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उत्तराखण्ड

एससी ने उत्तराखंड हाईकोर्ट के 2024 के आदेश को रद्द किया, अब हल्द्वानी में ही बनेगा कोर्ट

सीएन, दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को उत्तराखंड हाईकोर्ट के 2024 के उस आदेश को रद्द किया, जिसमें हाईकोर्ट को नैनीताल से हल्द्वानी शिफ्ट करने के लिए राज्य सरकार की ओर से वैकल्पिक ज़मीन देने के प्रस्ताव को ठुकरा दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ये मामले प्रशासनिक स्तर पर तय किए जाने चाहिए, न कि न्यायिक स्तर पर। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (सीजेआई) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने आदेश दिया कि हल्द्वानी में हाईकोर्ट की नई बिल्डिंग के लिए अलॉट की गई ज़मीन का कब्ज़ा जल्द से जल्द हाई कोर्ट को सौंप दिया जाए। इस तरह के मामलों का फ़ैसला न्यायिक कार्यवाही में नहीं किया जाना चाहिए। इसलिए अपील मंज़ूर की जाती है। हाईकोर्ट का विवादित फ़ैसला रद्द किया जाता है। उत्तराखंड हाईकोर्ट प्रशासनिक स्तर पर राज्य सरकार के साथ बातचीत करके, इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े मुद्दों को सुलझा सकता है।” सुनवाई के दौरान, जब यह बताया गया कि राज्य सरकार ने हल्द्वानी में हाईकोर्ट की नई बिल्डिंग बनाने के लिए ज़मीन अलॉट की है तो बेंच ने कहा कि ज़मीन का कब्ज़ा “जैसी है, जहाँ है” के आधार पर 6 हफ़्ते के अंदर हाई कोर्ट को सौंप दिया जाए। जब यह बताया गया कि संबंधित ज़मीन से कुछ पेड़ हटाने होंगे तो सीजेआई ने कहा कि ज़मीन का कब्ज़ा पेड़ों के साथ ही दिया जा सकता है। हाईकोर्ट का न्यायिक पक्ष में इस तरह का आदेश देने का कोई काम नहीं है।” यह अपील उत्तराखंड हाईकोर्ट बार एसोसिएशन ने दायर की थी, जिसमें उत्तराखंड हाईकोर्ट के 8 मई, 2024 के आदेश को चुनौती दी गई। उस आदेश में हाई कोर्ट ने हल्द्वानी के गोलापार में हाईकोर्ट बनाने के राज्य सरकार के प्रस्ताव को यह कहते हुए ठुकरा दिया कि 26 हेक्टेयर ज़मीन में से लगभग 75 प्रतिशत हिस्सा वन क्षेत्र है और कोर्ट नहीं चाहता कि इस प्रोजेक्ट के लिए पेड़ काटे जाएँ। इसके बजाय, हाईकोर्ट ने मुख्य सचिव को निर्देश दिया कि वे एक महीने के भीतर ज़मीन का कोई ज़्यादा उपयुक्त टुकड़ा चुनें। हाईकोर्ट ने नैनीताल से हाईकोर्ट को दूसरी जगह ले जाने के कई कारण भी बताए, जिनमें ट्रैफ़िक जाम, पर्याप्त मेडिकल सुविधाओं की कमी, खराब कनेक्टिविटी, रहने-सहने का ज़्यादा खर्च, वकीलों को रहने में होने वाली दिक्कतें और दूर-दराज़ के ज़िलों से आने वाले मुक़दमेबाज़ों को होने वाली परेशानियाँ शामिल थीं। कोर्ट ने निर्देश दिया था कि एक ऑनलाइन पोर्टल के ज़रिए वकीलों और आम जनता की राय ली जाए और इस मामले की जाँच के लिए एक कमेटी बनाई जाए। 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी और साथ ही प्रतिवादियों को नोटिस जारी किया।

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