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उत्तराखण्ड

घनश्याम लाल साह यानी घन्दा का यूंही चला जाना…अलविदा घन्दा! अलविदा…..

नैनीताल निवासी घनश्याम लाल साह यानी घन्दा किसी परिचय के मोहताज नही हैं। नैनीताल के डीएसए संस्था के मजबूत स्तंभों में से एक…शिक्षाविद, मशहूर खिलाड़ी, सांस्कृतिक प्रेमी, सामाजिक कार्यकर्ता और न जाने क्या…क्या। बीते दिनों दिल्ली में अपनी धर्म पत्नी के इलाज कराने के दौरान ह्दयाघात के कारण वह महाप्रयाण कर गये। जिस कारण नैनीताल ही नही बल्कि उत्तराखंड शोक में डूब गया है। प्रसिद्ध कमंटेटर व राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त शिक्षक व घन्दा के करीबी हेमंत बिष्ट की कलम से निकले आत्मीय शब्द घन्दा के बावत सब कुछ उकेर देते हैं..।

हेमंत बिष्ट, नैनीताल। आजीवन घन्दा के आदेश निर्देशों पर कई खेल आयोजन हेतु कलम चलाता रहा लेकिन आज उनके महाप्रस्थान पर लिखते हुए ऐसी प्रतीति हो रही है कि जैसे किसी महाग्रंथ के अंतिम अध्याय की अंतिम पंक्ति का अंतिम शब्द पढ़ रहा हूं, जैसे किसी मैराथन के अंतिम कदम पर हूं या फिर लॉन्ग रेस के अंतिम लैप के अंतिम स्टेप पर हूँ..बड़े-बड़े दिग्गज उद्घोषक डी. एस ए . नैनीताल के आयोजनों में बोलते रहे थे. एक बार मैं डी एस ए पैवेलियन में खड़ा था मैच देख – सुन रहा था, अचानक श्री घनश्याम लाल साह जी आते हैं,मैं प्रणाम करता हूं. “अरे हेमंत! मैंने तुम्हें स्टेट रैली में बोलते सुना था, रुद्रपुर में. अरे तुम तो बहुत अच्छा बोल रहे थे.एथलेटिक्स का बड़ा ज्ञान है तुम्हें. क्या क्रिकेट हॉकी फुटबॉल भी बोलते हो? ” ” हाँ दाज्यू मैंने ट्रेड्स कप हॉकी और क्रिकेट मैच तो इसी मैदान में खेले भी हैं, थोड़ा बहुत बोलता भी हूँ. ” “तो चलो कंमेट्री करोगे” मेरा हाथ पकड़ कर डॉक्टर जावेद के पास बिठाते हैं जो उन दिनों बहुत अच्छी कमेंट्री करते थे. सिलसिला शुरू होता है बीच-बीच में आते हैं निर्देश देते हैं चलो अब मैच को रोमांचक बनाने के लिए इस तरह से कंमेट्री करो. इतनी बॉल में इतने रन चाहिए ऐसे रोचक बन जाता है मैच. और इस प्रकार से बीच-बीच में शिरीष दाज्यू आते,इसी प्रकार बीच-बीच में कुँवर पृथ्वीराज सिंह बिष्ट जी,गंगा प्रसाद साह जी, सुदर्शन दाजू, मुकेश तोमर जी और हमारे साथी डा ०देवेंद्र बिष्ट आदि आदि लोग आते रहते नहीं, नई नई बातें हम लोग सीखा करते. चाहे उपकार सेवा हो ऑल इंडिया ट्रेड कप हॉकी की प्लेटिनम जुबली हो, कुमाऊं विश्वविद्यालय के खेलy आयोजन, बी एल साह मैमोरियल सेवन ए साइड क्रिकेट हो, पागल जिमखाना हो या शारदा संघ की पेंटिंग प्रतियोगिता हो, सांस्कृतिक कार्यक्रम हों, सभी में कुछ ना कुछ नया लिखने बोलने का निर्देश देते रहते थे घन्दा. मैं कुछ ना कुछ लिखता रहता और आशीर्वाद प्राप्त होते रहता. ट्रेड्स कप हॉकी की प्लेटिनम जुबली थी, माननीय केंद्रीय मंत्री श्री धनुषकोटि जी पंडित नारायण दत्त तिवारी जी आदि, को इस उत्सव में आना था.घन्दा ने उद्घाटन व समापन सत्रों के लिए उद्घाटन और समापन गीत मुझे लिखवाए, डॉक्टर विजय कृष्ण जी ने संगीत दिया था और गायन वादन में स्वर्गीय मंटू जोशी, स्वर्गीय विनोद जी जहूर दा, डंडरियाल जी डॉक्टर रेखा दी सुषमा दी,प्रवीण पांडे जी आदि आदि थे. गीत के बोल थे – ” हम खेल का परचम लिए बस चलते रहेंगे. ”घंदा ने खूब आशीर्वाद दिया. जब भी शारदा संघ की पेंटिंग प्रतियोगिता होती, कहते इतिहास व रोचक जानकारी तो हमारे हेमंत ही प्रसारित करेंगे.