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नैनीताल

आज श्रीदेव सुमन की 107 वीं जयंतीः टिहरी राजशाही के खिलाफ 84 दिन भूखे रहकर लड़ी थी लड़ाई

आज श्रीदेव सुमन की 106वीं जयंतीः टिहरी राजशाही के खिलाफ 84 दिन भूखे रहकर लड़ी थी लड़ाई
चन्द्रेक बिष्ट, नैनीताल।
आजादी से पूर्व देश का एक बड़ा हिस्सा औपनिवेशिक ब्रिटिश हुकूमत की दमनकारी नीति से त्रस्त था ही, लेकिन देशी रियासतों के नवाबों और राजाओं ने भी जनता पर दमन और शोषण का कहर ढा रखा था। जब युद्ध के बहाने भारत देश की अभावग्रस्त प्रजा को लूटा जा रहा था, ऐसे समय में उत्तराखंड राज्य में जन्म लिया था बालक श्री दत्त ने, जो बाद में श्री देव सुमन के नाम से जाने गए। श्रीदेव सुमन (मूल नाम श्रीदत्त बडोनी) को टिहरी रियासत और अंग्रेजों के अत्याचारों के खिलाफ जनक्रान्ति कर अपने प्राणों का बलिदान करने के लिए याद किया जाता है। श्रीदेव सुमन ने टिहरी राजशाही के खिलाफ 84 दिन की ऐतिहासिक भूख हड़ताल की थी। श्रीदेव सुमन को कई यातनाएं दी गई थीं, फिर भी कमजोर नहीं पड़े। इतना ही नहीं उन्हें जेल में कांच की रोटियां खाने को मजबूर किया गया। आज उनकी जयंती पर पूरे उत्तराखंड में उन्हें श्रद्धांजलि दी जा रही है। श्रीदेव सुमन जी का जन्म टिहरी गढ़वाल के जौल नामक ग्राम में 25 मई 1916 को हुआ था। इनके पिता श्री हरिराम बडोनी अपने क्षेत्र के लोकप्रिय वैध थे। माता श्रीमती तारा देवी एक कुशल गृहणी थी। श्रीदेव सुमन का बचपन का नाम श्रीदत्त बडोनी था। सन 1919 में हैजे का प्रकोप फैलने पर श्री हरिराम बडोनी मरीजों सेवा करते, स्वयं हैजे का शिकार हो गए और 36 साल की उम्र में ही चल बसे। इनकी आरम्भिक शिक्षा अपने पैतृक गांव व चम्बाखाल में हुई। 1931 में इन्होंने टिहरी से हिंदी मिडिल की परीक्षा उत्तीर्ण की। 1931 में ये देहरादून गए और वहाँ के नेशनल स्कूल में अध्यापन कार्य शुरू कर दिया और साथ साथ मे पढ़ाई भी करते रहते थे। पंजाब विश्वविद्यालय से इन्होंने रत्न, भूषण,प्रभाकर परीक्षाओं को उत्तीर्ण किया। इसके साथ साथ ,विशारद और साहित्य रत्न की परीक्षा भी उत्तीर्ण जी थी। श्रीदेव सुमन ने 1937 में सुमन सौरभ नाम से अपनी कविताएं प्रकाशित कराई। अखबार हिन्दू और समाचार पत्र धर्मराज्य में भी कार्य किया। इन्होंने इलाहाबाद में राष्ट्र मत नामक अखबार में सहकारी संपादक के रूप में कार्य किया। इस प्रकार श्रीदेव सुमन साहित्य के क्षेत्र में निरंतर आगे बढ़ने लगे। जनता की सेवा के उद्देश्य से इन्होंने 1937 में गढ़देश सेवा संघ की स्थापना की । यह आगे चलकर हिमालय सेवा संघ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। अपने छात्र जीवन से ही गाँधीवादी विचारधारा प्रेरित सुमन जी ने नमक सत्याग्रह आन्दोलन में भी अपना योगदान दिया, जिस कारण उन्हें 14 दिन की जेल भी हुई, वह अपने आगे की पढाई के लिए दिल्ली चले गए। जहाँ उन्होंने 1932 में एक अध्यापक का कार्यभार संभाला। इस बीच उन्होंने ‘सुमन सोरव’ नामक एक कविता संग्रह भी प्रकाशित किया। हिंदी साहित्य से जुड़े हुए व्यक्ति रहे, उन्होंने बहुत सारी समाज सेवी संस्थाओ की भी स्थापना की, जैसे हिमालय सेवा संघ, गढ़वाल सेवा संघ, राज्य प्रजा परिषद आदि। वह जनता पर राज्य व अंग्रेजो द्वारा लगाये गये प्रतिबंधो से हमेशा आहत रहे और उसी विषय में लगातार लोगो को जागरूक करने की कोशिश में लगे रहे। 