Connect with us

उत्तराखण्ड

नैनीताल की वादियों से अंटार्कटिका तक सच की खोज करने वाले निर्भीक पत्रकार गोविंद पंत राजू की प्रेरणादायक कहानी..

कृतिका पांडे, नैनीताल। पहाड़ों से उठी एक आवाज़ जिसने खबरों को सिर्फ बताया नहीं, बल्कि उन्हें दुनिया के आख़िरी छोर अंटार्कटिका तक पहुँचाया है. पत्रकारिता की दुनिया में कुछ नाम सिर्फ खबरों तक सीमित नहीं रहते, वे अपने काम से इतिहास रचते हैं और ऐसा ही एक नाम है, गोविंद पंत राजू का. एक ऐसे पत्रकार, जिनकी कहानी पहाड़ों की सादगी से शुरू होकर अंटार्कटिका की बर्फ़ीली धरती तक जाती है. यह कहानी सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उस जुनून की है जो सीमाओं को तोड़ देता है, उस जिद की है जो कठिनाइयों से हार नहीं मानती है और उस सोच की है जो पत्रकारिता को सिर्फ पेशा नहीं, बल्कि जिम्मेदारी मानती है. साल 1959 में उत्तराखंड के खूबसूरत शहर नैनीताल में जन्मे गोविंद पंत राजू का बचपन प्रकृति की गोद में बीता और नैनीताल की झीलें, पहाड़ और शांत वातावरण उनके व्यक्तित्व का हिस्सा बन गए. बचपन से ही वे प्रकृति को सिर्फ देखते नहीं थे बल्कि उसे महसूस करते थे. यही संवेदनशीलता आगे चलकर उनकी पत्रकारिता की सबसे बड़ी ताकत बनी. बता दे कि उनकी शुरुआती शिक्षा नैनीताल में ही हुई. बचपन से ही उनमें लिखने का बड़ा गहरा शौक था और स्कूल के दिनों में जब बाकी बच्चे खेल-कूद में लगे रहते थे, तब गोविंद पंत राजू अक्सर कागज और कलम के साथ अपनी दुनिया में खोए रहते थे. वे कहानियाँ लिखते, छोटी-छोटी घटनाओं को नोट करते और आसपास हो रही चीज़ों को अपने शब्दों में ढालते थे. इसी के चलते यह शौक धीरे-धीरे उनकी पहचान बनता गया और फिर जैसे-जैसे वे बड़े हुए, उनका पहाड़ों के प्रति लगाव और गहरा होता गया और इसी लगाव के चलते उन्होंने आगे की पढ़ाई के लिए उत्तरकाशी का रुख किया. उत्तरकाशी जो शहर अपने कठिन भौगोलिक हालात और आध्यात्मिक वातावरण के लिए जाना जाता है, वहां रहकर उन्होंने बीएससी की पढ़ाई पूरी की और इसके साथ ही उन्होंने इतिहास में पोस्टग्रेजुएशन भी किया. इतना ही नहीं उत्तरकाशी में बिताया गया समय उनके जीवन का बेहद महत्वपूर्ण दौर था. यहां उन्होंने न सिर्फ शिक्षा हासिल की, बल्कि जीवन को करीब से समझा हैं. पहाड़ों की कठिनाइयों, वहां के लोगों के संघर्ष और सादगी ने उनके भीतर एक संवेदनशील पत्रकार को जन्म दिया. वे लगातार लिखते रहे, स्थानीय समस्याओं पर, सामाजिक मुद्दों पर, और आम लोगों की कहानियों पर. इसी दौरान उनकी जिंदगी ने एक निर्णायक मोड़ लिया और एक दिन उनकी नजर नैनीताल समाचार के एक विज्ञापन पर पड़ी. यह उनके एक छोटा सा मौका था, लेकिन उन्होंने इसे बड़े अवसर में बदल दिया. उन्होंने आवेदन किया और उनका चयन हो गया. यहीं से उनके पत्रकारिता करियर की औपचारिक शुरुआत हुई. जहाँ से उन्होंने काफी कुछ सीखा है. बता दे कि उनकी खास बात यह रही कि वे उत्तरकाशी में पढ़ाई करते हुए ही नैनीताल समाचार के लिए काम करने लगे थे. यह काम किसी के लिए आसान नहीं होता है कि एक तरफ पढ़ाई और दूसरी तरफ पत्रकारिता, लेकिन उन्होंने दोनों को संतुलित तरीके से निभाया है और फिर पोस्टग्रेजुएशन के बाद वे वापस नैनीताल आए और अखबार की जिम्मेदारियों को पूरी तरह संभालने लगे. जिसके बाद धीरे-धीरे उनका काम फैलने लगा और वे जनसत्ता और जनमान जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के लिए फीचर्स लिखने लगे थे. बता दे कि उस दौर में तकनीक की सुविधाएं सीमित थीं, लेकिन उनका जुनून सीमित नहीं था. वे नवभारत टाइम्स के लिए टेलीग्राफी के जरिए खबरें भेजते