संस्कृति
विक्रम संवत विशेष : 19 मार्च 2026 से शुरु हो रहे रौद्र नामक नवसंवत्सर पर प्रो. ललित तिवारी का आलेख
प्रो. ललित तिवारी, नैनीताल। विक्रम संवत, नव वर्ष चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा (चैत्र नवरात्रि का प्रथम दिवस ) से शुरू होता है। यह वसंत ऋतु, प्राकृतिक नवचक्र, सृष्टि की रचना, और भगवान राम के राज्याभिषेक से संदर्भित है । जिसे ‘गुड़ी पड़वा’ और ‘नव संवत्सर’ भी कहा जाता है। यह प्रकृति में ऋतु परिवर्तन के साथ जब वसंत ऋतु में नए पत्ते आने का और प्रकृति के नवजीवन के साथ खगोलीय गणना पर आधारित होता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, इसी दिन ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना शुरू की थी। भगवान राम का राज्याभिषेक तथा महाराज विक्रमादित्य ने शकों पर विजय इसी दिन प्राप्त की थी। महाराष्ट्र में इसे ‘गुड़ी पड़वा’ (विजय पताका) और अन्य स्थानों पर ‘नव संवत्सर’ के रूप में मनाया जाता है। नव वर्ष के पहले दिन नीम के पत्तों और मिश्री को मिलाकर खाने की परंपरा है, जो स्वास्थ्य के लिए अच्छी मानी जाती है। पंचांग के अनुसार यह नव वर्ष है और इस दिन से अगले 12 महीनों के राजा और मंत्री होते है । चैत्र नवरात्रि आध्यात्मिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक ,सकारात्मकता से नई ऊर्जा लाता है तथा सूर्योदय से यह प्रारंभ होता है यह समय पतझड़ के बाद प्रकृति में नई पत्तियां आने, फसलों के तैयार होने और मौसम के सुहावना होने का प्रतीक है। यह प्राकृतिक चक्र (सूर्य और चंद्रमा की स्थिति) पर आधारित है। इसी दिन गुड़ी पड़वा (महाराष्ट्र) और चेटीचंड (सिंधी समाज) ,चैत्र शुक्लादी , उगादी ,नवरेह ,सज्बू चेयरबा भारतीय संस्कृति और परंपरा का प्रतीक है। नव विक्रमी संवत् 2083 का आरंभ 19 मार्च 2026 से हो रहा है। संवत 2083 का नाम रौद्र होगा। नव वर्ष का आरंभ उत्तराभाद्रपद नक्षत्र में और शुक्ल योग के मीन लग्न में होगा। शास्त्रों और प्रचलित परंपरा के अनुसार, नवसंवत के राजा का निर्णय चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के वार अनुसार ही किया जाता है। गुरुवार से नव संवत का आरंभ होने के कारण आगामी वर्ष (संवत्) का राजा ‘गुरु’ होंगे। साथ ही इस संवत का मंत्री मंगल होंगे।
‘मध्यसस्या भवेद्धात्री सामान्येन प्रवर्तनम् ।
दुर्मतीनां महत्त्वं स्याद् दुर्मतौ वर्णसंक्रमः ।।’
ब्रह्म पुराण के अनुसार, चैत्र शुक्ल प्रतिपदा तिथि को सूर्योदय के समय ही ब्रह्माजी ने इस सृष्टि की रचना की थी। तथा सतयुग का आरंभ भी इसी दिन हुआ था। इसी महत्व के कारण महामहिम सार्वभौम सम्राट विक्रामादित्य जी ने भी अपने संवत्सर का आरंभ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन सूर्योदय के समय माना था। नव संवत्सर में ” ॐ जयंती मंगला काली भद्र काली कपलिनी दुर्गा क्षमा शिवधात्री स्वाहा स्वधा नमोस्तुते ” मंत्र का जाप शुभ माना गया है । विक्रम संवत की शुरुआत 57 ईसा पूर्व (57 बीसीई) में उज्जैन के राजा विक्रमादित्य द्वारा शकों पर विजय प्राप्त करने के उपलक्ष्य में की गई थी। अंग्रेजी कैलेंडर से 57 वर्ष आगे चलने वाला चंद्र-सौर पंचांग पर आधारित है। शक संवत की शुरुआत 78 ईस्वी एडी में हुई थी, और यह भारत का राष्ट्रीय कैलेंडर है जिसे 1957 में अपनाया गया था। इसकी शुरुआत कुषाण शासक कनिष्क के राज्याभिषेक से जुड़ी है, हालांकि कुछ मत इसे शकों पर विजय से भी जोड़ते हैं, लेकिन 78 ई. की तिथि मुख्य रूप से स्वीकार्य है। इसे कभी-कभी सातवाहन शासक शालिवाहन से जोड़ा जाता है। दोनों कैलेंडर मूल रूप से सौर-आधारित हैं, जो अपनी गणनाओं के आधार के रूप में सौर वर्ष का उपयोग करते हैं। 19 मार्च से शुरू होने वाले नववर्ष (चैत्र शुक्ल प्रतिपदा) के साथ शक संवत 1948 के साथ विक्रम संवत 2083 की शुरुआत होगी। इसी के साथ सृष्टि के युग का आरंभ युगाब्द भी ज्यादा है जिसका अर्थ: ‘युग’ (कालखंड) + ‘अब्द’ (वर्ष) अर्थात युग के आरंभ से बीता हुआ समय ।भारतीय कालगणना के अनुसार कलियुग के आरंभ से अब तक के वर्षों की गणना है। इसकी शुरुआत पौराणिक मान्यता के अनुसार महाभारत युद्ध के बाद भगवान कृष्ण के बैकुंठ गमन के समय, यानी लगभग 3102 ईसा पूर्व से मानी जाती है। यह समय हिंदू नववर्ष की शुरुआत का प्रतीक भी है। इसीलिए इसे कलियुगाब्द भी कहा जाता है। 2026 में युगाब्द 5128 वर्ष जो चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (नव संवत्सर) से आरंभ होती है।
























