उत्तराखण्ड
उत्तराखंड : भ्रष्ट राजनीति और भ्रष्ट प्रशासन से बढ़ रहे हैं प्रदेश में अपराध
राजीव लोचन साह, नैनीताल। उत्तराखंड में अपराध अबाध गति से बढ़ते जा रहे हैं। गौर से देखा जाये तो इन अपराधों का उत्स एक ही है, भ्रष्ट राजनीति या भ्रष्ट प्रशासन। अभी-अभी अंकिता हत्याकांड को लेकर जो नयी बातें सामने आयी हैं और जिनको लेकर पूरे उत्तराखंड में 1994 जैसा जन उभार खड़ा हो गया, उनके पीछे भ्रष्ट राजनीति थी। राजनीतिक सम्पर्कों के आधार पर धनाढ्य बने कुछ युवकों ने एक युवती की जान इसलिये ले ली, क्योंकि वह युवती उन युवकों के राजनीतिक आकाओं को ‘स्पेशल सर्विस’ नहीं दे रही थी। इतने भारी जन दबाव के बावजूद सरकार उन ‘आकाओं’ के नाम खोजने से कतरा रही है, क्योंकि ये ‘आका’ सम्भवतः उत्तराखंड के सत्ताधीशों के भी आका होंगे, उन पर अपना नियंत्रण रखते होंगे। जनता का गुस्सा इसी बात पर तो है कि इन ‘आकाओं’ को प्रसन्न करने के लिये क्या सत्ताधारी अब उत्तराखंड की मासूम लड़कियों को देह व्यापार में धकेल देंगे ? 9 दिसम्बर को एक चिन्ताजनक घटना देहरादून में घटी जब वहाँ पढ़ने वाले त्रिपुरा के एक छात्र की नस्लीय आधार पर हत्या कर दी गयी। 24 वर्षीय एंजेल चकमा एमबीए के छात्र थे। उनके पिता बॉर्डर सिक्योरिटी फोर्स (बीएसएफ) में जवान हैं और वर्तमान में मणिपुर में तैनात हैं। घटना की शुरूआत एक झगड़े से हुई, जब एंजेल और उनके भाई पर कुछ लोगों ने ‘चिंकी’, ‘चीनी’ और ‘मोमो’ जैसी नस्लीय टिप्पणियाँ कीं। विरोध करने पर हमलावरों ने एंजेल पर चाकू और अन्य हथियारों से हमला कर दिया। एंजेल को गंभीर चोटें आईं। उनके भाई को भी चोटें आईं, लेकिन एंजेल की हालत ज्यादा गंभीर थी। इलाज के दौरान 26 दिसम्बर को एंजेल का देहान्त हो गया। एंजेल के पिता ने सीसीटीवी फुटेज का जिक्र किया है, जिसमें हमले की पूरी घटना कैद हुई है। उन्होंने आरोप लगाया कि पुलिस ने शुरू में एफआईआर दर्ज करने में देरी की और चकमा छात्र संगठन के दबाव के बाद ही कार्रवाही की। पिता ने यह भी कहा कि उनके बेटे को जातीय और नस्लीय आधार पर प्रताड़ित किया गया। इस घटना ने उत्तर-पूर्वी राज्यों में आक्रोश पैदा किया है। छात्र संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने कैंडललाइट विजिल और विरोध प्रदर्शन किए, जिसमें उत्तर-पूर्वी नागरिकों के खिलाफ भेदभाव को रोकने की माँग की गई। पुलिस ने कुल 5 लोगों को गिरफ्तार किया है, जिसमें 3 को न्यायिक हिरासत में भेजा गया है, 2 नाबालिगों को जुवेनाइल होम में रखा गया है। एक आरोपी नेपाल से है, जिसकी तलाश जारी है। एंजेल की हत्या के पीछे भी भ्रष्ट राजनीति है। उत्तराखंड में डबल इंजन की जो सरकार सत्ता में है, उसका अस्तित्व ही साम्प्रदायिक धु्रवीकरण की जमीन पर है। इस ध्रुवीकरण के लिये वह नफरत फैलाने की किसी भी हद तक जा सकती है। मुहब्बत जब फैलती है तो समाज में अमन, चैन और भाईचारा पैदा करती है। मगर नफरत जब मजबूत हो जाती है तो वह अनेक रूप धारण कर नुकसान करती है। पहले पुलवामा तथा फिर पहलगाम की घटनाओं के बाद प्रदेश में अनेक स्थानों पर कश्मीरियों पर हमले की घटनायें सामने आयीं। अब यह नफरत उत्तराखंड के ही जैसे पूर्वोत्तर के पहाड़ी राज्यों को निशाना बनाने लगी है। ऐसी घटनायें तब तक नहीं रुकेंगी, जब तक राजनीति में नफरत खत्म नहीं होगी और शुचिता नहीं आयेगी। इससे भी अधिक सनसनीखेज घटना 11 जनवरी की रात हल्द्वानी के एक होटल में घटी, जहाँ एक किसान ने अपनी पत्नी और 14 वर्षीय पुत्र के सामने अपने आप को गोली से उड़ा दिया। 