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शिक्षा

हमारे नैनीताल के चंद्रलाल साह बुज्यू : अपना घर दान कर सीआरएसटी स्कूल व इंटर कॉलेज की स्थापना की, संस्कारों को ढालने वाला केंद्र बना

प्रो. लक्ष्मण सिंह बिष्ट, नैनीताल। 1960 के आस-पास के दिनों की बात है. मैं इंटर का छात्र था, बाकी बच्चों की तरह ही शरारती और वाचाल. मेरा स्कूल गवर्नमेंट हाईस्कूल था, जो सरकारी होने के कारण बाकी हिंदी माध्यम वाले स्कूलों से खास माना जाता था. अनुशासित और सरकारी आदेशों से बंधा हुआ. स्कूल में प्रदेश भर से विशिष्ट योग्यता के आधार पर चुने हुए शिक्षक आते थे, जिनके द्वारा पढ़ाये जाने के  कारण अपने हमउम्र छात्रों के बीच हमारी अलग शान थी. शहर में उन दिनों दो तरह की शिक्षण-संस्थाएं थीं: अंग्रेजी पब्लिक स्कूल, जहाँ रईसों के बच्चे शान झाड़ते थे, और हमारे सरकारी स्कूल. अंग्रेजी स्कूलों में सेंटजोजफ और शेरवुड थे; और उन दोनों के बीच नैनीताल की पूर्वी दिशा की  ऊँची पहाड़ी पर बसा बिड़ला विद्या मंदिर था, जो खुद को तो पब्लिक स्कूल कहता था, मगर मूलतः हिंदी-अंग्रेजी माध्यम से संचालित होता था. ऐसे में हम-जैसे भारतीय परिवेश में पले-बढ़े बच्चे, जो अंग्रेजी में कमजोर और अपनी निजी आज़ादी की तलाश में रहते थे, किसी ऐसे कोने की तलाश में रहते थे, जहाँ हमें अपनी मुक्त खुली स्पेस मिल सके. .बाज़ार के नजदीक होने और मामूली फीस होने के कारण जाने कब हमारा यह मंच चेतराम साह इंटर कॉलेज बन गया. हालाँकि मैं खुद भी बाज़ार में ही रहता था, लेकिन विषयों के अधिक विकल्प होने के कारण मेरा चयन गवर्नमेंट हाईस्कूल में हो गया, तो मैं बाकी छात्रों की अपेक्षा स्वाभाविक तौर पर खास हो गया था; मगर व्यक्तिगत आज़ादी के सपनों के कारण आते-जाते तिरछी नजर से रास्ते में पड़ने वाले सीआरएसटी की ओर देखकर आहें भरता था. यह कॉलेज ठीक मेरे पड़ोस में था, जहाँ मैं घंटी बजते ही कक्षा में दाखिल हो सकता था, मगर ‘अब पछताए होत क्या, जब चिड़ियाँ चुग गईं खेत’! मैं जी.एच.एस. वाला, खास विद्यार्थी, ऐसे बाज़ार-किनारे के स्कूल का कैसे हिस्सा बन सकता था? हाँफता हुआ, तालाब का पूरा चक्कर लगाने के बाद परमा-शिवलाल धरमशाला से नीचे उतरकर हाँफता हुआ प्रार्थना में शामिल होता था, अमूमन कोने में खड़े नेगी मास्साब की बैंत बम्स पर भी पड़ती थी, मगर कर ही क्या सकता था, अपना हाथ पहले ही काटकर दे चुका था.  इसके बावजूद चेतराम साह इंटर कॉलेज मेरी आहों में हमेशा बसा रहा. वहाँ मैंने पढ़ा नहीं था, इसलिए वहाँ की शैक्षणिक गतिविधियों की मुझे कोई जानकारी नहीं है; उसकी छवि मेरे मन में हमेशा मुहल्ले के स्कूल की ही बनी रही. लेकिन यह स्कूल हमेशा मेरे संस्कारों को ढालने वाले केंद्र के रूप में रहा है; और यह संभव हो सका है चंद्र लाल साह बुज्यू के कारण, जो सीआरएसटी के व्यवस्थापक और