1939 में टिहरी राज्य प्रजा मंडल जो की राज्य सरकार अत्याचारों के विरुद्ध एक संस्था थी उसका अध्यक्ष सुमन जी को बनाया गया। अपने प्रभावी कार्य और कुशल नेतृत्व के कारण वह लोगो के बीच लोकप्रिय होने लगे थे। इसी डर से की जनता राज्य के खिलाफ आन्दोलन न कर दे, उन्हें आधिकारियों द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया और राज्य से निष्कासित कर दिया गया। उनके टिहरी आने पर पाबन्दी भी लगा दी गयी। इसी बीच टिहरी रियासत ने टिहरी की जनता के ऊपर जुल्मों की सारी हदें पार की थी। श्रीदेव सुमन टिहरी की जनता के अधिकारों के लिए अपनी आवाज बुलंद करने लगे। इन्होंने जनता और रियासत के बीच सम्मान जनक संधि का प्रस्ताव भी दरवार को भेजा। लेकिन रियासत ने अस्वीकार कर दिया। 29 दिसंबर 1943 को श्रीदेव सुमन को चम्बाखाल में गिरफ्तार करके 30 दिसम्बर को टिहरी जेल भिजवा दिया गया। टिहरी जेल में श्रीदेव सुमन जी के साथ, नारकीय व्यवहार किया गया, इनके ऊपर झूठा मुकदमा चला कर 31जनवरी 1944 को, इन्हें 2 साल का कारावास और 200 रुपया दंड देकर इन्हें अपराधी बना दिया गया। इसके बाद भी इनके साथ नारकीय व्यवहार होते रहे। अंत मे श्रीदेव सुमन ने 3 मई 1944 को ऐतिहासिक आमरण अनशन शुरू कर दिया। जेल प्रशासन ने इनका मनोबल डिगाने के लिए, कई मानसिक और शारिरिक अत्यचार किये लेकिन ये अपनी अनशन पर डिगे रहे। जेल में इनके अनशन की खबर से जनता परेशान हो गई, लेकिन रियासत ने अफवाह फैला दी की श्रीदेव सुमन जी ने अपना अनशन समाप्त कर दिया है और राजा के जन्मदिन पर इनको रिहा कर दिया जाएगा। यह खबर इनको को भी मिल गई, उन्होंने कहा कि वे प्रजामंडल को रेजिस्ट्रेड किये बिना मैं अपना अनशन खत्म नही करूँगा। अनशन से इनकी हालत बिगड़ गई और जेल प्रशाशन ने अफवाह फैला दी कि इनको न्यूमोनिया हो गया। इसके बाद इनको कुनेन के इंजेक्शन लगाए गए। कुनेन के इंजेक्शन के साइड इफेक्ट से इनके शरीर मे खुश्की फैल गई, जिसकी वजह से ये पानी के लिए तड़पने लगे, श्रीदेव सुमन पानी पानी चिल्लाते रहे लेकिन किसी ने इनको पानी नही दिया। अंततः तड़पते तड़पते और रियासत के जुल्मों से लड़ते हुए इन्होंने 25 जुलाई 1944 को अपने देश के लिए, अपने राज्य उत्तराखंड के लिए अपनी पहाड़ी संस्कृति के लिए अपने प्राण त्याग दिए। श्रीदेव सुमन की शहादत की खबर से जनता में एकदम उबाल आ गया, जनता ने रियासत के खिलाफ खुल कर विद्रोह शुरू कर दिया। जनता के इस आंदोलन के बाद टिहरी रियासत को प्रजामंडल को वैधानिक करना पड़ा। मई 1947 में टिहरी प्रजामंडल का पहला अधिवेशन हुआ जनता ने 1948 में टिहरी, देवप्रयाग और कीर्तिनगर पर अपना अधिकार कर लिया। और अंततः 01 अगस्त 1949 को टिहरी गढ़वाल राज्य, भारत गणराज्य में विलीन हो गया। हमें गर्व हैं श्रीदेव सुमन और उनकी शहादत पर, मात्र 29 वर्ष की छोटी सी उम्र में श्रीदेव सुमन अपने राज्य अपने पहाड़ी समाज अपने टिहरी गढ़वाल और अपने देश के लिए ऐसा कार्य कर गए, जिससे उनका नाम इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में सदा सदा के लिए अमर हो गया। इनकी धर्म पत्नी विनय लक्ष्‍मी सुमन टिहरी गढ़वाल से उत्तर प्रदेश में विधायक रही। महान क्रांतिकारी श्रीदेव सुमन के परिजनों ने आज भी उनकी याद में उनसे जुड़ी वस्तुओं को संजोकर रखा है। राजशाही की पुलिस का डंडा श्रीदेव सुमन के परिजनों ने अभी तक संजोकर रखा है। टिहरी राजशाही के खिलाफ आवाज बुलंद करने वाले श्रीदेव सुमन के घर पर उनका सामान आज भी सुरक्षित है। वहीं श्रीदेव सुमन के भाई के पुत्र मस्तराम बड़ोनी ने बताया कि श्रीदेव सुमन से जुड़ी यादें पलंग, डेस्क और पुलिस का डंडा आज भी उनके पास सुरक्षित है। जिन्हें वे अपने पितरों की निशानी समझते हैं।

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