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पर्यावरण

पृथ्वी दिवस विशेष : विश्वस्वं मातरमोषधिनां ध्रुवां भूमिं पृथ्वीं धर्मणा धृतम्। शिवं स्योनामनु चरेम विश्वहा विश्वस्वं

प्रो. ललित तिवारी, नैनीताल।मातरमोषधिनां ध्रुवां भूमिं पृथ्वीं धर्मणा धृतम् । शिवं स्योनामनु चरेम विश्वहा॥ अर्थात  जो वनस्पतियाँ (पौधे) जगत की माता के समान हैं, वे स्थावर पृथ्वी (भूमि) पर उगती हैं।पृथ्वी सौरमंडल का एकमात्र ग्रह है जहाँ जीवन है, जिसकी सतह का 71% भाग पानी और 29% भाग थल है। यह सूर्य से तीसरा ग्रह और सौरमंडल का सबसे घना चट्टानी ग्रह है। 4.54 अरब वर्ष पुरानी, पृथ्वी में रहने योग्य तापमान, ऑक्सीजन युक्त वायुमंडल, और तरल जल की उपस्थिति शामिल है। पृथ्वी में ऑक्सीजन और नाइट्रोजन युक्त वायुमंडल है, जो जीवों के सांस लेने और सूर्य की हानिकारक पराबैंगनी किरणों  को रोकने के लिए  ओजोन परत विद्यमान  है। पृथ्वी पाँचवाँ सबसे बड़ा ग्रह जो  अपने अक्ष पर लगभग 1610 किमी/घंटा की गति से घूम कर   सूर्य के चारों ओर एक चक्कर 365.25 दिनों में लगाती है पृथ्वी का आकार  ध्रुवों पर थोड़ा चपटा तथा  वायुमंडल के 10 किलोमीटर ऊपर से अंतरिक्ष शुरू हो जाता है। हर  वर्ष  22 अप्रैल को पर्यावरण संरक्षण और पृथ्वी की संरक्षण   जागरूकता बढ़ाने के लिए  पृथ्वी दिवस मनाया जाता है। इसकी शुरुआत 1970 में अमेरिका में हुई थी, जिसका उद्देश्य जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के लिए लोगों को प्रेरित करना है।2026  हेतु की इसकी  थीम  हमारी शक्ति, हमारा ग्रह ” रखी गई है जो नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों तथा  स्थायी भविष्य के निर्माण के लिए लोगों, संगठनों और सरकारों की साझा जिम्मेदारी पर केंद्रित है। यह दिवस हमें उद्वेलित करता है कि हमारा ग्रह संकट में है और हमें पर्यावरण संरक्षण (जैसे- प्लास्टिक कम करना, पेड़ लगाना) के लिए कदम उठाने चाहिए। बढ़ते प्रदूषण, वनों की कटाई और प्राकृतिक संसाधनों के दोहन से पृथ्वी के पर्यावरण को हो रहे नुकसान को रोकने के लिए, यह दिन सक्रिय भागीदारी को प्रोत्साहित करता है। वर्तमान में, 193 से अधिक देशों में इसका आयोजन किया जाता है । यह दिन धरती माता के प्रति हमारी जिम्मेदारी को याद दिलाने और सतत भविष्य  के लिए कार्य करने का एक वार्षिक अवसर है ताकि हमारे ग्रह के प्राकृतिक पर्यावरण, संसाधनों, पारिस्थितिक तंत्र, कम प्रदूषण, वनों की कटाई  रुकने और जलवायु परिवर्तन से बचा सके ताकि शुद्ध वायु मिल सके तथा  बुद्धिमत्तापूर्ण उपयोग कर सतत विकास में योगदान करना  है। पुनर्चक्रण के  साथ बिजली ,पानी का उचित प्रयोग  करना  जरूरी है। इसीलिए कहा गया है सत्यं बृहदृतमुग्रं दीक्षा तपो ब्रह्म यज्ञः पृथिवीं धारयन्ति। सा नो भूतस्य भव्यस्य पत्न्युरुं लोकं पृथिवी नः कृणोतुः। अर्थात महान सत्य, सर्वोच्च नियम, दीक्षा, तप, ब्रह्म (ज्ञान) और यज्ञ इस पृथ्वी को धारण करते हैं। वह पृथ्वी, जो भूत और भविष्य की स्वामिनी है तथा  हमारे लिए स्थान प्रदान करती है। पृथ्वी को बचाओ, जीवन बचाओ, हम सबको बचाओ। हमारी पृथ्वी को हरा-भरा और स्वच्छ बनाने के लिए पृथ्वी से प्रेम करे और खुश रहे। पृथ्वी संतरणात् संतु नः पुन्या पुन्येन वातः। पुन्येन अध्युष्ट पुन्या पृथ्वी पुन्येन संतु नः॥अर्थात  हमारे अच्छे कर्मों से पृथ्वी की रक्षा हो और हमारे अच्छे कर्मों की रक्षा शुद्ध जल से हो। 

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