40 वर्षीय सुखवंत सिंह काशीपुर के पैगा गाँव का निवासी था, जिससे कुछ माफियाओं ने जमीन दिलाने के नाम पर करोड़ों रुपये ठग लिये थे। इस घटना से हड़कम्प इसलिये मचा, क्योंकि सुखवन्त ने आत्महत्या से पूर्व सोशल मीडिया पर एक वीडियो पोस्ट कर दिया था। वीडियो में उसने न सिर्फ उसके साथ ठगी करने वालों के नाम बताये थे, बल्कि उन पुलिसकर्मियों के भी नाम लिये थे, जो अपराधियों के साथ मिल गये और उसे न्याय दिलाने के बदले उसे प्रताड़ित करने लग। वीडियो के अन्त में उसका यह कहना सचमुच दारुण है कि मेरे, मेरी पत्नी के और मेरे पुत्र के शरीर के अंग बेच कर इन पुलिस अधिकारियों का लालच पूरा कर दिया जाये। इससे लगता है कि पहले सुखवंत का इरादा स्वयं आत्महत्या करने से पहले अपनी पत्नी और पुत्र की हत्या करने का था। मगर फिर उसने अपना इरादा बदल लिया। इस वीडियो में 28 लोगों के नाम हैं, जिनमें पैगा पुलिस चैकी के प्रभारी प्रकाश बिष्ट और एसएचओ कुन्दन रौतेला ही नहीं, उधमसिंह नगर के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक मणिकान्त मिश्रा का भी नाम है। इससे सोचना पड़ता है कि ऐसा खतरनाक कदम उठाने से पूर्व सुखवन्त कहाँ-कहाँ नहीं भटका होगा, उसने किस-किस के दरवाजे पर सर नहीं टेका होगा। एक मजेदार बात सामने आयी कि शुरूआत में पुलिस ने मृतक सुखवंत को ही हिस्ट्री शीटर बतलाया। उसके खिलाफ कई आपराधिक मामले दर्ज हैं, जबकि उसे आत्महत्या के लिये कथित तौर पर मजबूर करने वाले सभी लोग पुलिस की दृष्टि में एकदम पाक साफ हैं। अंकिता हत्याकांड की तरह उत्तराखंड सरकार इस घटना की भी सीबीआई जाँच करने से कतरा रही है, जबकि अपने मृत्युपूर्व वीडियो में सुखवंत ने स्पष्ट रूप से सीबीआई जाँच की माँग की थी। फिलहाल आयुक्त कुमाऊँ, दीपक रावत इस मामले की जाँच कर रहे हैं। घटना में कथित रूप से शामिल कुछ पुलिसकर्मियों को निलम्बित कर दिया गया है और कुछ का स्थानान्तरण चमोली या रुद्रप्रयाग कर दिया गया है। आरोपी अब तक गिरफ्तार नहीं किये गये हैं और अब तो हाईकोर्ट से उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गयी है। सुखवंत के परिजन आरोप लगा रहे हैं कि पुलिस सुखवंत की पत्नी पर उसकी मनमर्जी का बयान देने का दबाव बना रही है। उत्तराखंड की, विशेषकर तराई की जनता इस मामले में सरकार की हीलाहवाली से कतई असंतुष्ट दिखाई देती है। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को उनके प्रशंसक ‘धाकड़ धामी’ कहते हैं, मगर लगता है कि उनकी न कोई पकड़ राजनीति में रह गयी है और न ही प्रशासन में। उनके दृष्टिबाधित होने का एक प्रमाण यह है कि उन्होंने 27 जनवरी को पूरे प्रदेश में समारोहपूर्वक ‘यूसीसी दिवस’ मना दिया। लोग पूछ रहे हैं कि यूसीसी (समान नागरिक संहिता) से इतनी समस्याओं से घिरे प्रदेश को मिला क्या ? इन घटनाओं से साबित होता है कि 25 साल पहले उत्तराखंड की जनता ने जो सपना देखा था कि नये राज्य में एक सुलझा हुआ राजनीतिक नेतृत्व होगा और एक चुस्त तथा साफ-सुथरा प्रशासन, वह सपना अब पूरी तरह चकनाचूर हो गया है। नैनीताल समाचार से साभार






























































