उत्तराखण्ड
हिंदी की उच्च शिक्षा चढ़ने में पहाड़ी आदमी को लगते हैं बीस साल
प्रो. लक्ष्मण सिंह बिष्ट बटरोही, नैनीताल। एक पुरानी कहावत है, मार-मार कर मुसलमान बनाना; एक नई कहावत जन्म ले रही है, मार-मार कर संस्कृत सिखाना; वास्तविकता यह है कि आज के दिन तक न कोई भारतीय मुसलमान बन पाया और न यह देश संस्कृत सीख पाया; अलबत्ता पिछले दो सौ सालों में हिन्दुस्तानी जन-जन के बीच अंग्रेजी की बेल ऐसी फ़ैल चुकी है कि उसकी जगह दूसरी भाषा और संस्कृति का पौधा कोई रोपना भी चाहे तो पल भर में सूखकर मुरझा जाएगा। नैनीताल के डिग्री कॉलेज से, जिसे पहाड़ के मशहूर उद्यमी ठाकुर दान सिंह बिष्ट ने अपने स्वर्गीय पिता की स्मृति में नैनीताल की अयारपाटा पहाड़ी में स्थापित किया था, मेरा पहला उच्च शिक्षा केंद्र बना. देश भर के विभिन्न विषयों से जुड़े चोटी के विद्वान विवि से अधिक वेतनमान प्रदान कर इस सुनसान पहाड़ी में बसाए गए और देखते-देखते यह सरकारी कॉलेज देश की नामचीन शिक्षण-संस्थाओं में शामिल हो गया. नए-नए विषयों, संकायों और ज्ञान की शाखाओं के साथ ही पाठ्यक्रमों और शोध का विस्तार हुआ, देवदार, बांज और अनेक देसी-विदेशी वनस्पतियों से घिरा यह अविस्मरणीय परिसर संसार-भर की अतुलनीय पुष्प-मालाओं की तरह पलक झपकते देश भर में प्रसिद्ध हो गया. जैसा कि होना ही था, राजनेताओं की कुदृष्टि का यह कॉलेज शिकार हो गया; संयुक्त उत्तर प्रदेश की रानीखेत विधान-सभा से विधायक निर्वाचित हुए मुख्यमंत्री चंद्रभानु गुप्त ने खुद ही सदन में सवाल उठाया कि कॉलेज के शिक्षकों को किस आधार पर अधिक वेतनमान दिया जा रहा है; और फिर देश में पहली बार एक अनहोनी हुई और कॉलेज-शिक्षकों का वेतनमान बहुत कम कर दिया गया. मुख्यमंत्री प्रदेश के प्रभावशाली नेता थे, स्थानीय लोग संगठित नहीं थे, उनके इस कुकर्म ने कॉलेज के प्रत्येक प्राध्यापक को एक-एक कर वापस मैदानों के अपने ठिकानों में जाने को विवश कर दिया. इस कॉलेज के प्राचार्य थे प्रसिद्ध गणितज्ञ प्रोफ़ेसर अवधेशनारायण सिंह, वही अपने साथ प्राचीन भारतीय लोक-भाषाओँ के प्रकांड विदवान डॉ. हरिवंश कोछड़ और देश-विदेश के जाने-माने भाषा-शास्त्री तथा दूसरे ख्यातिप्राप्त विद्वानों को लाये थे. उनके साथ ही जर्मनी में तुलनात्मक भाषा-विज्ञान पर महत्वपूर्ण शोध कर रहे संस्कृत के प्रोफ़ेसर जे. के. बलवीर भी आये थे. बनारसी ए. एन. सिंह के राजनीतिक संपर्क अच्छे थे, तत्कालीन मुख्यमंत्री गोविंदबल्लभ पन्त को वह ‘पन्त’ कहकर पुकारते थे, पंतजी भी उन्हें सम्मान देते थे उनका कोई भी निर्णय पत्थर की लकीर माना जाता था. वेतन-मान की छटनी के कारण प्रोफ़ेसर कोछड़ और बलवीर भी अपने विदेशी विवि में वापस चले गए. इसी हिंदी विभाग का अजीबोगरीब किस्सा है यह जो मेरे अपने अस्तित्व और भावी जिंदगी की रूपरेखा तय करने वाला था. 1951 में स्थापित हुए हिंदी विभाग के उन दिनों डॉ. पुत्तूलाल शुक्ल ‘चंद्राकर’ अध्यक्ष थे, जिन्हें छंदशास्त्र का विशेषज्ञ माना जाता था. नैनीताल आते ही उन्होंने कुमाऊँ की प्रसिद्ध लोकगाथा ‘राजुला मालूशाही’ को हिंदी के खास छंदों में ढालकर उसका हिंदी में मशीनी अनुवाद कर डाला था. जिन दिनों का यह किस्सा है, हिंदी विभाग में चंन्द्राकरजी के अतिरिक्त दो अन्य प्राध्यापक थे; बलिया निवासी डॉ. विश्वम्भरनाथ उपाध्याय, जो तंत्रशास्त्र, मध्यकालीन साहित्य के विशेषज्ञ होने के साथ-साथ समकालीन साहित्य के आलोचक के रूप में भी चर्चित हो रहे थे. इसीलिए वो शायद मेरे प्रिय अध्यापक थे और मैं हमेशा उनके संपर्क में रहता था. नैनीताल के आर्यसमाज मंदिर में अपने मित्र वाणिज्य विभाग के डॉ. निरंकारस्वरूप श्रीवास्तव के साथ मिलकर निरंतर कवि-सम्मेलन और मुशायरे आयोजित करते हुए नैनीताल के आम लोगों के बीच