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पर्यावरण

जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालय से निकलने वाली नदियां खतरनाक रूप से अस्थिर, अभूतपूर्व नुकसान होने की आशंका

प्रभाकर मणि तिवारी, दिल्ली। जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालय से निकलने वाली नदियां खतरनाक रूप से अस्थिर होकर तेजी से अपना मार्ग बदल रही हैं. चीनी शोधकर्ताओं की एक टीम के अध्ययन से इसका पता चला है. अरुणाचल प्रदेश के ऊपरी सियांग जिले के गेकु गांव में स्थित सियांग नदी पर प्रस्तावित एक मेगा-डैम परियोजना के कारण बाढ़ का खतरा बढ़ने की चिंता जताई जाती है. हिमालय को ‘एशिया का वाटर टावर’ कहा जाता है. यह जिन नदियों को पानी की आपूर्ति करता है उस पर भारत समेत विभिन्न देशों के करीब दो अरब लोग निर्भर हैं. लेकिन एक ताजा अध्ययन से पता चला है कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण होने वाले मौसमी बदलावों के कारण इन नदियों और उनके किनारे बसे इलाकों पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है. चीनी शोधकर्ताओं की यह स्टडी रिपोर्ट ‘साइंस’ जर्नल के 14 मई के अंक में छपी है. नदियों के बहाव में इस बदलाव का भारत पर बेहद प्रतिकूल असर पड़ने का अंदेशा है. हिमालय से निकलने वाली भारतीय नदियों को मुख्य रूप से तीन बड़ी नदी प्रणालियां–सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र  में बांटा गया है. इन तीनों में गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र और तीस्ता समेत करीब 19 प्रमुख और सहायक नदियां शामिल हैं. चीन में बीजिंग स्थित चाइना यूनिवर्सिटी ऑफ जियोसाइंसेज और सिचुआन यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों की  एक टीम की ओर से वर्ष 1980 से 2020 यानी बीते चार दशकों के सैटेलाइट आंकड़ों, तस्वीरों और जमीनी अध्ययन से पता चला है कि ग्लेशियरों और जमी हुई जमीन के पिघलने के कारण हिमालय से निकलने वाली नदियां पहले के मुकाबले दोगुनी तेजी से अपना रास्ता बदल रही हैं. इससे बाढ़ और तट-कटाव के अलावा सड़कों, पुलों और दूसरे आधारभूत ढांचों को भारी नुकसान का खतरा है. ग्लेशियर एक सुरक्षा कवच की तरह हैं. ये सूर्य से आने वाली अतिरिक्त गर्मी को वापस अंतरिक्ष में भेज देते हैं. नतीजतन, ये हमारे ग्रह को ठंडा रखने में अहम भूमिका निभाते हैं. ग्लेशियरों की परत एकाएक नहीं जमी. ये सैकड़ों-हजारों सालों की जमापूंजी हैं. लेकिन अब ग्लेशियर नाटकीय रफ्तार से पिघल रहे हैं. वैज्ञानिक कहते हैं, जो चीजें आमतौर पर पृथ्वी की जिंदगी के एक लंबे हिस्से के दौरान होती हैं, वो हमारे सामने कुछ ही साल में घट रही हैं. कुछ दशकों में ग्लेशियरों का एक बड़ा हिस्सा गायब हो चुका होगा. शोधकर्ताओं का कहना है कि मध्य और पूर्वी हिमालयी क्षेत्र के ज्यादातर ग्लेशियर शायद अगले एक दशक में मिट जाएंगे. तस्वीर: स्विट्जरलैंड में ग्लेशियरों को पिघलने से बचाने के लिए उन पर इंसूलेटेड कंबल रखा गया. कुछ हिस्सों पर खतरा ज्यादा तात्कालिक और गंभीर है. ग्लेशियरों के पिघलने और इसके कारण आने वाली बाढ़ से जिन देशों को सबसे ज्यादा जूझना होगा, उनमें पाकिस्तान भी है. काराकोरम पर्वत श्रृंखला में पिघलते ग्लेशियरों के कारण नई झीलें बनने लगी हैं. र: तिब्बत का सापु माउंटेन वैज्ञानिकों की इस टीम में चाइना जियोसाइंस यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर चेंगशान वांग और डॉ. जोंगपेंग हान के अलावा सिचुआन यूनिवर्सिटी के डॉ. लिन जिपेंग शामिल थे. इस टीम ने हिमालय से निकलने वाली नदियों पर जलवायु परिवर्तन के असर को समझने के लिए बीते चार दशकों के दौरान तीन प्रमुख हिमालयी घाटियों में नदियों की गति में होने वाले बदलावों का विश्लेषण किया. रिपोर्ट के मुताबिक, मैदानी इलाकों में नदियों के बहाव के तरीके पता चलता है कि पर्यावरणीय बदलावों की उन पर कैसी प्रतिक्रिया होती है. यह बदलाव नदी की गति, बाढ़, कटाव, बढ़ती गाद और नदी तटों की स्थिरता को भी प्रभावित करते हैं. इस अध्ययन रिपोर्ट में डॉ. हान ने कहा है, “ऊपरी हिमालयी