पर्यावरण
खतरा : बर्फ घटी, समय की चाल बिगड़ी…प्राकृतिक नियमों में बदलाव, विनाश की तैयारी…
चंद्रशेखर जोशी, नैनीताल। समय पृथ्वी की गति पर निर्भर है। पृथ्वी सूर्य की एक परिक्रमा पूरी कर ले तो एक वर्ष पूरा होता है। पृथ्वी अपने अक्ष पर एक चक्कर पूरा करे तो एक दिन। इस दिन का एक अंश 1 सेकंड माना गया। धरती की रफ्तार अस्थिर होने से समय गड़बड़ाने लगा है। इसका एक कारण ध्रुवों से पिघलती बर्फ भी है। विज्ञानियों का कहना है कि पिघलती बर्फ धरती के घूर्णन को धीमा कर रही है। इससे ध्रुवों से पानी भूमध्य रेखा की ओर खिसक रहा है, जिसका असर कोणीय संवेग पर पड़ता है। धरती की रफ्तार में इस गिरावट से समय का मापन बिगड़ रहा है। पहले वैज्ञानिकों का मत था कि चंद्रमा के कारण लाखों वर्षों में पृथ्वी का घूर्णन धीमा हो जाता है। चंद्रमा समंदरों पर आकर्षण बल लगाता है, इससे घर्षण पैदा होता है और धरती अपने अक्ष पर थोड़ा धीमे घूमने लगती है। इस मंदन के कई रोचक परिणाम होते हैं। 2000 साल पहले ग्रहण आज की गणना से अलग समय पर दिखते थे। करीब 1.4 अरब वर्ष पूर्व दिन आजकल के सिर्फ 19 घंटों के बराबर होता था। समय की शुद्धता मापने के लिए वैज्ञानिकों ने कई प्रयास किए। पहली सटीक परमाणु घड़ी ब्रिटेन की राष्ट्रीय भौतिकी प्रयोगशाला में 1955 में बनाई गई। यह घड़ियां परमाणु द्वारा उत्सर्जित प्रकाश की आवृत्ति के आधार पर चलती हैं। फिलहाल दुनिया में लगभग साढ़े चार सौ परमाणु घड़ियां समय का हिसाब रखती हैं। इसे को-ऑर्डिनेटेड यूनिवर्सल टाइम कहते हैं। इनके समयमान और पृथ्वी के समयमान में थोड़ा अंतर होता हैै। …पृथ्वी-घूर्णन के सेकेंड और यूनिवर्सल टाइम के सेकेंड के बीच तालमेल बैठाने को लीप सेकेंड जोड़ने की जरूरत पड़ने लगी। यह प्रथा 1972 में शुरू की गई। तब से अब तक 27 बार लीप सेकेंड जोड़ने की जरूरत पड़ी है। आखिरी लीप सेकेंड 2016 में जोड़ा गया। अब घूर्णन को प्रभावित करने वाला एक कारण जलवायु परिवर्तन और धरती का गर्म होना भी बन गया है। 1990 के दशक से ग्रीनलैंड तथा अंटार्कटिका की बर्फ पिघलकर भूमध्य रेखा की ओर बह रही है। इसकी वजह से समुद्रों का पानी बढ़ गया है और पृथ्वी का भूमध्य हिस्सा थोड़ा मोटा हुआ है। इसका असर यह हुआ कि पृथ्वी पहले की तुलना में थोड़ी पिचक गई है। इससे घूर्णन की गति धीमी पड़ी है। यह गति कम हो तो पृथ्वी का प्राकृतिक दिन लंबा हो जाता है। मौसम परिवर्तन के लिए दुनियाभर की सरकारें जिम्मेदार हैं। प्रदूषण फैलाते उद्योग, युद्ध सामग्री, बेतरतीब परिवहन, जंगलों का कटान, ब्रह्मांड में बढ़ता दखल धरती को गर्म कर रहे हैं।
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