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उत्तराखण्ड

आईएमपीसीएल का निजीकरण उत्तराखंड में रोजगार, स्थानीय अर्थव्यवस्था व सार्वजनिक उपक्रमों के भविष्य को लेकर एक बड़ा राजनीतिक व सामाजिक मुद्दा

मुनाफे में चल रही आईएमपीसीएल के निजीकरण पर विवाद, कर्मचारियों व स्थानीय लोगों में आक्रोश

खष्टी बिष्ट, नैनीताल। आयुष मंत्रालय के अधीन कार्यरत सरकारी कंपनी इंडियन मेडिसिन्स फार्मास्युटिकल कॉरपोरेशन लिमिटेड (आईएमपीसीएल) के निजीकरण को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। केंद्र सरकार द्वारा कंपनी को लगभग ₹121 करोड़ में निजी कंपनी स्काईमैप फार्मास्युटिकल्स को सौंपे जाने के बाद कर्मचारियों, स्थानीय किसानों और पारंपरिक चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े लोगों ने इस फैसले पर गंभीर सवाल उठाए हैं। विरोध करने वालों का कहना है कि आईएमपीसीएल लगातार मुनाफे में चल रही थी और इसकी नेटवर्थ तथा रिजर्व में लगातार वृद्धि हो रही थी। कर्मचारियों का तर्क है कि जब कंपनी आर्थिक रूप से मजबूत स्थिति में थी, तब इसके विनिवेश की आवश्यकता क्या थी।
निजीकरण को लेकर सबसे बड़ा विवाद कंपनी के मूल्यांकन को लेकर है। आलोचकों का दावा है कि आईएमपीसीएल की नेटवर्थ लगभग ₹145 करोड़ और रिजर्व ₹90 करोड़ से अधिक था, जबकि कंपनी को मात्र ₹121 करोड़ में बेच दिया गया। विशेषज्ञों का एक वर्ग इस सौदे के मूल्यांकन को कम आंक रहा है और पूरे विनिवेश की प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल उठा रहा है। इस उत्पादन इकाई से जुड़े सैकड़ों स्थायी और संविदा कर्मचारियों के सामने रोजगार को लेकर अनिश्चितता पैदा हो गई है। वहीं, उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में जड़ी-बूटियों की खेती करने वाले हजारों किसानों को भी अपनी आजीविका पर संकट का डर सता रहा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि निजी प्रबंधन ने खरीद व्यवस्था या उत्पादन नीति में बदलाव किया तो इसका सीधा असर किसानों और श्रमिकों पर पड़ेगा। उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य में रोजगार के सीमित अवसरों को देखते हुए स्थानीय संगठनों ने पलायन बढ़ने की आशंका भी जताई है। सरकार का कहना है कि विनिवेश की प्रक्रिया निर्धारित नियमों और प्रतिस्पर्धी बोली प्रणाली के तहत पूरी की गई है। इसके बावजूद IMPCL के निजीकरण को लेकर बहस जारी है और कर्मचारी संगठन इस फैसले की समीक्षा की मांग कर रहे हैं।
फिलहाल आईएमपीसीएल का निजीकरण उत्तराखंड में रोजगार, स्थानीय अर्थव्यवस्था और सार्वजनिक उपक्रमों के भविष्य को लेकर एक बड़ा राजनीतिक और सामाजिक मुद्दा बनता जा रहा है।

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