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जन मुद्दे

मुद्दा : 70 विधायक अपने ही गांव की सुध लेते तो आज 1500 गांव चमक जाते

सांसद उन गांवों को भूल ही गये होंगे जिन्हें पीएम नरेन्द्र मोदी ने गोद लेने को कहा था
हरीश मैखुरी, देहरादून। उ
त्तराखंड के विधायक पांच वर्षों में केवल अपना गांव भी चमका देते तो सत्तर विधायकों के सत्तर गांव तो सुविधा संपन्न होते, बीस वर्षों में 1500 गांव तो बांजा नहीं पड़ते, यहां तो कई विधायकों की पैतृक कूड़ी बंजर बनी हुई है और देहरादून में अट्टालिका खड़ी हो गयी, हवोंणि खांणि डेरादूण। अब तो गैरसैंण स्थाई राजधानी की बात भी पूरी तरह ठंडे बस्ते में चले गयी है। विधानसभा अध्यक्ष का पिछले दिनों आधिकारिक प्रेसनोट था अब भराड़ीसैंण में प्रशिक्षण केन्द्र बनेंगे ताकि वहां वर्ष भर चहल-पहल रहे। किसी जागरूक नागरिक ने इस पर सवाल नहीं पूछा कि ट्रेनिंग सेंटर की बजाय सरकार अपनी घोषणा के अनुरूप ग्रीष्म कालीन राजधानी में बैठना कब शुरू करेगी ? उत्तराखंड में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आदेश पर सांसदों ने जो गांव गोद लिए थे उनकी क्या स्थिति है सांसद उन गांवों को भूल ही गये होंगे। लेकिन वहां के गांव वासियों का भी कहीं से कोई समाचार दिखता नहीं है। संभव है वे या तो पूरी तरह सुविधा संपन्न हो गये हैं या पलायन कर गये हैं नहीं तो कहीं से तो आवाज उठती। विपक्ष भी देहरादून में ही चिल्लपों करता है। गांवों से विपक्ष भी पलायन कर गया है। हरीश रावत भी कुछ दिन पहले एक दिन के लिए गैरसैंण में डुगडुगी बजाये फिर वे भी ग्येंठी खाने चले गये। अरे जब आपने गैरसैंण राजधानी भवन बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई तो अब देहरादून में किराये पर रहने की बजाय भराड़ीसैंण विधानसभा के खाली पड़े मकानों में डेरा डाल दो। क्या पता तब कब्जे का समाचार सुनकर सरकार की तंद्रा टूटे। यूकेडी अब संघर्षों से इतिहास लिखने वाली इंद्रमणि बडोनी वाली पार्टी नहीं रही, उसने पहले उत्तराखंड के विकास की बातें छोड़ी अब गैरसैंण स्थाई राजधानी पर भी मौनव्रत धारण कर लिया है। इसलिए यूकेडी से किसी भांति की उम्मीद करना ही व्यर्थ है। देवभूमि में भू कानून मांगने वाली लाबी पर भी विकास विरोधियों का कब्जा है क्योंकि वे यहां हर गांव के लिए सड़क नहीं मांग रहे हैं, न संस्कृति बचाने के लिए संस्कृत विद्यापीठ मांगते हैं। न बक्फबोर्ड के इशारे पर उत्तराखंड के जंगलों में षड्यंत्र पूर्वक उग रही मजारों का विरोध नहीं करते न कुंजा एक्ट में खैकरों के बहाने षड्यंत्र पूर्वक छीनी गयी मंदिरों की भूमि को विधर्मियों को बेचे जाने का विरोध करते हैं। सच तो ये है कि उत्तखण्ड का भू दृश्य भले ज्यों का त्यों दिख रहा हो लेकिन उत्तराखंड की आत्मरक्षा कोई नहीं कर रहा, उत्तराखंड के सिस्टम पर हाकम सिंह जैसे दलालों का कब्जा है। उत्तराखंड चलाने वाले लखनऊ के रिजैकटेड हैं। उत्तराखंड का नेतृत्व ठेकेदारी से उपर नहीं उठ पाया है, यहां प्लानर तो एक भी विधायक और मंत्री नहीं हुआ है। इसलिए उत्तराखंड तेजी से मर रहा है। मध्य प्रदेश ने मेडिकल की पढ़ाई हिन्दी माध्यम से आरंभ कर इतिहास रच दिया है और उत्तराखंड किसी भी क्षेत्र में अपनी पहचान तो दूर अपने संस्कृत विद्यापीठ नहीं बचा सका है।

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