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पर्यावरण

हिमालय कर रहा है गंभीर जलवायु संकट का सामना, बर्फबारी व बारिश की कमी

महेश चंद्र पुनेठा, नैनीताल। चिंताजनक ट्रेंड और इसके दूरगामी प्रभाव हिंदुकुश हिमालय (HKH) क्षेत्र, जिसे ‘एशिया का जल टावर’ कहा जाता है, पिछले कुछ वर्षों में एक गंभीर जलवायु संकट का सामना कर रहा है। इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (ICIMOD) की HKH Snow Update 2025 रिपोर्ट (अप्रैल 2025) के अनुसार, 2024-2025 की सर्दी (नवंबर 2024 से मार्च 2025) में मौसमी बर्फ की स्थिरता (snow persistence) सामान्य से 23.6 प्रतिशत कम रही—यह पिछले 23 वर्षों (2003-2025) में सबसे कम स्तर है। यह लगातार तीसरी सर्दी है जिसमें बर्फबारी सामान्य से नीचे रही है। पिछले पांच सर्दियों (2020-2025) में से चार में सामान्य से कम बर्फबारी दर्ज की गई है, जिसे स्नो ड्राउट की स्थिति माना जा सकता है।रिपोर्ट में सभी 12 प्रमुख नदी बेसिन (इंडस, गंगा, ब्रह्मपुत्र आदि) में कमी दिखाई गई है। गंगा बेसिन में -24.1 प्रतिशत (23 वर्षों में सबसे कम), जबकि मेकांग और साल्वीन बेसिन में 50 प्रतिशत से अधिक की गिरावट दर्ज हुई। यह ट्रेंड लगभग दो अरब लोगों की जल सुरक्षा को खतरे में डाल रहा है, क्योंकि ग्रीष्मकाल में नदी प्रवाह कम होने और सूखे का जोखिम बढ़ रहा है।उत्तराखंड में स्थिति विशेष रूप से गंभीर रही। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के आंकड़ों के अनुसार, दिसंबर 2025 में राज्य में वर्षा और बर्फबारी में 100 प्रतिशत कमी (पूर्ण deficit) दर्ज की गई — पिछले एक दशक में सबसे अधिक। उच्च हिमालयी चोटी तुंगनाथ (लगभग 12,000 फीट) पर जनवरी 2026 में अब तक कोई बर्फ नहीं जमी — केवल ठंढ (frost) देखी गई। वैज्ञानिकों के अनुसार, 1985 से शुरू हुए व्यवस्थित अवलोकनों के बाद यह पहली बार हुआ है।हिमालय वैश्विक औसत से तेज गर्म हो रहा है। कुछ अध्ययनों में पिछले दो दशकों में हिमालयी चोटियों पर स्नो सरफेस टेम्परेचर में 4 डिग्री सेल्सियस से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई है, जिसमें ब्लैक कार्बन एक प्रमुख योगदानकर्ता है। उच्च ऊंचाई पर बर्फ की जगह बारिश बढ़ रही है, जिससे ठंडी बर्फ जमा नहीं हो पाती।स्नो लाइन (बर्फ रेखा) लगातार ऊपर की ओर खिसक रही है। कुमाऊं विश्वविद्यालय के शोध (1990-2022) के अनुसार, गोरी गंगा बेसिन में स्नो लाइन औसतन 520 मीटर (लगभग 16 मीटर प्रति वर्ष) ऊपर चली गई है। इससे वनस्पति और ट्रीलाइन भी ऊपर बढ़ रही है।एक प्रमुख कारक सरफेस अलबेडो में कमी है। शुद्ध बर्फ 80-90 प्रतिशत सूर्य की किरणें परावर्तित करती है, लेकिन ब्लैक कार्बन (सूट) और धूल के जमाव से यह क्षमता कम हो रही है। अध्ययनों में अलबेडो में 0.8-3.8 प्रतिशत या अधिक की कमी दर्ज हुई है (कुछ विशिष्ट मामलों में उच्च अनुमान 20-58 प्रतिशत तक मॉडल-आधारित हैं)। इससे 3000-6000 मीटर की ऊंचाई पर तापमान बढ़ता है और बर्फ जल्दी पिघलती है। ब्लैक कार्बन मुख्य रूप से मैदानी क्षेत्रों (भारत-नेपाल) से आता है। कारण बहुआयामी हैं: वैश्विक: जलवायु परिवर्तन, ग्रीनहाउस गैसें, कमजोर पश्चिमी विक्षोभ।स्थानीय: वनों की कटाई, भूमि उपयोग परिवर्तन, अंधाधुंध निर्माण, वाहन उत्सर्जन, जंगल की आग, अनियंत्रित पर्यटन और उच्च क्षेत्रों में बढ़ती मानवीय गतिविधियां — ये ब्लैक कार्बन और डस्ट को बढ़ाते हैं परिणाम दूरगामी:ग्लेशियर तेजी से पीछे खिसक रहे हैं। सॉलिड वाटर स्टोरेज (बर्फ/ग्लेशियर) में कमी; नदियों में ग्रीष्मकालीन प्रवाह कम होने का खतरा। परंपरागत जल स्रोत सूख रहे हैं। भूस्खलन, बाढ़ और ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOFs) जैसी आपदाएं बढ़ रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वैश्विक उत्सर्जन कम नहीं किया गया तो HKH में ग्लेशियरों का बड़ा हिस्सा खो सकता है। ICIMOD ने अनुकूलन रणनीतियों पर जोर दिया है—बेहतर जल प्रबंधन, सूखा तैयारियां, प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली, क्षेत्रीय सहयोग और ब्लैक कार्बन नियंत्रण।उत्तराखंड सहित पूरे हिंदुकुश हिमालय के लिए यह समय रहते कार्रवाई का आह्वान है, अन्यथा यह संकट जनजीवन, अर्थव्यवस्था और पारिस्थितिकी के लिए अभूतपूर्व चुनौती बन जाएगा। नैनीताल समाचार से साभार

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