थे, जो आज के दौर में सोच पाना भी मुश्किल है. यह उनकी मेहनत, समर्पण और पेशे के प्रति ईमानदारी को दर्शाता है. इसी दौरान उन्होंने इतिहास में पीएचडी भी पूरी की है. शिक्षा के प्रति उनका लगाव कभी कम नहीं हुआ. उन्होंने करीब 11 महीने तक अध्यापन भी किया, लेकिन उनका दिल हमेशा पत्रकारिता में ही लगा रहा है. इतना ही नहीं साल 1984 उनके जीवन का एक बड़ा मोड़ साबित हुआ और फिर नवभारत टाइम्स और टाइम्स ऑफ इंडिया समूह की ओर से निकली वैकेंसी के लिए उन्होंने आवेदन किया. जिसके चलते हुए उन्हें चयन प्रक्रिया के लिए उन्हें मुंबई बुलाया गया. वहां उन्होंने अपनी प्रतिभा का ऐसा प्रदर्शन किया कि उनका चयन हो गया. इसके बाद साल 1984 में वे लखनऊ आ गए और नवभारत टाइम्स में सब-एडिटर और रिपोर्टर के रूप में काम करने लगे थे. बता दे कि साल 1984 से 1992 तक का उनका समय बेहद महत्वपूर्ण रहा है. यह वह दौर था जब उन्होंने खुद को एक मजबूत पत्रकार के रूप में स्थापित किया, उनकी रिपोर्टिंग में गहराई थी, सच्चाई थी और एक अलग नजरिया था. लेकिन उनके जीवन का सबसे ऐतिहासिक अध्याय अभी बाकी ही था. बता दे कि उनका चयन भारतीय अंटार्कटिका अभियान के लिए हुआ और उनके यह सिर्फ एक उपलब्धि नहीं थी, बल्कि इतिहास रचने का मौका था. अंटार्कटिका, जहां इंसान का रहना बेहद कठिन है, जहां तापमान माइनस 60 डिग्री तक चला जाता है, जहां बर्फ़ के तूफान कभी भी आ सकते हैं, जहां महीनों तक अंधेरा छाया रहता है और ऐसे स्थान पर जाना अपने आप में एक साहसिक कदम था. वही गोविंद पंत राजू इस अभियान का हिस्सा बने और भारत के पहले पत्रकार बने जिन्होंने अंटार्कटिका से रिपोर्टिंग की. अंटार्कटिका में उनका अनुभव असाधारण था. वहां उन्होंने भारतीय वैज्ञानिकों के साथ रहकर उनके काम को करीब से देखा है, वैज्ञानिक बर्फ की मोटी परतों के नीचे छिपे हजारों साल पुराने रहस्यों को समझने की कोशिश करते हैं. वे ग्लेशियरों के पिघलने, जलवायु परिवर्तन और समुद्री स्तर में हो रहे बदलावों का अध्ययन करते हैं. उन्होंने देखा कि कैसे सीमित संसाधनों में वैज्ञानिक महीनों तक वहां रहते हैं और वहां का जीवन पूरी तरह अनुशासित होता है. हर दिन एक चुनौती होता है. कभी मौसम की, कभी संसाधनों की, और कभी मानसिक संतुलन की. इतना ही नहीं उन्होंने वहां की सच्चाई को शब्दों में ढाला और उनकी रिपोर्टिंग ने लोगों को यह समझाया कि अंटार्कटिका सिर्फ बर्फ़ का एक टुकड़ा नहीं है, बल्कि यह पूरी दुनिया के भविष्य से जुड़ा हुआ है. वहां हो रहे बदलाव सीधे हमारे जीवन को प्रभावित करते हैं. साथ ही उनकी रिपोर्ट्स नवभारत टाइम्स और टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित होती थीं, उस समय इतनी दूर से खबर भेजना बेहद मुश्किल था, लेकिन उन्होंने इसे संभव बनाया था. उनका यह अनुभव उनकी सोच में भी झलकता है- जहां कोई नहीं जाता, वहीं जाना पत्रकारिता का असली काम है, क्योंकि सच अक्सर वहीं छिपा होता है. इतना ही नहीं अंटार्कटिका से लौटने के बाद उनका करियर और भी मजबूत हो गया. जिसके बाद उन्होंने बीबीसी के लिए काम किया और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई. इसके अलावा उन्होंने एशियन न्यूज इंटरनेशनल के लिए भी यूपी संवाददाता के रूप में कार्य किया है. बता दे की उनकी रिपोर्टिंग का दायरा बेहद व्यापक रहा है. उन्होंने अयोध्या जैसे संवेदनशील मुद्दों को कवर किया, जहां हर शब्द और हर खबर का गहरा असर होता था. मुलायम सिंह यादव के शासनकाल के दौरान की घटनाओं को उन्होंने संतुलन और सटीकता के साथ प्रस्तुत किया है. इतना ही नहीं तराई क्षेत्र में आतंकवाद के दौर की