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चार धाम यात्रा में पुण्य के साथ पाप भी कमा कर जा रहे तीर्थयात्री : 12 दिन में ही हिमालय में छोड़ गए 288 टन प्लास्टिक व कूड़ाचार

सीएन, चमोली/रूद्रप्रयाग/उत्तरकाशी। उत्तराखंड के चारधाम यात्रा में अब तक 28 लाख से अधिक श्रद्धालु 19 अप्रैल से दर्शन कर चुके हैं। 31 मई तक चारधामों से 288 टन से अधिक कूड़ा-कचरा एकत्रित किया गया है जिसमें केदारनाथ का योगदान सबसे अधिक है। प्लास्टिक कचरा हिमालयी ग्लेशियर के आसपास जमा होकर तापमान बढ़ाने, ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने का कारण बनता है। यह कहना अतिश्योक्ति नही होगी कि चार धाम यात्रा में आने वाले यात्री पुण्य के साथ पाप भी कमा कर जा रहे हैं। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार अब तक तीर्थयात्री हिमालय में 288 टन प्लास्टिक और कूड़ाचार छोड़ गए हैं। चार धाम यात्रा में सबसे बड़ी चिंता प्लास्टिक कचरे को लेकर है, जो हिमालय के संवेदनशील ग्लेशियर क्षेत्रों और इकोसिस्टम को नुकसान पहुंचा रहा है। उत्तराखंड की चारधाम यात्रा में भारी संख्या में तीर्थयात्री चारों धामों में पहुंच रहे हैं। 19 अप्रैल से शुरू हुई इस यात्रा में अब तक 28 लाख से अधिक श्रद्धालु दर्शन कर चुके हैं। एक ओर जहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंच रहे हैं, वहीं दूसरी ओर उतनी ही मात्रा में कचरा भी फैलाया जा रहा है। 31 मई तक चारों धामों से 288 टन से अधिक कूड़ा-कचरा एकत्र किया जा चुका है। उत्तराखंड के चारों धाम- बदरीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री-पर्यावरण की दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र हैं। ये सभी धाम लगभग 3000 मीटर की ऊंचाई पर स्थित हैं और इनके आसपास प्रमुख हिमालयी ग्लेशियर मौजूद हैं, जैसे यमुनोत्री में चंपासर ग्लेशियर, गंगोत्री में गंगोत्री ग्लेशियर, केदारनाथ में चोराबारी और कंपेनिंग ग्लेशियर तथा बदरीनाथ क्षेत्र में सतोपंथ और अलकापुरी ग्लेशियर। यात्रा के लगभग 51 दिनों में कुल 288 टन से अधिक कूड़ा इकट्ठा किया गया है। इसमें केदारनाथ से करीब 122 टन, गंगोत्री से 70 टन, यमुनोत्री से 80 टन और बदरीनाथ से लगभग 10 टन कचरा एकत्र किया गया है। यह कचरा ऊंचाई वाले क्षेत्रों से निचले इलाकों में लाया जा रहा है, जिससे साफ है कि श्रद्धालु पुण्य कमाने के साथ-साथ पर्यावरण को नुकसान भी पहुंचा रहे हैं। धार्मिक स्थलों को मैला कर पाप के भागीदार बन रहे हैं। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि तीर्थयात्रियों में जागरूकता व शिक्षा की भारी कमी है। चारधाम यात्रा में सबसे अधिक प्लास्टिक कचरा—जैसे बोतलें, पॉलिथीन, जूते-चप्पल, कपड़े और खाद्य पदार्थों के रैपर फैला रहा है। यह कचरा हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र के लिए बेहद खतरनाक है। प्लास्टिक सैकड़ों वर्षों तक नष्ट नहीं होता और ग्लेशियर क्षेत्रों में जमा होकर तापमान बढ़ाने और हिमनदों के तेजी से पिघलने का कारण बनता है। इसके अलावा, पिघलते ग्लेशियरों का जल नीचे बहते समय अपने साथ यह प्रदूषण भी लेकर जाता है. प्लास्टिक कचरा प्राकृतिक जल प्रवाह को भी बाधित करता है, जिससे बारिश और बर्फ का पानी जमीन में समाने के बजाय सतह पर बहता है। इससे भूस्खलन की आशंका बढ़ जाती है. ऊंचाई वाले क्षेत्रों के बुग्याल (घास के मैदान) भी इससे प्रभावित हो रहे हैं, जिससे जड़ी-बूटियों और वनस्पतियों की मात्रा और गुणवत्ता दोनों पर असर पड़ रहा है। इस क्षेत्र में पाए जाने वाले वन्य जीव—जैसे भालू, स्नो लेपर्ड, गिद्ध, हिमालयी आईबेक्स और भरल—भी इस कचरे से प्रभावित हो रहे हैं। ये जानवर खाने की तलाश में प्लास्टिक और अन्य कचरा निगल लेते हैं, जिससे वे बीमार पड़ रहे हैं। चारधाम यात्रा मार्ग पर कचरा प्रबंधन के लिए 37 मटेरियल रिकवरी फैसिलिटी केंद्र स्थापित किए गए हैं। इसके अलावा, प्लास्टिक कचरे के निस्तारण और परिवहन के लिए 38 प्लास्टिक कंपैक्टर और बेलिंग मशीनें लगाई गई हैं, ताकि कचरे को सुरक्षित तरीके से रिसाइक्लिंग के लिए भेजा जा सके। इस समस्या से निपटने के लिए सरकार को सख्त कदम उठाने की जरूरत है।

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