धर्मक्षेत्र
चैत्र नवरात्र : वास्तु शास्त्र के अनुसार मां की मूर्ति या कलश स्थापना ईशान कोण में करना उत्तम
चैत्र नवरात्र : वास्तु शास्त्र के अनुसार मां की मूर्ति या कलश स्थापना ईशान कोण में करना उत्तम
सीएन, हरिद्वार। वास्तु शास्त्र के अनुसार पूजा के लिए उत्तर या उत्तर-पूर्व यानी ईशान कोण दिशा सबसे शुभ मानी जाती है। इस दिशा को देवस्थान भी कहा जाता है। मां की मूर्ति या कलश स्थापना ईशान कोण में करें। इस दिशा में पूजा करने से सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है। पूजा करते समय मुख पूर्व दिशा की ओर होना चाहिए। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार चैत्र माह एवं आश्विन महीने की प्रतिपदा तिथि से नवरात्रि व्रत प्रारंभ हो जाते हैं, इसका शुभारम्भ घटस्थापना से किया जाता है जिसे कलश स्थापना भी कहा जाता है। प्रतिपदा तिथि पर नवरात्रि व्रत का शुभारम्भ किया जाना चाहिए और इस दिन कलश या घट की स्थापना की जानी चाहिए, सर्वप्रथम कलश को गंगाजल से भर लेना चाहिए, तत्पश्चात उसमे आम के पत्ते जिन्हे पांच पल्लव भी कहा जाता है एवं पंचरत्न डालना चाहिए। अगर इस पूजन को प्रथम दिवस पर उत्तम विधि से किया जाए तो यह भक्तों की सारी अभिलाषाएं पूरी कर सकता है। इस बार नवरात्रि में मुहूर्त का अंतराल काफी कम है। शारदीय नवरात्र में कलश स्थापना का एक अपना महत्व है और नवरात्रि के प्रथम दिवस पूजा करने के स्थल पर कलश या घट की स्थापना की जाती है। यह बहुत आवश्यक है की घट या कलश की स्थापना सही और उचित मुहूर्त में ही होनी चाहिए। हिन्दू पुराणों के अनुसार नवरात्रि के दिन दुर्गा माँ की उपासना एवं पूजा करने के लिए होते हैं और काफी भक्त गण अपने अपने घरों पर कलश या घट की मंगल स्थापना करते हैं। इस अवधि में भक्त 9 दिनों तक उपवास भी रखते हैं। नवरात्री पर्व की प्रथम तिथि को कलश की स्थापना की जाती है और इसी दिवस को 9 दिनों तक जलने वाली एक अखंड ज्योति भी जलाई जाती है। यह बहुत आवश्यक है की घट स्थापना करते वक़्त अगर कुछ नियमों का पालन किया जाए तो और भी शुभकारी होता है क्योंकि ऐसा माना जाता है की जो भक्त नियमों का पालन करते हैं, उनसे माता अत्यधिक प्रसन्न हो जाती है। सर्वप्रथमए कलश पर स्वास्तिक बनाया जाना चाहिए, तत्पश्चात कलश पर मौली बाँध देनी चाहिए। इसके बाद कलश में इत्र, फूल, साबुत सुपारी, सिक्का, अक्षत एवं पंचरत्न भी डालना चाहिए। इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए की कलश की स्थापना सिर्फ शुभ मुहूर्त में ही की जाए। स्नान इत्यादि नित्य कर्म से निवृत्त होने के बाद भक्तों को ध्यान लगाना चाहिए। इसके बाद एक लकड़ी के एक पाटे पर सफ़ेद एवं लाल कपडा बिछाएं, ध्यान रहे की यह पाटा पूजा स्थल से अलग हो। तत्पश्चात अक्षत के उपयोग से इस लकड़ी के पाटे पर अष्टदल बना कर जल से भरा हुआ कलश स्थापित करें। भक्तों को ध्यान रखना चाहिए की कलश का मुंह खुला हुआ नहीं हो और उसे किसी चीज़ से ढक दिया जाए। अगर कलश पर कोई ढक्कन लगा है तो उसके बीचोंबीच एक नारियल रख दें और उसे चावलों से भर दें। इस कलश में अब हलकुण्ड, रजत का सिक्का, कमल गट्टे एवं शतावरी जड़ी डाल दें। अब दीप प्रज्ज्वलन करके अपने इष्ट देव का ध्यान करना चाहिए। इसके बाद देवी के मंत्र नवार्ण मंत्र ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे! का जाप करना चाहिए। तत्पश्चात कलश के सामने मिट्टी के पात्र में जौ एवं गेंहू को रोंप दें। इस ज्वारे को माताजी का स्वरूप मान करके पूजा करनी चाहिए। जब कलश की स्थापना हो जाये तो दोनों वेला में मंत्र सप्तशती या चालीसा। का जाप करना चाहिए। यह भी अच्छा रहेगा अगर दोनों समय आरती की जाए, माँ को दोनों समय वेला भोग भी लगाना चाहिए। माँ के लिए सबसे अच्छा भोग लाल फूल, बताशा एवं लौंग होता है, ध्यान रहे की माँ के ऊपर तुलसी मदार, आक या दूब बिलकुल न चढ़ाएं। भक्तों को पूरे नौ दिन अपना आहार और आचरण सात्विक रखना चाहिए। अंतिम दिन इन ज्वारों का विसर्जन कर देना चाहिए। उत्तर पूर्व दिशा में माता की प्रतिमा एवं घट स्थापित करना उचित रहता है। अखंड ज्योति का प्रज्ज्वलन पूर्व दक्षिण दिशा में करें और पूजा करते समय अपना मुंह उत्तर या पूर्व दिशा की और रखना चाहिए। अगर चन्दन की लकड़ी के पाटे पर घट स्थापना की जाए तो इसे शुभ माना जाता है। साथ ही इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए की पूजा स्थल साफ़ सुथरा हो। पूजा स्थल के सामने थोड़ा खुला स्थान होना चाहिए जहाँ पर बैठकर पूजा पाठ एवं ध्यान किया जा सके। पूजा स्थल के ऊपर अगर टांड हो तो वह साफ़ होनी चाहिए और उसमे गन्दगी नहीं होनी चाहिए। जहाँ पर घट या कलश की स्थापना की जाती है, उसके आसपास स्नानघर या शौचालय नहीं होना चाहिए।
भक्तों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए की शास्त्रों के अनुसार शुक्ल प्रतिपदा मुहूर्त की अमावस्या में कलश स्थापित नहीं करना चाहिए इसलिए किसी भी हाल में इस समय घट स्थापना न करें।
