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अब कुतुबमीनार पर उठ रहे हैं सवाल, हिंदू पक्ष ने बताया ‘सूर्य स्तंभ’

चौथी शाताब्दी का लौह स्तंभ 12वीं शाताब्दी की कुतुबमीनार में मौजूद
सीएन, नईदिल्ली।
ज्ञानवापी मस्जिद, ताज महल और कुतुबमीनार को लेकर देश में तीखी बहस छिड़ी हुई है. कुतुबमीनार पर कई सवाल उठ रहे हैं. कुबुतमीनार को लेकर कुछ ऐसे तथ्य सामने आए हैं जिन्हें नकारा नहीं जा सकता है. पुरातत्व विशेषज्ञों ने, इतिहासकारों ने अब साक्ष्यों के आधार पर कुतुबमीनार से जुड़े कुछ सवाल उठाए हैं. कुतुबमीनार के प्रांगण में शिलालेख पर कई कड़वे सच दर्द हैं. दावा किया गया है कि 27 मंदिरों के मलबे से यह इमारत बनाई गई है. कुतुबमीनार में मंदिरों की घंटियों की आकृति बनी हुई है. यहां भगवान गणेश की प्रतिमाएं हैं. खंभों पर हिदूं देवी देवताओं की आकृतियां बनी हुई हैं. इतिहास को नए सिरे से पढ़ा या लिखा जा सकता है या नहीं, ये तो विवाद का सवाल हो सकता है लेकिन आंखें जो देखती हैं उसी परिप्रेक्ष्य में इतिहास की व्याख्या की जा सकती है. पुरातत्व विशेषज्ञों ने, इतिहासकारों ने अब साक्ष्यों के आधार पर कुछ सवाल उठाए हैं. कुतुबमीनार की मुगलिया पहचान को चुनौती देने वाले मानते हैं कि ये दरअसल सम्राट विक्रमादित्य के समय में बनी एक वेधशाला है जिसे उनके दरबार के खगोल विज्ञानी आचार्य वराह मिहिर ने बनवाया था. उन्हीं के नाम पर इस जगह का नाम मिहिरावली पड़ा जिसे आज महरौली कहा जाता है. यहां मस्जिद के शिलालेख पर लिखा है कि मंदिरों के मलबे से यह इमारत बनी है लेकिन कुतुबमीनार बनाए जाने की ज़िक्र नहीं. कुतुबमीनार में प्रवेश करते ही सामने पड़ती है कुव्वत उल इस्लाम मस्जिद. इसे भारत की सबसे पुरानी मस्जिद माना जाता है. इसी के शिलालेख पर लिखा है कि इस मस्जिद को 27 मंदिरों को तोड़कर उसके मलबे से बनाया गया है. आप इस मस्जिद के प्रांगण में जाएंगे तो आपको जगह जगह देवी देवताओं की मूर्तियां बनी दिख जाएंगी. मंदिर की घंटियों की आकृतियां नज़र आएंगी। इन्हें देखकर साफ लगता है कि ये मंदिरों के ही अवशेष हैं. पुरातत्वविद् ये सवाल भी उठाते हैं कि अगर कुतुबमीनार को मुगल शासकों ने बनवाया होता तो उसका महिमामंडन भी किया होता लेकिन ऐसा महिमामंडन कहीं नहीं मिलता. हालांकि कुतुबमीनार पर अरबी में और फारसी में कुछ आयतें लिखी हैं. सुल्तानों के नाम लिखे हैं. ये नहीं लिखा कि इसे किसने बनवाया है. एआईएस के पूर्व निदेशक धर्मवीर शर्मा का ये दावा है कि ये अरबी की आयतें बाद में उपर से लगाई गई हैं. चौथी शाताब्दी का लौह स्तंभ 12वीं शाताब्दी की कुतुबमीनार में मौजूद है. कुतुबमीनार के प्रांगण में है कुव्वत उल इस्लाम मस्जिद. कहा जाता है कि ये भारत की पहली मस्जिद है. इस मस्जिद के प्रांगण में लगा लौह स्तंभ चौथी शाताब्दी का है. इस स्तंभ को विष्णु स्तंभ कहा जाता है. लोहे के इस खंभे पर कभी ज़ंग नहीं लगा. जिसके बारे में आज भी रहस्य कायम है कि ऐसा कैसे संभव है. ये भी माना जाता है कि अगर आप इस लोहे के स्तंभ को बाहों से पूरा घेर लें तो आपकी मन्नत पूरी हो सकती है. हालांकि अब ये लौह स्तंभ आम लोगों के हाथ लगाने की पहुंच से दूर कर दिया गया है. इस स्तंभ पर संस्कृत में कुछ लिखा है. उसी प्रांगण में लगा है संस्कृत भाषा का अंग्रेजी अनुवाद–जिसका भाव इस प्रकार है. “तलवार से जिसका शौर्य लिखा गया हो, जिसने सिंधु नदी के सातों मुखों को युद्दों में पार कर लिया, वो राजा दूसरे लोक को प्रस्थान कर गया है. चंद्र के नाम के राजा ने जो चंद्रमा सी सुंदरता वाला था, उसने भगवान विष्णु के स्तंभ को विष्णुपद पर्वत पर स्थापित किया.” ऐसा माना गया है कि ये राजा चंद्रगुप्त द्वितीय के बारे में कहा गया है. इस पत्थर पर लिखा है कि ये चौथी शाताब्दी का स्तंभ है. हालांकि वहां लगे शिलालेख में ये भी लिखा गया है कि इस पिलर/स्तंभ को वहां लाकर लगाया गया है. कुतुबमीनार की संरचना के आधार पर इसे सूर्य स्तंभ माना जाता है. इतिहास की किताबों में आपने पढ़ा होगा कि 1193 में कुतुबुद्धीन ऐबक ने इसे बनवाना शुरु किया, फिर उनके उत्तराधिकारी अल्तमश और फिर 1368 में फिरोजशाह तुगलक ने इसे पूरा किया लेकिन पुरातत्व विज्ञान को जानने वाले एक्सपर्ट्स के मुताबिक कुतुबमीनार दरअसल सूर्य, सौरमंडल और नक्षत्रों के विश्लेषण के लिए बनाई गई एक ऑब्ज़रवेटरी है. पांच मंज़िला इस मीनार में बनी खिड़कियां दरअसल 27 नक्षत्रों की स्टडी के लिए बनाई गई हैं. ये दरअसल खिड़कियां या झरोखे नहीं हैं बल्कि ये इस तरह से बनाए गए हैं जिससे लोग वहां बैठ सके और खगोलविज्ञान की पढ़ाई कर सकें, सूर्य और नक्षत्र की पढ़ाई कर सकें. दावा ये भी किया जाता है कि वर्ष में एक दिन कुतुबमीनार की छाया पृथ्वी पर नहीं पड़ती. ऐसा हर वर्ष 21 जून को दोपहर 12 बजे होता है. इस दिन सूर्य उत्तरायण से दक्षिणायन में प्रवेश करता है. कुतुबमीनार 25 इंच दक्षिण की ओर झुकी हुई है. आर्किटेक्चर के जानकार मानते हैं कि कर्क रेखा पर 5 डिग्री उत्तर की तरफ स्थित है. ये निर्माण विशेष रुप से सौरमंडल और नक्षत्रों की गणना के लिए किया गया. कहा जाता है कि कुतुबमीनार की सीध में खड़े होकर अगर कोई 25 इंच पीछे की ओर पीछे झुक जाए और आसमान की ओर देखे तो वो ध्रुव तारे को देख पाएगा.

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