर पर भस्म रमाते हैं और निर्वस्त्र रहते हैं। इनका मुख्य उद्देश्य भौतिक दुनिया और सांसारिक मोह.माया से दूर रहकर ईश्वर की साधना करना होता है। नागा साधु बनने की प्रक्रिया अत्यंत चुनौतीपूर्ण और तपस्या से भरी होती है। नागा साधु बनने के लिए व्यक्ति को एक दीक्षा प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। इसमें अखाड़ा समिति यह देखती है कि व्यक्ति नागा साधु की दीक्षा प्राप्त करने योग्य है या नहीं। चयन होने के बाद यह प्रक्रिया लगभग 12 सालों की होती है। दीक्षा के दौरान साधकों को अत्यंत कठोर तप और संयम का पालन करना पड़ता है। अंतिम चरण में उन्हें शाही स्नान के दौरान नागा साधुओं के अखाड़े में शामिल किया जाता है। नागा साधु अपने शरीर पर वस्त्र इस लिए नहीं धारण करते हैं क्योंकि वह वस्त्रों को सांसारिक जीवन और आडंबर मानते हैं। उनके विचार से कपड़े भौतिकता का प्रतीक हैं। बड़ी बात यह है कि नागा साधु सोने के लिए बिस्तर का भी उपयोग नहीं करते हैं। इनसे दूरी बनाकर वे आत्मज्ञान और मोक्ष की ओर अग्रसर होते हैं। महाकुंभ में नागा साधुओं का शाही स्नान देखने के लिए देश.विदेश से करोड़ों लोग आते हैं। उनके साथ जुड़ी यह रहस्यमयी दुनिया भारत की प्राचीन आध्यात्मिक और सांस्कृतिक परंपरा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। नागा साधु भगवान शिव के अनुयायी होते हैं जिनके पास तलवार त्रिशूल गदा तीर धनुष जैसे हथियार होते थे। नागा साधुओं को अक्सर महाकुंभ अर्धकुंभ या  सिंहस्थ कुंभ में देखा जाता है। आदि गुरु शंकराचार्य ने सनातन धर्म की रक्षा के लिए केवल साधारण सैनिक नहीं बल्कि वैदिक सैनिक तैयार किए। ऐसे सैनिकों का एक संगठन बनाया गया जिनके पास धर्म के अलावा कोई और विरासत नहीं थी। उनके एक हाथ में वेद गीता उपनिषद और पुराण थे तो तो दूसरे हाथ में भाला तलवार और कृपाण। आदि गुरु शंकराचार्य ने ऐसे साधु सैनिकों का एक संगठन बनाया जो साधु भी थे और सैनिक भी। इन्हें ज्ञान देना और प्राण लेना दोनों का अभ्यास था। इन्हीं योद्धा साधुओं को उन्होंने नागा नाम दिया।  

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