उत्तराखण्ड
कुमाऊं में सांस्कृतिक चेतना के पहले संवाहक : मालदार ठाकुर दान सिंह बिष्ट
प्रो. लक्ष्मण सिंह बिष्ट बटरोही, नैनीताल। कुमाऊँ के मिथक बन चुके व्यक्ति ठाकुर दान सिंह बिष्ट के हैं, जिन्होंने सिर्फ 48 वर्ष की उम्र पाई, मगर इस छोटी-सी उम्र में अपने क्षेत्र में औद्योगिक तथा सांस्कृतिक विस्तार की दृष्टि से वो काम कर दिखाया जो इस क्षेत्र के बड़े-से-बड़े साधन-संपन्न और बड़बोले नेता भी नहीं कर पाए. दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि अपने ही क्षेत्र में आज इस महामनीषी का कोई नामलेवा नहीं है. लोग उन्हें या तो लकड़ी के ठेकेदार के रूप में जानते हैं या एक मालदार के रूप में. वर्ष1906 में पिथोरागढ़ के झूलाघाट में जन्मे दान सिंह की गाँव में ही घी की एक पैतृक दुकान थी जिसे उनके पिता ठाकुर देवसिंह बिष्ट संचालित करते थे. व्यापार के गुर बालक दान सिंह ने इसी दुकान से सीखे. वर्ष 1947 तक यह बिष्ट परिवार नेपाली नागरिक था, बाद में प्रसिद्ध शिकारी जिम कॉर्बेट के संपर्क में आकर दानसिंह ने अपनी नागरिकता भारतीय के रूप में बदल ली. ठाकुर परिवार पढ़ा-लिखा नहीं था यद्यपि व्यापार और कुशल-प्रबंधन के कुछ ऐसे गुण उनमें मौजूद थे, जिनके कारण कॉर्बेट इस युवा की ओर आकर्षित हुआ और युवा दान सिंह को उसने तत्काल अपना सहयोगी बना लिया. वह जंगल से मारे गए आदमखोर बाघों की खालें दानसिंह के घर बीरभट्टी में स्टोर करने लगा और दोनों मिलकर लकड़ी के तख्तों को नदी के रास्ते काठगोदाम के मुख्य मार्ग तक ले जाने और टिम्बर निर्यात का काम करने लगे. जंगलों के पर्यावरण के प्रति अभूतपूर्व लगाव के कारण ही ये दोनों व्यापारी कब पर्यावरण और संस्कृति के संरक्षक तथा उसे पूरे संसार में फ़ैलाने वाले दूत बन गए, इसका पता उन्हें खुद भी नहीं चल पाया. आज कॉर्बेट की विश्वप्रसिद्ध शिकार-कथाओं से कौन परिचित नहीं है, जो मूलतः शिकार कथाएँ न होकर जीव-संरक्षण और मानवीय करुणा की अद्भुत बानगी हैं. ठाकुर दानसिंह बिष्ट का जीवन-संघर्ष भी बाहर से देखने पर अपना आर्थिक साम्राज्य खड़ा करने वाले एक मामूली व्यापारी का लगता है, मगर उनकी अंदरूनी कहानी पर नज़र डालेंगे तो पता चलेगा, उनके जीवन की सारी कशमकश खुद को और अपने समाज को अशिक्षा के बंधनों से मुक्त कर मुख्यधारा की संस्कृति का अग्रणी हिस्सा बनाना था. अपनी मेहनत से उन्होंने अकूत पैसा कमाया, कोई संतान नहीं थी, मगर वह सभी पहाड़वासियों को अपनी संतान मानते हुए उनमें ज्ञान और साक्षरता का अलोक भरना चाहते थे. नैनीताल के पास बीरभट्टी में विशाल एस्टेट खरीदकर वहां बियर का उत्पादन शुरू किया और अपने साम्राज्य का विस्तार किया. इसी के कुछ समय बाद बिष्ट साहब ने नैनीताल के ठीक मध्य में 12 एकड़ से अधिक भूमि 5 लाख रुपयों में खरीदकर वहां अपने क्षेत्रवासियों में उच्चशिक्षा का संस्कार डालने के लिए अपने पिता के नाम से ठाकुर देवसिंह बिष्ट महाविद्यालय की स्थापना की. देखते-देखते यह कॉलेज उत्तराखंड का सबसे बड़ा उच्चशिक्षा केंद्र बना, जिसकी ओर देश विदेश की विभिन्न विषयों से जुडी प्रतिभाएँ आकर्षित हुई और देखते-देखते यह केंद्र ज्ञान के अन्तरराष्ट्रीय मानचित्र पर उभर आया. यहाँ का स्टाफ और विद्यार्थी आज पूरे विश्व में ज्ञान की अपनी उपलब्धियों के लिए याद किये जाते है।














