समकालीन साहित्यिक-धारा को जीवंत रखते थे. तीसरे प्राध्यापक वृन्दावन-वासी पंडित गोविन्द शर्मा थे, जो रीतिकालीन साहित्य बड़ा रस लेकर पढ़ाते थे. बहुत आत्मीय, रसिक और हमेशा आकर्षक वेश-भूषा में रहने वाले पंडितजी ज्यादातर बंद गले के सूट में रहते थे, और कभी-कभी धोती-कुरता पहने हुए मंच पर उपस्थित होकर रीतिकालीन शैली में मधुर कविताएँ सुनाते थे. उनके बारे में प्रसिद्ध था कि वो दिन में तीन बार अपनी पोशाक बदलते थे; कक्षा में पढ़ाते हुए अलग, घर पर अलग और मालरोड में घूमते हुए अलग. साहित्य को लेकर एक गड्ड-मड्ड समझ मेरे अन्दर इन्हीं तीन अध्यापकों की पढ़ाई से बनी. वह 1965 को कोई महीना था, जब मैं एम.ए. प्रथम वर्ष का छात्र था. बचपन से मेरी इच्छा थी कि मैं साहित्य के किसी विषय में शोधकार्य करूं. मैंने सम्पूर्ण आदर और श्रद्धा के साथ अपने अध्यक्ष पुत्तूलालजी के सामने अपना प्रस्ताव रखा. अवधी-भाषी होने के कारण वह मेरे नाम का उच्चारण एकदम शुद्ध करते थे और ‘क्ष’ ध्वनि को सीटी की तरह बोलते थे. क्लास में हाजिरी लेते हुए पतली आवाज के कारण पूरी कक्षा उनके इस संबोधन से चौंक उठती थी. खासकर मेरे नाम लक्षमण का एक-एक अक्षर विच्छेद के साथ बोलते थे. मेरे प्रस्ताव को सुनकर मानो उन पर वज्रपात हुआ और ‘आंधी पाछे जो जल बूठा’ की तर्ज पर वह जोर से चिल्लाये, ‘किस अज्ञानी ने आपको शोधकार्य का परामर्श दिया है? अपना परीक्षाफल और प्रतिशत पर ध्यान दिया है आपने? इस प्रतिशत पर तो तुमको कोई प्राईमरी में भी शिक्षक नियुक्त नहीं करेगा. शोधकार्य तो दूर की कौड़ी है बंधु!’ फिर एकाएक जाने क्यों ढीले पड़े, कुछ आत्मीय अंदाज़ में बोले, ‘मैं आपका हितैषी हूँ, कोई बैरी नहीं, अन्य शिक्षार्थियों की भांति आपका उज्ज्वल भविष्य देखना चाहता हूँ. इसलिए मेरी बात मानिए, इसी साल एल.टी. या बी. टी. का फॉर्म ऑफिस से ग्रहण कर भरिये, वहाँ निकलवाने में मैं आपकी सहायता कर दूंगा. यही मेरी गुरु-दक्षिणा होगी. परन्तु ये डिग्री कॉलेज की मृगमरीचिका का तत्काल परित्याग कीजिए, यथाशीघ्र उसे अपने अंतःकरण से मुक्त कर दीजिये.’ नैनीताल के शिक्षकों के साथ यों भी तालमेल नहीं बैठ रहा था, उन्हीं दिनों ‘धर्मयुग’ में बीएचयू के प्रख्यात कथाकार और शिक्षाविद डॉ. शिवप्रसाद सिंह की अस्तित्ववाद पर एक धारावाहिक लेखमाला प्रकाशित हो रही थी, जिससे प्रभावित होकर मैंने उन्हें पत्र लिखा और उनके निर्देशन में शोधकार्य करने की इच्छा व्यक्त की. बिना किसी ना-नकुर के उन्होंने मुझे वाराणसी बुला लिया और वर्षों की मेरी साध पूरी हुई. वह एक लम्बी कहानी है, कि कैसे लखनऊ एक्सप्रेस की सीट पर बैठे हुए ही मैंने एकाएक मैंने अपना निर्णय बदला और मैं लखनऊ से बनारस के बदले इलाहाबाद का टिकट खरीदकर मटियानीजी के पास चला गया और वहीँ प्रयाग विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में मैंने 1966 में डॉ. रामस्वरूप चतुर्वेदी के निर्देशन में शोधकार्य किया. मेरी अनेक आत्मकथात्मक कृतियों, ‘गर्भगृह में नैनीताल’ और ‘हम तीन थोकदार’ में यह प्रकरण विस्तार से चित्रित है। संलग्न चित्र में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री श्री नारायणदत्त तिवारी 2004 के आसपास मुझे उत्तराखंड साहित्य संस्कृति एवं कला परिषद की ओर से सम्मानित कर रहे हैं. बुजुर्ग नेता का गले लगाते हुए किया गया आत्मीय आलिंगन मुझे आज तक याद है! यह सब महज भाग्य का खेल नहीं है, अपनी धरती, ज्ञान और विषय के प्रति अन्तरंग अनुराग तथा जिज्ञासा का ही प्रतिफल था, जिसने मुझे डीएसबी परिसर में अनंत सपने देखने के बाद राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय फलक की यात्रा करवाई और मैं अपने वर्तमान मुकाम तक पहुँच पाया।






































