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पर्यावरण

कंक्रीट का विकास : यह केवल गर्मी नहीं है, बल्कि पारिस्थितिकी दिवालिएपन का परिणाम, भारत बन गया हीट चैंबर

सीएन, नैनीताल। पारिस्थितिकी दिवालिएपन का परिणाम है, जिसका ब्लूप्रिंट पिछले एक दशक में तैयार किया गया है। जब दुनिया की 100 सबसे गर्म शहरों की सूची में 95 नाम भारत के हों, तो यह जलवायु परिवर्तन नहीं, बल्कि प्रशासनिक और कॉर्पोरेट मिलीभगत से पैदा की गई एक आपदा है जब विकास की परिभाषा केवल पेड़ काटकर हाईवे बनाना और जंगल उजाड़कर खदानें खोलना रह जाए, तो नतीजे वही होते हैं जो आज हम भुगत रहे हैं। भारत आज एक हीट चैंबर बन चुका है, और इसकी जवाबदेही किसी अदृश्य मौसम पर नहीं, बल्कि उन दृश्य निर्णयों पर है जो सत्ता के गलियारों में लिए गए। यानी अरावली से हसदेव तक प्रॉफिट के लिए फेफड़ों की बलि। जब लोग सेव अरावली सेव आरे या सेव हसदेव के लिए सड़कों पर उतरे, तो उन्हें विकास विरोधी बताकर चुप करा दिया गया। छत्तीसगढ़ के हसदेव अरण्य में हज़ारों पेड़ों की कटाई केवल इसलिए की गई ताकि विशिष्ट बिजनेस घरानों के कोयला ब्लॉकों का रास्ता साफ हो सके। यह देश की ज़रूरत नहीं, बल्कि कॉर्पोरेट की तिजोरी भरने का खेल था। दिल्ली-एनसीआर का प्राकृतिक बफर अरावली आज अवैध खनन और अनियंत्रित निर्माण की भेंट चढ़ चुका है। नतीजा? झुलसा देने वाली लू और ज़हरीली हवा। पर्यावरण संरक्षण कानूनों का कमज़ोर होना प्रमुख कारक माने जा सकते हैं। विकास के नाम पर उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्रों में आलवैदर रोड निर्माण, भारी भरकम विद्युत परियोजनाओं का निर्माण, वनों का अंधाधुंध कटान, पर्यटन के नाम पर लाखों लाख वाहनों से हिमालयी क्षेत्रों को रौंदा जाना, वनाग्नि की घटनाओं का लगातार बढ़ना व अन्य अवैज्ञानिक कारक भी महत्वपूर्ण कारण हैं। जब भी इन कारकों की बात उठाई जाती है तो उन्हें विकास विरोधी घोषित किया जाता है। उत्तराखंड सहित देश के अन्य हिमालयी राज्य भी विकास के नाम पर विनाश की ओर धकेले जा रहे हैं। यह वैज्ञानिक सच है कि यदि भारत के हिमालयी क्षेत्र खतरे में आये तो पूरा भारत खतरे में होगा।
पिछले कुछ वर्षों में ईज ऑफ डूइंग बिजनेस के नाम पर पर्यावरण प्रभाव आकलन (ईआईए) के नियमों को जिस तरह से शिथिल किया गया, वह आत्मघाती है। जब कैग 54,282 करोड़ के बेहिसाब खर्च पर सवाल उठाता है, तो हमें यह भी पूछना चाहिए कि पर्यावरण के नाम पर वसूले गए ग्रीन सेस का क्या हुआ? नीति-निर्माता चीन की तरह रियल रिसोर्सेज (तेल रिज़र्व, फॉरेस्ट कवर) को सुरक्षित करने के बजाय रेटिंग एजेंसियों और बिल्डिंग लॉबी को खुश करने में लगे हैं। यहां सरकार की पालिसी फेल्योर मानी जाये, इसमें कोई संशय नही है। इसके अलावा मजदूरों की दिहाड़ी 2017 से फ्रीज है, घर की बचत खत्म हो रही है और मध्यम वर्ग कर्ज (ईएमआई) के बोझ तले दबा है। ऐसे में एक व्यक्ति के लिए क्लाइमेट चेंज एक विलासिता का मुद्दा बन जाता है, क्योंकि उसकी पूरी ऊर्जा केवल जिंदा रहने के संघर्ष में खर्च हो रही है। सत्ता इसी लाचारी का फायदा उठाती है और धार्मिक उन्माद व झूठी रैलियों के पीछे असली मुद्दों को दफन कर देती है। बिगड़ता पर्यावरण का मुद्दा राजनीतिक भी नहीं बनता क्योंकि जंगल काटने वाली कंपनियां ही राजनीतिक दलों की सबसे बड़ी चंदादाता (पालिटिकल फडिंग) हैं। जब तक जनता को धार्मिक गौरव और वीवीआईपी काफिलों की चकाचौंध में उलझाया जा सकता है, तब तक उसे सांस लेने लायक हवा की कमी महसूस नहीं होने दी जाएगी। उत्तराखंड के मलबे से लेकर झारखंड के कटते जंगलों तक, कहानी एक ही है—लूट की खुली छूट। अगर आज भारत जीने लायक नहीं बन रहा है, तो इसकी सीधी जवाबदेही उस पॉलिसी सर्कल पर है जिसने पर्यावरण को अड़चन और कॉर्पोरेट मुनाफे को विकास मान लिया है। क्या अब समय नहीं आ गया कि लिविंग वेज की तरह लिवेबल एनवायरनमेंट को भी एक संवैधानिक अधिकार के रूप में मांगा जाए।

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