फाइल मुझे थमाते – उसमें लिखा होता ‘एंकर्स फाइल ‘और नीचे लिखा होता उत्तराखंड की आवाज – हेमंत बिष्ट’ दिल उत्साह से उछल जाता और इस बार यानि अंतिम बार जब वह मिले तो कहने लगे ” “हेमंत अब तुम क्यों नहीं आते? पिछले साल नहीं आए थे.मैंने कहा दाज्यू आता हूं लेकिन आपके आशीर्वाद से नयों को भी तो आगे आने का अवसर मिलना चाहिए, मैं आता हूं चुपचाप देखता रहता हूं “. लेकिन फिर बोले कि मैं कुछ ना कुछ सोच समझ कर ही कह रहा हूं आपको आना ही होगा. मुझे देहरादून जाना था लेकिन दाज्यू का आशीर्वाद भरा आग्रह में टाल नहीं सका. अनुशासन और नियत तैयारी के साथ कार्यक्रम प्रारंभ हुआ. मुझे दाज्यू ने फाइल थमाई. फाइल में अंकित था -एंकर्स फाइल ‘ और नीचे उन्हीं की राइटिंग में लिखा हुआ था ‘भारत की आवाज – हेमंत बिष्ट ‘ मुझे लगा दाज्यू ने आशीर्वाद का पात्र मेरे ऊपर उड़ेल दिया है. हमेशा, मैं उन फाइलों को उनके पत्रों को प्रमाण पत्रों की तरह संजो के रखता हूँ..कुमाऊं विश्वविद्यालय के हर इवेंट में मुझे बुलाते विवरणिका में कुछ ना कुछ लिखवाते थे.एक बार कुमाऊं विश्वविद्यालय और एजुकेशन डिपार्टमेंट के बीच मैच था. डॉक्टर देवेंद्र बिष्ट बॉल कर रहे थे.मैं बैटिंग में था. सात विकेट आउट हो चुके थे.भुवन बिष्ट जी ने उद्घोषित करवाया कि यदि हेमंन्त एक चौका मारेंगे तो ₹ 100 का पुरस्कार लेकिन अंतिम ओवर था और दो गैंदें मिस हो गई थी.तीसरी गेंद से पहले पुनः उद्घोषणा हुई ‘प्रत्येक चौके पर ₹200 का पुरस्कार है. डॉक्टर देवेंद्र की तीसरी गेंद आती है, मैं चौका जड़ देता हूं चौथी और पांचवीं गेंद में भी में चौका मारता हूं तो घंदा मेरे पास आते हैं, मुझे गले से लगाते हैं. मैच के बाद प्रोफेसर एस .पी . सिंह जी के हाथों मुझे वह इनाम की राशि दिलवाते हैं और मुझे पुनः गले से लगाते हैं.मुझे आज भी वह स्पर्श अनुभूत हो रहा है. इसी टूर्नामेण्ट के एक मैच में, मैं कमेंट्री करने लगा हूं. मैं अनाउंस करता हूं बैटिंग पर है व्यापार मंडल और क्षेत्र रक्षण कर रहा है कुमाऊं विश्वविद्यालय. पॉइंट पर जो खिलाड़ी तैनात है दर्शक गण उसकी आयु क्या बता पाएंगे आप? 10 प्लस, 20 प्लस,30 प्लस,40 प्लस या फिर 50 प्लस. तभी एक तेज प्रहार बल्लेबाज करता है और फुर्ती से घंदा उसे लपक लेते हैं. तालियां बजती हैं. उन दिनों लायंस क्लब के इलेक्शन चल रहे हैं, मैदान पर लायंस क्लब के सदस्यों की भारी भीड़ है कुछ लायंस और लायनेस कमेंटेटर बॉक्स में आते हैं, पूछते हैं, सच में उनकी आयु कितनी है, मैं बताता हूं की रिटायरमेंट के करीब हैं वह अचंभे में कहते हैं – रियली – ‘ए राइट मैन ओन अ राइट ट्रेक ‘.उसी दिन इस लेख का जन्म होता है.पुत्र कैप्टन आशीष के अकस्मात रूप से खो जाने का दुख हमेशा उन्हें सालता रहा.इतने गहरे दुख के बावजूद खेल मैदान में सक्रिय रहे, खिलाड़ियों के प्रति समर्पित रहे.उनकी जीवंतता के दर्शन हम करते रहे. डी एस ए नैनीताल हो, कुमाऊं विश्वविद्यालय हो, खेल विभाग हो, बिरला विद्या मंदिर हो – जिस जिस संस्था में श्री घनश्याम लाल साह जी रहे,पूर्ण समर्पित रहे. क्या लिखूं क्या छोडूं . .रह रह कर उनकी स्मृतियां मस्तिष्क में फिल्म की तरह चल रही है. पुनः याद आ रहा है वह गीत जब ट्रेडस कप हॉकी के समापन सत्र हेतु में उन्होंने मुझसे लिखवाया था. हम खेल का परचम लिए बस चलते रहेंगे यूं आज विदा हो के विदा हम नहीं होंगे. यादों में सदा यूं ही खेलते ही रहेंगे खेलते ही रहेंगे. घन्दा हमेशा हमारी यादों में बने रहोगे हमारे आदर्श के रूप में. अलविदा घन्दा! अलविदा

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