रिपोर्टिंग उनके करियर का एक साहसिक अध्याय रही है. यह वह समय था जब वहां जाना और रिपोर्टिंग करना बेहद खतरनाक था, लेकिन उन्होंने जोखिम उठाया और सच्चाई को सामने लाया हैं. साथ ही नेपाल में लोकतंत्र की बहाली के समय भी उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है और उन्होंने उस ऐतिहासिक परिवर्तन को कवर किया जब नेपाल में राजशाही कमजोर हो रही थी और लोकतांत्रिक व्यवस्था मजबूत हो रही थी. इसके अलावा उन्होंने डिफेंस से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर भी रिपोर्टिंग की, जो उनकी समझ और अनुभव को दर्शाता है. इसके बाद उनकी एंट्री टीवी पत्रकारिता में हुई, जहाँ आज तक में उनका चयन हुआ और यहां से उनकी एक नई यात्रा शुरू हुई. शुरुआत में वे यूपी ब्यूरो चीफ बने, फिर नॉर्थ इंडिया ब्यूरो चीफ की जिम्मेदारी संभाली है. इस भूमिका में वे उत्तर प्रदेश, बिहार, उत्तराखंड और झारखंड जैसे बड़े राज्यों की खबरों की कमान संभालते थे. उनकी नेतृत्व क्षमता, निर्णय लेने की क्षमता और खबरों की समझ ने उन्हें एक मजबूत संपादकीय चेहरा बनाया है. करीब 11 वर्षों तक उन्होंने आज तक के यूपी और उत्तराखंड ब्यूरो चीफ के रूप में काम किया और इस दौरान उन्होंने कई बड़ी खबरों को कवर किया और अपनी टीम को भी एक नई दिशा दी. इतना ही नहीं उनका एक और महत्वपूर्ण पहलू उनकी यूनियनवादी सोच रही है. वे हमेशा पत्रकारों के अधिकारों और उनकी आवाज़ के लिए खड़े रहे है इसके साथ ही वे आकाशवाणी के कंट्रीब्यूटर भी रहे, जहां उन्होंने अपनी आवाज़ और विचारों के जरिए लोगों तक पहुंच बनाई है. वही लखनऊ आने के बाद उन्होंने इग्नू से पत्रकारिता की डिग्री भी हासिल की और यह दिखाता है कि वे हमेशा सीखने और खुद को बेहतर बनाने के लिए तैयार रहते थे. इसके बाद उन्होंने डीएनए ग्रुप में एक्जीक्यूटिव एडिटर के रूप में काम किया है और साथ ही वे रिलायंस रिटेल में जनरल मैनेजर (कॉरपोरेट अफेयर्स) के रूप में यूपी और उत्तराखंड की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं. और अब वर्तमान में वे फ्रीलांसिंग कर रहे हैं और अपने अनुभव के जरिए पत्रकारिता में योगदान दे रहे हैं. बता दे कि फोटोग्राफी उनका एक और जुनून है वे सिर्फ शब्दों से नहीं, बल्कि तस्वीरों से भी कहानियां कहते हैं. इसके लिए उन्हें कई पुरस्कार भी मिल चुके हैं. सामाजिक सरोकारों से उनका जुड़ाव भी बेहद गहरा रहा है. वे चिपको आंदोलन से जुड़े रहे और इस आंदोलन की पत्रिका पहाड़ के संस्थापक सदस्यों में शामिल रहे है और यह उनके पर्यावरण प्रेम और समाज के प्रति जिम्मेदारी को दर्शाता है. उनकी सोच को इन शब्दों में समझा जा सकता है कि खबर सिर्फ सूचना नहीं होती, वह समाज का आईना भी होती है और आईना हमेशा साफ होना चाहिए. गोविंद पंत राजू की कहानी हमें यह सिखाती है कि पत्रकारिता सिर्फ खबर लिखना नहीं है, बल्कि सच्चाई को तलाशना और उसे ईमानदारी से दुनिया के सामने रखना है. यह एक जिम्मेदारी है, एक मिशन है. नैनीताल की शांत वादियों से लेकर अंटार्कटिका की बर्फीली धरती तक, उन्होंने हर जगह अपनी पहचान बनाई है, उन्होंने यह साबित किया कि अगर जुनून हो, तो कोई भी जगह दूर नहीं होती और कोई भी कहानी अधूरी नहीं रहती है. आज जब पत्रकारिता कई चुनौतियों का सामना कर रही है, ऐसे में गोविंद पंत राजू जैसे पत्रकार हमें यह याद दिलाते हैं कि असली पत्रकारिता क्या होती है. निडर, सच्ची और समाज के प्रति जवाबदेह. उनकी यात्रा एक प्रेरणा है, हर उस व्यक्ति के लिए जो सच के रास्ते पर चलना चाहता है, चाहे वह रास्ता कितना भी कठिन क्यों न हो.नैनीताल समाचार से साभार

