स्वास्थ्य
उत्तराखंड में 30 पीजी चिकित्सकों की तैनाती पर विवाद गहराया, आरटीआई में यूएमसी का बड़ा खुलासा
सीएन, देहरादून/अल्मोड़ा/भीमताल। उत्तराखंड में 30 पीजी चिकित्सकों की तैनाती को लेकर विवाद लगातार गहराता जा रहा है। सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत प्राप्त दस्तावेजों में उत्तराखंड मेडिकल कौंसिल (यूएमसी) ने स्पष्ट किया है कि उत्तराखंड मेडिकल कौंसिल रूल्स 2004 के अनुसार बिना यूएमसी पंजीकरण कोई भी चिकित्सक राज्य में चिकित्सकीय कार्य नहीं कर सकता। प्राप्त अभिलेखों के अनुसार, आरटीआई कार्यकर्ता चंद्र शेखर जोशी, निवासी भीमताल (नैनीताल) द्वारा मांगी गई सूचनाओं में यह तथ्य सामने आया कि डीजी हेल्थ के पत्रांक 2980, 30 जनवरी 2026 की संस्तुति के आधार पर शासन ने आदेश संख्या 379892, 17 मार्च 2026 जारी कर 30 पीजी चिकित्सकों की तैनाती की थी। शिकायत के अनुसार, डीजी हेल्र्थ द्वारा पत्रांक 9217, 16 अप्रैल 2026 के माध्यम से उपलब्ध कराई गई सूचनाओं एवं अभिलेखों के अध्ययन में यह सामने आया कि 30 में से 16 चिकित्सकों के पीजी रज संबंधी मामलों में अनुत्तीर्ण अथवा अपूर्ण स्थिति दर्शाई गई थी। दस्तावेजों में कई चिकित्सकों के आवेदन परीक्षणाधीन, लंबित अथवा प्रक्रिया में बताए गए हैं। इसके बावजूद उन्हें विशेषज्ञ चिकित्सक के रूप में सरकारी अस्पतालों में तैनाती दिए जाने पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। आरटीआई में उपलब्ध कराए गए यूएमसी के उत्तर में स्पष्ट उल्लेख किया गया है कि उत्तराखंड मेडिकल कौंसिल रुल्स 2004 के तहत राज्य में चिकित्सा सेवा देने के लिए संबंधित चिकित्सक का यूएमसी में पंजीकरण अनिवार्य है। परिषद ने यह भी कहा कि बिना पंजीकरण कोई भी चिकित्सक चिकित्सकीय कार्य नहीं कर सकता।दस्तावेजों में यह भी उल्लेखित है कि विशेषज्ञ (पीजी) चिकित्सक के रूप में कार्य करने के लिए संबंधित विशेषज्ञता का पंजीकरण आवश्यक माना गया है। ऐसे में नियुक्ति प्रक्रिया की वैधता और विभागीय कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्न खड़े हो गए हैं। शिकायतकर्ता का आरोप है कि जब यूएमसी नियम स्पष्ट रूप से पंजीकरण को अनिवार्य बताते हैं, तब अनुत्तीर्ण अथवा अपूर्ण स्थिति वाले चिकित्सकों की तैनाती कैसे की गई। आरटीआई में उपलब्ध फाइल नोटिंग और पत्राचार से यह भी संकेत मिलता है कि कई मामलों में नियुक्ति के बाद अभिलेखों एवं पंजीकरण की प्रक्रिया जारी रही। इससे विभागीय पारदर्शिता और नियुक्ति प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सवाल उठने लगे हैं। शिकायतकर्ता ने सचिव चिकित्सा एवं स्वास्थ्य से पूरे प्रकरण की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग की है। साथ ही यदि नियमों की अनदेखी कर तैनाती आदेश जारी किए गए हों तो संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध कार्रवाई किए जाने की भी मांग उठाई गई है। मामले के सामने आने के बाद स्वास्थ्य विभाग एवं चिकित्सा शिक्षा विभाग में हलचल तेज हो गई है। सूत्रों के अनुसार विभागीय स्तर पर फाइलों और नियुक्ति अभिलेखों की पुनः जांच की जा रही है।





