क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन और नदी की धारा के बदलाव का परस्पर मजबूत संबंध है.” चीनी वैज्ञानिकों का कहना है कि हिमालयी इलाके में तापमान वैश्विक औसत के मुकाबले दोगुनी तेजी से बढ़ रहा है. इसका चेन रिएक्शन अब नदियों और इलाके के पारिस्थितिकी तंत्र पर साफ नजर आने लगा है. उन्होंने कहा है कि नदियों के बहाव पर जलवायु परिवर्तन के असर का पता लगाने के लिए हिमालयी नदियां सबसे आदर्श हैं. यह टीम दुनिया भर में नदियों के करीब आठ लाख मोड़ का अध्ययन और हिमालयी नदियों के साथ उनकी तुलना के बाद इस नतीजे पर पहुंची कि जलवायु परिवर्तन के प्रति उनकी (हिमालयी नदियों की) संवेदनशीलता वैश्विक औसत से लगभग आठ गुना ज्यादा है. रिपोर्ट में कहा गया है कि इस अध्ययन के नतीजों से चीन के किंघाई-जिजांग पठार पर जलवायु अनुकूलन रणनीति बनाने के अलावा बाढ़ की रोकथाम और पारिस्थितिकी संरक्षण प्रयासों और पूरी दुनिया में पर्वतीय हिमनद से निकलने वाली नदियों के प्रबंधन में काफी मदद मिल सकती है. चीनी वैज्ञानिकों की टीम ने हिमालय क्षेत्र से निकलने वाली नदियों के करीब 1582 किलोमीटर लंबे इलाके में एक हजार से ज्यादा मोड़ का अध्ययन किया. इसके तहत यह पता लगाया गया कि बीते चार दशकों में इन मोड़ों का स्वरूप कितना बदला है और वो अपनी जगह से कितनी दूर हटे हैं. इससे पता चला कि इस दौरान नदियों की गति तेजी से बढ़ी है और उनका रास्ता भी बदला है. वैज्ञानिकों का कहना है कि शुरुआती दौर में तो ग्लेशियरों के पिघलने से नदियों का जलस्तर बढ़ेगा. लेकिन यह सिलसिला जारी रहा तो इससे बाढ़ का खतरा तो बढ़ेगा ही, तटवर्ती इलाकों में रहने वाले लोगों, खेती और बुनियादी ढांचे पर भी गंभीर खतरा पैदा हो सकता है. इसके अलावा नदियों के पानी में ज्यादा मिट्टी और पत्थर आने के कारण उन पर बनी पनबिजली योजनाओं के लिए भी खतरा पैदा हो सकता है. अध्ययन रिपोर्ट में कहा गया है कि नदियों की गति में इस बदलाव का जलवायु परिवर्तन, बढ़ते तापमान, ग्लेशियरों और जमी हुई जमीन के पिघलने के साथ सीधा संबंध है. नदियों में पानी के साथ-साथ गाद की मात्रा भी बढ़ रही है. इससे नदियां पहले के मुकाबले ज्यादा अस्थिर हो गई हैं. बहाव की गति बढ़ने के कारण नदियां अपने किनारों को काट रही हैं. प्रोफेसर वांग ने कहा है, “अध्ययन रिपोर्ट से नदियों की गति में बदलाव की जो बात सामने आई है उससे हिमालयी जल स्त्रोतों पर निर्भर अरबों लोगों के सामने जल सुरक्षा और बाढ़ संबधी खतरा पैदा हो सकता है.” रिपोर्ट में कहा गया है कि हिमालयी क्षेत्र में दीर्घकालिक जल प्रबंधन, बाढ़ नियंत्रण और आधारभूत ढांचा तैयार करते समय जलवायु में बदलाव के कारण नदियों की गति-प्रकृति में होने वाले बदलावों  को ध्यान में रखना जरूरी है. नदियों की गति में इस बदलाव का भारत पर सबसे ज्यादा असर पड़ने का अंदेशा है. विशेषज्ञों का कहना है कि खासकर हिमालयी नदियों के किनारे बसा देश का पूर्वोत्तर इलाके पर सबसे ज्यादा खतरा है. यह इलाका पहले ही हर साल बाढ़ के गंभीर संकट से जूझ रहा है. लेकिन ताजा अध्ययन रिपोर्ट को ध्यान में रखें तो निकट भविष्य में यह खतरा कई गुना बढ़ सकता है. इलाके के कासकर अरुणाचल प्रदेश में हिमालय से निकलने वाली ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियों पर दर्जनों पनबिजली परियोजनाएं बनी हैं. अरुणाचल प्रदेश की नदियों के पारिस्थितिकी तंत्र और जल गुणवत्ता पर वैज्ञानिक अध्ययन करने वाले डॉ. तालेक गपाक .डीडब्ल्यू से कहते हैं, “ताजा अध्ययन इस इलाके के लिए खतरे की घंटी है. केंद्र और राज्य सरकार को इसके नतीजों को ध्यान में रखते हुए इस संभावित खतरे से निपटने के लिए दीर्घकालीन नीति तैयार करनी चाहिए.” असम में बाढ़ नियंत्रण के विशेषज्ञ जतिन बरुआ डीडब्ल्यू से कहते हैं, “असम में बाढ़ का खरता पहले से ही गंभीर है. हर साल इसकी चपेट में जान-माल का भारी नुकसान होता है. लेकिन असली खतरा तो निकट भविष्य में आने की आशंका है. अगर समय रहते इससे निपटने की ठोस योजना नहीं बनाई गई तो जान-माल का अभूतपूर्व नुकसान होने की आशंका बनी रहेगी.”

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