ADVERTISEMENTS
यह भी पढ़ें 👉  वीकेंड पर नैनीताल समेत कई पर्यटन स्थलों में सैलानियों का जबरदस्त दबाव, ट्रैफिक प्लान धड़ाम, शहर के नाकों में दलाल हावी, बाहरी लोगों के नीजि भवन भी होटल व होमस्टे में तब्दील
Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad

More in उत्तराखण्ड

Trending News

Follow Facebook Page

About

आज के दौर में प्रौद्योगिकी का समाज और राष्ट्र के हित सदुपयोग सुनिश्चित करना भी चुनौती बन रहा है। ‘फेक न्यूज’ को हथियार बनाकर विरोधियों की इज्ज़त, सामाजिक प्रतिष्ठा को धूमिल करने के प्रयास भी हो रहे हैं। कंटेंट और फोटो-वीडियो को दुराग्रह से एडिट कर बल्क में प्रसारित कर दिए जाते हैं। हैकर्स बैंक एकाउंट और सोशल एकाउंट में सेंध लगा रहे हैं। चंद्रेक न्यूज़ इस संकल्प के साथ सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर दो वर्ष पूर्व उतरा है कि बिना किसी दुराग्रह के लोगों तक सटीक जानकारी और समाचार आदि संप्रेषित किए जाएं।समाज और राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी को समझते हुए हम उद्देश्य की ओर आगे बढ़ सकें, इसके लिए आपका प्रोत्साहन हमें और शक्ति प्रदान करेगा।

संपादक

Chandrek Bisht (Editor - Chandrek News)

संपादक: चन्द्रेक बिष्ट
बिष्ट कालोनी भूमियाधार, नैनीताल
फोन: +91 98378 06750
फोन: +91 97600 84374
ईमेल: [email protected]

BREAKING