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स्वास्थ्य

शिकायतकर्ता जोशी की पहल पर हरकत में आया स्वास्थ्य विभाग, राज्यभर के चिकित्सकों को सख्त चेतावनी

सीएन, देहरादून/भीमताल। उत्तराखंड चिकित्सा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग ने राज्य में चिकित्सकों द्वारा मेडिकल काउंसिल के नियमों के उल्लंघन को गंभीरता से लेते हुए सख्त रुख अपनाया है। यह कार्रवाई सीएमएचएल पोर्टल पर दर्ज शिकायत के निस्तारण के दौरान सामने आई है। यह शिकायत चन्द्र शेखर जोशी, निवासी भीमताल (उत्तराखंड) द्वारा दर्ज कराई गई थी। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि राज्य के कई चिकित्सक अपने क्लीनिकों व दस्तावेजों पर अपनी मान्यता प्राप्त डिग्रियाँ एवं राज्य मेडिकल काउंसिल द्वारा जारी पंजीकरण संख्या का प्रदर्शन नियमों के अनुरूप नहीं कर रहे हैं, जिससे आम जनता भ्रमित होती है और चिकित्सा व्यवस्था की विश्वसनीयता प्रभावित होती है। स्वास्थ्य महानिदेशालय, देहरादून द्वारा किए गए परीक्षण में पाया गया कि अनेक चिकित्सालयों में नियमों का पालन नहीं किया जा रहा है। इन नियमों के तहत प्रत्येक चिकित्सक को अपनी राज्य मेडिकल काउंसिल पंजीकरण संख्या क्लीनिक, प्रिस्क्रिप्शन, प्रमाण-पत्र एवं रसीद पर स्पष्ट रूप से प्रदर्शित करना अनिवार्य है। चिकित्सक अपने नाम के साथ केवल वही डिग्री/डिप्लोमा/मैम्बरशिप अंकित कर सकते हैं, जो मान्यता प्राप्त हों और वास्तविक व्यावसायिक योग्यता को दर्शाती हों। विभाग द्वारा पत्र संख्या 24/राजयो/13/2025 के माध्यम से सभी जिला स्तरीय स्वास्थ्य अधिकारियों को निर्देश जारी किए गए हैं कि राज्य के सभी चिकित्सकों को तत्काल नियमों के अनुपालन के लिए सचेत किया जाए। भविष्य में किसी भी प्रकार के उल्लंघन पर कड़ी विभागीय कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। चिकित्सा व्यवस्था में पारदर्शिता एवं जन-विश्वास बनाए रखा जाए। शिकायतकर्ता चन्द्र शेखर जोशी ने स्वास्थ्य व्यवस्था में पारदर्शिता सुनिश्चित करने हेतु यह शिकायत दर्ज कराई थी। जांच व परीक्षण के बाद विभाग ने न केवल शिकायत का संज्ञान लिया, बल्कि पूरे राज्य के लिए दिशा-निर्देश जारी कर दिए। जोशी का कहना है यदि चिकित्सक अपनी मान्यता प्राप्त डिग्रियाँ और पंजीकरण संख्या प्रदर्शित नहीं करते हैं, तो मरीज भ्रमित होता है। चिकित्सा व्यवस्था की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए नियमों का पालन बेहद जरूरी है। स्वास्थ्य विभाग के अनुसार ऑनलाइन शिकायत प्रणाली से पारदर्शिता बढ़ी है। आमजन की शिकायतों के आधार पर त्वरित सुधारात्मक कदम संभव हो रहे हैं। यह प्रकरण इस बात का प्रमाण है कि जन सहभागिता से स्वास्थ्य व्यवस्था को अधिक उत्तरदायी और भरोसेमंद बनाया जा सकता है।

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