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उत्तराखण्ड

खुलासा : स्वास्थ्य विभाग में अपंजीकृत व अयोग्य डॉक्टरों की तैनाती पर सवाल, पोस्टिंग सिंडिकेट के आरोपों से मचा हड़कंप

सीएन, देहरादून। उत्तराखंड स्वास्थ्य विभाग में स्पेशलिस्ट चिकित्सकों की तैनाती को लेकर एक बड़ा और गंभीर विवाद सामने आया है। आरटीआई के माध्यम से प्राप्त दस्तावेज़ों, उपलब्ध अभिलेखों और हालिया घटनाक्रमों ने विभागीय कार्यप्रणाली की पारदर्शिता, निष्पक्षता और स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता पर गंभीर प्रश्नचिन्ह लगा दिए हैं। मामला अब कथित “पोस्टिंग सिंडिकेट” के आरोपों तक पहुंच चुका है, जिसने प्रशासनिक व्यवस्था की विश्वसनीयता को भी कटघरे में खड़ा कर दिया है।तैनाती प्रक्रिया पर गंभीरअनियमितताओं के आरोप स्वास्थ्य विभाग द्वारा जारी 30 स्पेशलिस्ट चिकित्सकों की तैनाती सूची में कई चौंकाने वाली विसंगतियां सामने आई हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार 16 चिकित्सकों का उत्तराखंड मेडिकल काउंसिल में पंजीकरण नहीं पाया गया। चिकित्सकों के पीजी परीक्षा उत्तीर्ण न करने के आरोप भी हैं। इसके बावजूद इन चिकित्सकों को महत्वपूर्ण पदों पर तैनात किया गया। यह स्थिति चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता और योग्यता आधारित नियुक्तियों पर गंभीर सवाल खड़े करती है। सूत्रों के अनुसार, डीजी हेल्थ और चिकित्सा सचिव की संस्तुतियों की अनदेखी की गई। 13 चिकित्सकों के तैनाती स्थल अंतिम समय में बदले गए। इन तथ्यों से यह आशंका प्रबल होती है कि तैनाती प्रक्रिया में उच्च स्तर पर हस्तक्षेप हुआ है। इस पूरे मामले का खुलासा आरटीआई कार्यकर्ता चन्द्र शेखर जोशी द्वारा प्राप्त सूचनाओं से हुआ है। दस्तावेज़ों से संकेत मिलता है कि फाइलों में अंतिम समय में संशोधन किए गए। विभागीय सिफारिशों को दरकिनार किया गया। इन परिस्थितियों ने “पोस्टिंग सिंडिकेट” जैसी आशंकाओं को बल दिया है, जिससे यह सवाल उठता है कि क्या अंतिम निर्णय प्रक्रिया पारदर्शी और नियमसम्मत थी। मामले को और संवेदनशील बनाता है एक कथित चिकित्सा लापरवाही का प्रकरण, जिसमें एक निजी अस्पताल में ऑपरेशन के दौरान एक प्रसूता की मृत्यु हो गई। इस घटना के बाद डॉ. नेहा सिद्दीकी की सितारगंज में गायनी स्पेशलिस्ट के रूप में तैनाती को लेकर पहले से उठ रहे सवाल और तीखे हो गए हैं। हालांकि, यह मामला अभी जांचाधीन है और अंतिम निष्कर्ष आना बाकी है। इस पूरे घटनाक्रम के बाद आम जनता के मन में कई महत्वपूर्ण प्रश्न खड़े हो रहे हैं कि क्या स्वास्थ्य विभाग में तैनाती प्रक्रिया वास्तव में पारदर्शी है? क्या योग्यता के बजाय सिफारिश और प्रभाव हावी हो रहा है? क्या इन अनियमितताओं का सीधा असर आम जनता की स्वास्थ्य सेवाओं पर पड़ रहा है? उपलब्ध तथ्यों और आरोपों की गंभीरता को देखते हुए यह मामला उच्चस्तरीय और निष्पक्ष जांच की मांग करता है। यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह केवल प्रशासनिक चूक नहीं बल्कि पूरे स्वास्थ्य तंत्र में व्यापक सुधार की आवश्यकता को दर्शाता है। ऐसे में सरकार और संबंधित विभागों की जिम्मेदारी है कि, तैनाती प्रक्रिया को पूर्णतः पारदर्शी बनाया जाए, जवाबदेही तय की जाए। योग्यता आधारित नियुक्तियों को प्राथमिकता दी जाए। ताकि आम जनता का भरोसा स्वास्थ्य व्यवस्था पर कायम रह सके।

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