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आपदा

धराली हादसा : पहाड़ों में नदियों के किनारे व संवेदनशील क्षेत्रों में मानव बसावट व अंधाधुंध निर्माण कार्य को लेकर उठे सवाल

सीएन, नैनीताल। आज से चार दशक पूर्व तक हिमालय की गोद में समाये हिमालयी राज्यों में आपदाएं यदाकदा आती थी। लेकिन अब मानवीय हस्तक्षेप व विकास की अंधी दौड़ के साथ ही नदियों व नालों के किनारे मानव बसावट, संवदेनशील स्थानों में भारी निर्माण, वैज्ञानिक चेतावनी को नजर अंदाज करना भारी पड़ने लगा है। अभी हालिया धराली हादसा इसका नमूना भर है। उत्तराखंड में उत्तरकाशी जिले के धराली गांव में बादल फटने से आई बाढ़ का दृश्य रोंगटे खड़े कर देने वाला था। पानी और मलबे का बहाव इतना तेज था कि बड़ी-बड़ी इमारतें पलक झपकते ही तिनकों की तरह बिखर गईं। कई लोगों को अपनी जान बचाने का मौका ही नहीं मिल पाया। गांव का करीब आधा हिस्सा मलबे के नीचे दब गया है। पचास से ज्यादा लोग अभी लापता हैं, जिनमें ग्यारह सैन्य कर्मी भी शामिल हैं। इस हादसे में जानमाल का कितना नुकसान हुआ, इसका आकलन तो बचाव एवं राहत अभियान पूरा होने के बाद ही हो पाएगा, लेकिन इस भयावह तस्वीर ने फिर इस बात का अहसास कराया है कि हमने पुराने हादसों से कोई सबक नहीं लिया। इस घटना ने वर्ष 2013 में केदारनाथ में आई बाढ़ की त्रासदी की याद दिला दी है, जिसमें बड़ी संख्या में लोगों की जान गई थी। तब पहाड़ी प्रदेशों में नदियों के किनारे और संवेदनशील क्षेत्रों में मानव बसावट तथा अंधाधुंध निर्माण कार्य को लेकर सवाल उठे थे, जो आज भी कायम है। बरसात के समय पहाड़ी इलाकों में बादल फटने की घटनाएं पहले भी होती रही हैं, लेकिन पिछले एक दशक में इस तरह के हादसों में तेजी आई है। खासकर उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में ऐसी घटनाएं बढ़ी हैं। मौसम विज्ञानियों का मानना है कि इसका एक कारण इन दोनों राज्यों में क्षेत्रीय जलचक्र में हो रहा बदलाव है। बरसात में सामान्य से कम या ज्यादा बारिश होना तो आम है, लेकिन एक साथ तेज बारिश या बादल फटने का क्रम बढ़ रहा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि पहाड़ी राज्यों में जलवायु परिवर्तन तेजी हो रहा है और जंगलों की कटाई तथा अवैज्ञानिक तरीके से बड़े पैमाने पर निर्माण कार्य इसका प्रमुख कारण है। यह सही है कि पहाड़ी इलाकों में स्थानीय लोगों को सड़क, पक्के घर और अन्य सुविधाएं मुहैया कराना जरूरी है, लेकिन विकास के इस क्रम में पर्यावरण संरक्षण का ध्यान रखना भी बहुत आवश्यक है। पर्यावरण असंतुलन बाढ़ और सूखे जैसी प्राकृतिक आपदाओं को जन्म देता है। पहाड़ी राज्यों में पर्यटन राजस्व और लोगों की आजीविका का बड़ा साधन है। पिछले कुछ वर्षों से उत्तराखंड और हिमाचल में पर्यटन के नए-नए स्थल विकसित हो रहे हैं। इन स्थलों पर सड़कों और ढांचागत निर्माण पर ज्यादा जोर है। बाढ़ग्रस्त धराली गांव भी इनमें से एक है। यह खीरगंगा नदी के किनारे बसा है और गंगोत्री धाम से करीब बीस किलोमीटर पहले पड़ता है तथा श्रद्धालुओं की यात्रा का प्रमुख पड़ाव है। पर्यटन की वजह से यहां नदी के किनारे बड़ी-बड़ी इमारतें खड़ी कर दी गईं, जिनमें से कई बाढ़ में ध्वस्त हो गईं। ऐसे में सवाल है कि शासन-प्रशासन की ओर से प्राकृतिक आपदाओं के लिहाज से संवेदनशील क्षेत्रों में मानव बसावट के लिए ठोस नियम-कायदे क्यों नहीं लागू किए जाते? ऐसे इलाकों में नदी-नालों के किनारे बसे गांवों को समय रहते दूसरी जगह स्थानांतरित क्यों नहीं किया जाता, जबकि हर साल बरसात के मौसम में बाढ़ की वजह से कई लोगों की जान चली जाती है। अब समय आ गया है कि राज्य सरकारें इस ओर गंभीरता से ध्यान दें। आमजन भी अपनी सुरक्षा को लेकर सतर्क रहें। अगर ऐसा नहीं हुआ, तो धराली जैसी आपदाएं बार-बार होंगी। यहां एक बात यह भी जरूरी है कि बाहरी प्रदेशों से सत्ता की सिफारिशों से कई कंपनियों को सड़क निर्माण से लेकर कई बड़ी परियोजनाओं का कार्य दिया गया है। हालत यह है कि इन कार्यों को दैत्य रूपी मशीनों, डायनामाइट से पहाड़ियों को बेरहमी से हिलाया जा रहा है। यह बाहरी कंपनियां न तो स्थानीय प्रशासन की बात मानती हैं और न ही वैज्ञानिक चेतावनी पर ध्यान देती हैं, सिर्फ पैसा कमाना इनका ध्येय है। अगर अब भी इस पृवत्ति पर अंकुश नही लगा तो वह दिन दूर नही जब उत्तराखंड, हिमाचल सहित हिमालयी राज्य नक्शे से ही गायब हो जायेगा। अभी हाल में ऐसी ही टिप्पणी सर्वोच्च न्यायालय भी कर चुका है।

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