उत्तराखण्ड
उत्तराखंड नदियों का घर, गांव-शहर आखिर सूखे व प्यासे क्यों?
सीएन, देहरादून। यूपी से लेकर दिल्ली व पश्चिमी बंगाल की प्यास बुझाने व खेतों को हराभरा रखने वाली नदियां उत्तराखंड से.निकलती हैं। कई गधेरे इन नदियों में मिलती हैं। पर सिस्टम की कहिली व अनियोजित विकास के कारण प्रदेश के हजारों हजार गांव, शहर व कस्बे अपनी प्यास बुझाने को तरस रहे हैं। उत्तराखंड, जिसे कभी नदियों का घर कहा गया। वह उत्तराखंड, जहां गंगा और यमुना जैसी नदियां जन्म लेती हैं। वह उत्तराखंड, जहां हर पहाड़ से एक धारा फूटती थी, हर गांव के पास एक गधेरा बहता था और हर घर के आंगन में पानी की आवाज सुनाई देती थी। अब वही राज्य पानी के लिए टैंकरों की तरफ देख रहा है। उत्तराखंड में जल संकट अब सिर्फ गर्मियों की समस्या नहीं रह गया है। यह धीरे-धीरे सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय संकट में बदलता जा रहा है। राज्य के शहरों से लेकर दूरस्थ गांवों तक पानी की कमी लोगों की जिंदगी को प्रभावित कर रही है। उत्तराखंड जल संस्थान के आंकड़े बताते हैं कि राज्य में करीब 1060 ऐसे क्षेत्र हैं जहां पेयजल का गंभीर संकट है। इनमें 691 ग्रामीण इलाके और 369 शहरी कॉलोनियां शामिल हैं। गढ़वाल मंडल के 543 और कुमाऊं मंडल के 517 इलाके पानी की कमी से जूझ रहे हैं। यानी पूरा राज्य प्यासा है। सिर्फ आंकड़े अलग-अलग हैं। अगर जिलों की बात करें तो सबसे खराब स्थिति नैनीताल की बताई जा रही है। यहां 256 इलाके जल संकट से प्रभावित हैं। देहरादून में 191 क्षेत्र पानी की समस्या झेल रहे हैं। पौड़ी में 144, पिथौरागढ़ में 97 और टिहरी में 75 इलाके प्रभावित हैं। यह वही देहरादून है जिसे कभी दून वैली कहा जाता था। जहां बारिश जमीन में उतरती थी। जहां पेड़ों की जड़ें पानी को रोक लेती थीं। जहां नदियां सिर्फ बहती नहीं थीं, शहर को सांस भी देती थीं। लेकिन अब दून घाटी के नीचे का पानी तेजी से खाली हो रहा है। देहरादून आज उत्तराखंड के अनियोजित शहरीकरण की सबसे बड़ी कहानी बन चुका है। पिछले कुछ वर्षों में यहां बहुमंजिला इमारतें उगीं, कॉलोनियां बनीं, होटल बने, रिसॉर्ट बने और कंक्रीट की सड़कें फैलीं। लेकिन बारिश का पानी जमीन में उतरे, इसके लिए कोई व्यवस्था नहीं बनी। हर नई इमारत के नीचे एक नया बोरवेल खोदा गया। हर कॉलोनी ने धरती से पानी खींचा। लेकिन धरती को वापस पानी लौटाने की कोशिश नहीं हुई। नतीजा यह हुआ कि जो भूजल कभी 10 मीटर पर मिल जाता था, वह अब 20 मीटर या उससे भी नीचे जा चुका है। भूवैज्ञानिकों का कहना है कि उत्तराखंड की भौगोलिक बनावट भी इस संकट को गंभीर बना रही है। मैदानी इलाकों की तरह यहां जमीन के नीचे बड़े जल भंडार नहीं हैं। पहाड़ों में चट्टानों की संरचना अलग होती है। पानी ज्यादा देर तक रुक नहीं पाता। ऊपर से जलवायु परिवर्तन ने मानसून का पैटर्न बदल दिया है। पहले धीरे-धीरे बारिश होती थी। अब अचानक तेज बारिश होती है। पानी जमीन में उतरने के बजाय बह जाता है। भूवैज्ञानिक वर्गेश कहते हैं कि पहाड़ी राज्यों में भूगर्भ जल की उपलब्धता सीमित होती है। लेकिन पानी निकालने की रफ्तार लगातार बढ़ रही है। बड़े पंप और गहरे बोरवेल धरती का पानी तेजी से खींच रहे हैं। गर्मी शुरू होते ही उत्तराखंड का जल संकट और भयावह हो जाता है। प्राकृतिक जल स्रोत सूखने लगते हैं। धारों में पानी कम हो जाता है। नदियों का बहाव कमजोर पड़ता है। फिर पूरी निर्भरता भूजल पर आ जाती है। जल संस्थान के पास पूरे राज्य के लिए सिर्फ 86 पानी के टैंकर हैं। जरूरत इससे कहीं ज्यादा है। कई इलाकों में निजी टैंकरों की मदद लेनी पड़ती है। कई गांवों में पानी अब सरकारी पाइपलाइन से नहीं, बल्कि टैंकर की आवाज से आता है। नैनीताल, मसूरी और अन्य पर्यटन क्षेत्रों में होटल उद्योग तेजी से फैला है। हर सीजन में लाखों पर्यटक पहुंच रहे हैं। लेकिन पहाड़ की क्षमता सीमित है। एक होटल जितना पानी एक दिन में इस्तेमाल करता है, उतना पानी कई गांवों की जरूरत हो सकता है। फिर नए निर्माण, स्विमिंग पूल, लॉन और व्यावसायिक गतिविधियां पानी की मांग को कई गुना बढ़ा देती हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि पारंपरिक खेती छोड़कर ज्यादा पानी वाली फसलों की तरफ बढ़ना भी संकट का कारण है। पहले लोग वर्षा आधारित खेती करते थे।अब पंपों के जरिए लगातार पानी निकाला जा रहा है। यानी धरती के नीचे जमा पानी का इस्तेमाल बढ़ रहा है, लेकिन उसे रीचार्ज करने की व्यवस्था नहीं बन रही। उत्तराखंड में जल संकट सिर्फ पेयजल की दिक्कत नहीं है। उत्तराखंड जनादेश से साभार



































