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उत्तराखण्ड

ईजु (मां) आखिर पहाड़ों में ह्यों (बर्फ) गिर ही गई…मैं यहां इस शहर के अपने कबूतरखाने में दिन बिता रहा हूं…हमसे तो वे मल्या अच्छे…

देवेन मेवाड़ी, नैनीताल। हां, वहां पहाड़ों पर बर्फ गिर गई है ईजू। मैं यहां इस शहर के कोलाहल में, अपने कबूतरखाने में दिन बिता रहा हूं। कई बार लगता है, हमसे तो वे हिम-कबूतर अच्छे जिन्हें हम मल्या कहा करते थे। हर साल गेहूं की बोआई के बाद वे झुंड के झुंड आकर हमारे खेतों में उतरते थे। रात भर विश्राम करके गर्म, मैदानी इलाकों की ओर चले जाते थे। खानाबदोश थे वे। हम भी तो तब खानाबदोश ही थे। गर्मियां और बरसात के दिन ठंडे पहाड़ पर अपने गांव-घर में बिताते थे और सर्दियों की शुरुआत में अपने गाय-भैंसों के बागुड़ के साथ गर्म इलाके के अपने दूसरे गांव-घर की ओर कूच कर जाते थे। वह हमारी गाय-भैंसों का बागुड़ ! आगे-आगे फूल भैंस का घांण बजता- घन..मन..घन..मन! पीछे पसीने में लथपथ घोड़े के बड़े खांकरों की माला खनकती खन..खन्..खन..खन्! बीच-बीच में बड़े ददा की टेर-आहिएए.. ले! हिट-हिट…द मेरि मयाली ह्वै जाली! क्या हिमालय की ओर से उड़ कर आए मल्याओं के बागुड़ में भी कोई टेर देता होगा? द, कु जानौ? हो सकता है वे पीछे छूटे अपने घर-घोंसलों का कोई गीत गाते हों। गाते हों कि जब मौसम बदलेगा, शाखों पर नई कोंपलें फूटने लगेंगी और वसंत आ जाएगा तो हम भी लौट आएंगे! और, हमारा भी वसंत आ जाता था। हमारे गांव के सिरमौर वन प्रांतर में लाल-लाल बुरौंज खिल जाते और वह कफुवा की कुहुक से गूंज उठता- कुक्कू ! कुक्कू! कुक्कू! याद है तुम्हें, जब पहली बार मां की अंगुली पकड़ कर माल-भाबर से तुम गांव के शिखर पर घने बांज वन में पहुंचे थे तो बांज वृक्षों की छांव में अब तक शेष चीनी जैसी बिखरी बर्फ की श्वेत -सुकीली परत देख कर चकित रह गए थे। झपट कर दोनों हथेलियों में वह बर्फ भर ली थी। तभी मां ने धीरे से हाथ झटक दिए थे कि- ह्यों छ तs। भौत कठीन हुंछ! ( हिम है यह। बहुत ठंडा होता है)। बर्फ से वह तुम्हारी पहली मुलाकात थी। है ना? फिर तो कई बार पढ़ाई के लिए सर्दियों में पहाड़ के गांव में ही रह कर जम कर होता हिमपात देखा। दो-दो तीन-तीन बार होता हिमपात भी देखा। आसमान से झरती हिम-पंखुरियों को एकटक देखते-देखते जैसे सपने में खो जाता था। कभी थाली में गुड़ या चीनी बुरक कर गिरती-जमती बर्फ खा लेते। वे ही हिम-पंखुरियां निपट सन्नाटे में पेड़-पौधों, मकानों की छतों, यहां तक कि हर चीज को खामोशी के साथ सफेदी की मोटी परत से ढक देती थी। याद है, रात को तुम चुपचाप उठ कर वुड हाउस के अपने उस बाहरी कमरे की खिड़की धीरे से खोल लेते और सन्नाटे में दूर तक बाहर का वह सम्मोहक दृश्य देखते रहते। बाहर जैसे जुन्याली रात का खूब उजाला फैला रहता। सर्द रात के उसी सन्नाटे में उस पार रंयाज के घने पेड़ों में कभी-कभी वह कोई एक अनजान चिड़िया बोलती थी- क्रु..क्रू! क्या कहती थी, कौन जाने। अल-सुबह तुम उसी हिमलोक में जैसे सम्मोहित होकर दूर उस पहाड़ी तक हो आते। चारों ओर सन्नाटा होता। बर्फ से ढके पेड़ भी मौन साधे रहते। कितने अनोखे, अविस्मरणीय बर्फीले दिन थे वे! है ना? और, आज? आज दूर यहां इस शहर में अपने सीमेंट-कंक्रीट के बंद कबूतरखाने के पिंजरे में, कसमसाते हुए अपने पुराने पंखों से, दम साध कर उन्हीं परिचित पहाड़ों की ओर उड़ान भरने को मन कितना उद्विग्न है जहां हिमपात हो गया है। यह अज़ीम शायर राजेश रेड्डी की लाइनें कौन गुनगुना रहा है..
जाने कितनी उड़ान बाक़ी है,
इस परिंदे में जान बाक़ी है

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