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संस्कृति

आज 15 मार्च फूलदेई पर्व पर विशेष : उत्तराखंड का फूलदेई लोक पर्व प्रकृति के प्रति कृतज्ञता

प्रो. ललित तिवारी, नैनीताल। उत्तराखंड का फूलदेई  लोक  पर्व प्रकृति के प्रति कृतज्ञता ,बच्चों की पर्यावरणीय सीख ,सामूहिक खुशी तथा नव जीवन का स्वागत  के साथ पर्यावरण एवं प्रकृति के संरक्षण के प्रति  हमें  सचेत करता है।

फूलदेई  छम्मा देई ,

दैणी द्वार भर भकार।

यो देली सो बारम्बार ।।

फूलदेई छम्मा देई

जातुके देला ,उतुके सई ।। 

फ़ूल संग्रात मीन संक्रांति चैत्र मास की प्रथम तिथि को यह लोक पर्व आयोजित होता है  जो  नई फसल के आगमन  तथा बसंत उत्सव  का आगमन है। बच्चे बुरांश और प्योंली जैसे फूल घरों की  देहली पर रखकर सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। यह पर्व संस्कृति और प्रकृति के प्रेम को दर्शाता है तथा घर की देहली को पूजन का अर्थ ही खुशियों एवं ऊर्जा का घर में आगमन  की कामना है। बच्चे सुबह-सुबह घर-घर जाकर “फूलदेई, छम्मा देई, गीत गाते हुए  देहली पर फूल और चावल चढ़ाते हैं तथा  बच्चों को चावल, गुड़, नारियल और दक्षिणा (पैसे)  दिये जाते  हैं। जो ऋतु परिवर्तन, प्रकृति के प्रति सम्मान, और खुशी का उत्सव  को दर्शाता है। यह पर्व बच्चों द्वारा मनाए जाने के कारण इसे लोक बाल पर्व भी कहते है ।फूलदेई के अवसर पर एक विशेष पीले फूल का प्रयोग किया जाता है। जिसे प्योली का फूल कहते हैं।  लोक पर्व पर हलवा तथा स्याही बनाने की परंपरा है । स्याही   भीगे चावल को पीस  ,दही  डाल कर घी में बनाई जाती है । यह लोक पर्व जीवन में उत्साह के साथ  प्रकृति की प्रति धन्यबाद की साथ प्रकृति  संरक्षण एवं सामूहिक मंगल  कामनाओं का बोध कराता है ।उत्तराखंड के प्रसिद्ध  फ्यूंली का वानस्पतिक नाम रेनवर्डटिया इंडिका  तथा  जिसे पेओली, फ्यूंली, फ्योंली  भी कहते है तथा ये  उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में बसंत ऋतु से पहले खिलने वाला एक सुंदर पीला फूल है, जो स्थानीय लोककथाओं में जुड़ा  तथा कुल  लिनोएसी  से है। बुरांश उत्तराखंड का राज्य वृक्ष है तथा अपनी खूबसूरत लाल रंग के फ़ूल से जाना जाता है जिसका वानस्पतिक नाम  रोड़ों देंद्रोंन आर्बोरियम है । गुड़ गन्ने से तथा चावल धान    है । इस दिन से भिटोली की परंपरा  का माह भी शुरू होता है  है जो   भाई बहन  के स्नेह के  साथ मायके  के याद  से जुड़ा हुआ है ।  फूल देई  इसी लिए खुशी का पर्व है ।इसीलिए कहा है 

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ओ फुलारी घौर।

झै माता का भौंर ।

क्यौलिदिदी फुलकंडी गौर ।

डंडी बिराली छौ निकोर।

चला छौरो फुल्लू को।

खांतड़ि मुतड़ी चुल्लू को।

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हम छौरो की द्वार पटेली।

तुम घौरों की जिब कटेली।

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