पर्यावरण
राज्य गठन से अब तक उत्तराखण्ड में 46,203 हेक्टेयर वन भूमि डायवर्ट, किस दिशा में जा रहा है प्रदेश : अनूप नौटियाल
सीएन, देहरादून। हरेला के अवसर पर मैं यह सोच रहा था कि उत्तराखण्ड किस गलत दिशा में जा रहा है। मेरे द्वारा दायर एक आरटीआई से पता चला है कि राज्य गठन (2000) के बाद से विकास परियोजनाओं के लिए 46,203 हेक्टेयर वन भूमि डायवर्ट की जा चुकी है। सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि इस पूरी वन भूमि डायवर्जन का 47% अकेले देहरादून जिले में हुआ है, जबकि देहरादून जिला राज्य के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का मात्र 6 प्रतिशत है। विडम्बना यह है कि जिस समय सरकार हरेला मना रही है, उसी समय ऋषिकेश-भानियावाला फोरलेन परियोजना के लिए हजारों पेड़ों की कटाई जारी है। मुझे गहरी चिंता है कि यह परियोजना ऐसे विकास मॉडल का प्रतीक बन चुकी है, जो हमारे नाजुक हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र को उसकी सीमाओं से कहीं आगे धकेल रहा है। यह स्पष्ट है कि उत्तराखण्ड को क्लाइमेट फ्रेंडली, कैरिंग कैपेसिटी आधारित प्लानिंग, पर्यावरण एवं वन कानूनों का कड़ाई से पालन, प्राकृतिक वनों का संरक्षण तथा कम्पेन्सेटरी अफ्फोरेस्टशन में पारदर्शिता की आवश्यकता है। मुझे विश्वास है कि आप भी सहमत होंगे कि हरेला केवल पेड़ लगाने और फ़ोटो खिंचवाने का नहीं बल्कि हमारे बचे हुए प्राकृतिक वनों को बचाने का भी पर्व होना चाहिए।
























