नैनीताल
नैनीताल का एबरफोयल कॉटेज, जहां से मैंने नौकरी की शुरुआत की…..और पंतजी का महान सपना भंग
प्रो. लक्ष्मण सिंह. बिष्ट बटरोही, नैनीताल। अयारपाटा के बारापत्थर मोड़ के पास ऊंचे टीले पर बीसवीं सदी की एक ऐतिहासिक ब्रिटिश कोठी है, एबरफोयल कॉटेज. किसी ज़माने में एक अँगरेज़ का रईसी आवास था ये परिसर, जहां उन्नीसवीं-बीसवीं सदी के ब्रिटिश भारत की अनंत स्मृतियाँ जीवंत हैं. यह बात 1970 की है, जब नैनीताल के ठाकुर देवसिंह बिष्ट राजकीय महाविद्यालय के हिंदी विभाग में मेरी नियुक्ति हुई ही थी. मेरे नियोक्ता प्रधानाचार्य डॉ. डीडी पन्त कॉलेज के भौतिकी विभाग के अध्यक्ष होने के अलावा अनेक शोध-योजनाएँ भी चलाते थे. वो दौर डीएसबी का स्वर्णिम काल था, जब प्राध्यापकों में अनेक अंतर्राष्ट्रीय स्तर की चर्चित प्रतिभाएँ कार्यरत थीं. देश-विदेश में उनकी शोध-योजनाएँ चलती थीं, जिनकी चर्चाओं का लाभ दूसरे विषयों के अध्यापक और छात्र भी उठाते थे. पंतजी जैसे कुछ और प्राध्यापक भी थे, जो विषय और संकाय के अनुशासन से हटकर विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास को महत्व देते हुए निर्धारित पाठ्यक्रम से अलग अपने कार्यक्रम लागू करते थे. ये योजनाएँ होती तो उनके विषय की पूरक के रूप में थीं, मगर उनका उद्देश्य मौजूदा अध्ययन की जड़ता को तोड़ना और नया ज्ञान प्रचरित करना रहता था. मैं नया-नया प्राध्यापक नियुक्त हुआ था, ज्ञान-विज्ञान के अनुशासन की बारीकियों से अनभिज्ञ; मगर पंतजी का प्रिय था, जाने क्यों वो मुझ पर भरोसा रखते थे और अमूमन मेरी हैसियत से अधिक मुझे काम सौंप देते थे. भौतिक विज्ञान विभाग की एक नयी योजना के अंतर्गत अंतर्राष्ट्रीय स्तर के छात्रों के लिए एक आवासीय भवन की जरूरत थी, जहाँ सौ-पचास छात्र रहने के साथ ही अपना शोध भी आगे बढ़ा सकें. एक दिन मुझे प्रधानाचार्य का आदेश मिला कि मैं इस छात्रावास के वार्डन का कार्यभार ग्रहण कर लूं. तीन सौ रुपये बेसिक के वेतन-मान में मुझे तीस रुपए का अतिरिक्त मानदेय दिया जाना निर्धारित हुआ. जाहिर है, अध्यापकों के बीच हड़कंप मचा; विज्ञान के एक-से-एक प्रतिभाशाली और सीनियर प्राध्यापक होते हुए भी हिंदी के एक जूनियर-मोस्ट अध्यापक को नियुक्त किया जाना किसी को हजम नहीं हुआ. मगर अलग-अलग प्रयोग करना पंतजी का शौक था, वो कभी दूसरों की प्रतिक्रिया की परवाह किये बगैर अपने तरीके से अपने कार्यक्रम तय करते थे. उस ज़माने में कोई सोच भी नहीं सकता था कि विज्ञान की पढ़ाई हिंदी में की जा सकती है. मगर वो अमूमन फिजिक्स जैसे विषय को अंग्रेजी के अलावा ग्रेजुएशन के विद्यार्थियों की कक्षा हिंदी में भी लेते थे; क्योंकि उनका मानना था कि जस परिवेश के बीच से बच्चे आते हैं, उन तक विषय को पहुँचाने के लिए मातृभाषा में पढ़ाया जाना चाहिए. उनकी यह अध्यापन-शैली इतनी लोकप्रिय हुई कि दूसरे संकायों के वो विद्यार्थी, जो विज्ञान के विषयों में रुचि रखते थे, उनकी कक्षा में जाने लगे. विज्ञान के जिन छात्रों में खुद को विशिष्ट समझने का जो अहंकार था, उनकी लगाम भी कसी. एक-दूसरे के ज्ञान के बीच आवाजाही बढ़ी एबरफोइल का वह इंग्लिस्तानी बंगला एकाएक प्रबुद्ध विद्यार्थियों के लिए वरदान जैसा बन गया. वहाँ रहने वाले सभी विद्यार्थी अध्यापक थे; और विषय के नए ज्ञान की जानकारी प्राप्त करने के लिए वहाँ आये हुए थे. खाली वक़्त में वे सेमिनार और गोष्ठियाँ आयोजित करते थे, यदा-कदा विशेषज्ञ प्राध्यापकों को भी आमंत्रित करते थे, मुझे भी बीच में बैठा लेते थे, क्योंकि मैं अधीक्षक था. जाहिर है, मेरे ज्ञान और जानकारी का भी विस्तार हो रहा था.
पुरानी ब्रिटिश कोठी होने के कारण वहाँ विशाल हॉल, लॉन और दूसरे आकर्षक स्थान थे, चारों और घना जंगल था; विशाल वृक्षों से घिरा रहस्यमय परिवेश; जो एक विद्यार्थी में ज्ञान का संस्कार जगाने के लिए आवश्यक होता है. उस पर भौतिक-विज्ञान और खगोल शास्त्र के विद्यार्थी; उन्हें तो मानो मनचाहा स्वर्ग मिल गया था. नयी योजना होने के कारण प्राचार्य पंतजी भी अपना अधिकांश समय इस योजना को दे रहे थे, इसलिए भी यह छात्रावास शिक्षकों और छात्रों के बीच जल्दी ही लोकप्रिय हो गया. जैसा कि होता है, ऐसी योजनाएँ तत्काल ईर्ष्या का सबब बन जाती हैं; एक वर्ष से अधिक यह योजना नहीं चल पाई; और स्थगित हो गई. कुछ समय तक घिसटती रही, मगर एबरफॉयल बंगला एक दिन बीरान हो गया. कॉलेज-परिसर से दूर होने के कारण वहाँ कोई दूसरा विभाग शुरू नहीं हो सका और एक वक़्त ऐसा आया कि बंगले को शिक्षकों-कर्मचारियों के आवास के रूप में परिवर्तित कर दिया गया. जैसा होता है, आवासीय आबंटन की छीना-झपटी की राजनीति ने इस महान संस्था के अकादमिक और प्राकृतिक सौन्दर्य को हाशिए में धकेल दिया; उसका वही हश्र हुआ जो आजादी के बाद ब्रिटिशकालीन संपत्ति का भारतीयों के हाथ में पड़ जाने के बाद होता रहा है. एक पंतजी का वह महान सपना भंग हुआ, मगर दूसरा जन्म लिए बगैर छिन्न-भिन्न हो गया; जैसे उनके दूसरे तमाम सपने.








