नैनीताल के एक गणमान्य बुजुर्ग थे. एक अजीब हस्ती, अपने विचित्र और परस्पर-विरोधी शौकों को लेकर दिन भर अयारपाटा के हटन कॉटेज से लेकर मल्लीताल-तल्लीताल के दर्जनों चक्कर लगाने के बाद अंततः आधी रात को सोने के लिए घर ही जाते थे; हालाँकि सवेरे पाँच बजे से उनका फौजी कार्यक्रम फिर से पुराने राग के साथ शुरू हो जाता था. संसार का शायद ही कोई शौक हो, जिसकी गंध के बीच से वो न गुजरे हों, नैनीताल की कोई चर्चित-अचर्चित हस्ती हो ही नहीं सकती जिसे वो या जो उन्हें न जानती हो. आजकल तो गली-गली में अपने मुँह मियाँमिटठू वाले इनसाईक्लोपीडिया पैदा हो गए हैं, मगर पिछली सदी के नैनीताल का अगर मौखिक गूगल तलाशना हो तो अनिवार्य रूप से आपको बुज्यू के अलावा बड़ाबाज़ार वाले दुर्गा साह पनवाड़ी, जिन्हें लोग नैनीताल का ‘आल-इंडिया-रेडिओ’ कहते थे, मिडिल स्कूल के हेडमास्टर ध्यानसिंह मास्साब, जिनकी दोस्ती गवर्नर से लेकर किसी भी ऐरे-गैरे के साथ समान गति से रहती थी और फौजी वर्दी में घर से लेकर कोर्टरूम तक का पैदल चक्कर लगाने वाले महामहिम पूर्व-मंत्री प्रताप भैया के बिना नैनीताल की गूगल-सर्च पूरी हो ही नहीं सकती. चंद्रलाल बुज्यू ने सबसे पहले नैनीताल के निम्न और मध्यवर्गीय बच्चों के बीच आदर्श नैतिक और परिवेशजन्य शिक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से अपने पिता चेतराम साह ठुलघरिया के नाम पर अपना घर दान कर स्कूल और इंटर कॉलेज की स्थापना की, जिसकी कुछ विशेषताओं का जिक्र मैंने ऊपर किया है. यह स्कूल चाहे जिस उद्देश्य से भी स्थापित किया गया हो, कालांतर में यह संस्था अपने प्रस्तावक के सपनों को विस्तार देती हुई समूचे नैनीताल का सांस्कृतिक दर्पण बन गई. नैनीताल के युवाओं की आधी से अधिक आवादी इसी शिक्षण-संस्था से शिक्षित होकर आगे बढ़ी है; शायद ही कोई नौजवान होगा, जिसने उनकी डांट न खाई हो!लोग बताते हैं कि वो सिर्फ डांटते थे, छड़ी या बैंत का प्रयोग नहीं करते थे. मगर उनके स्कूल का विद्यार्थी न होते हुए भी उनकी मार खाने का सौभाग्य मुझे प्राप्त हैजैसा कि मैंने कहा, कोई भी सरकारी या गैर-सरकारी कार्यक्रम हो, उनकी उपस्थिति के बगैर वह संभव ही नहीं था. उनकी खास बात यह थी कि वो किसी भी काम को हाथ में लेने के बाद उसे बिना अंजाम तक पहुँचाये छोड़ते नहीं थे. ऐसा भी नहीं था कि एक कार्यक्रम के बाद वो वहाँ से अपना हाथ खींच लेते हों! जब भी वो देखते कि उनके सपनों की अनदेखी की जा रही है, बिलानागा उसे टोकना वो अपना हक समझते थे; कोई बुरा माने या भला, वह कोई बड़ा आदमी हो या छोटा; गवर्नर हो, मुख्यमंत्री हो या प्रोफ़ेसर! सबका सम्मान करते थे, मगर लिहाज नहीं. अपनी विदेश यात्रा के बाद छुट्टियों में लौटने पर जब मैं नैनीताल पहुँचा, अचानक शाह रेडियोज के आगे मुझे रोककर खड़े हो गए और मेरा पेट टटोलने लगे. हैरानी से मैं उनका मुँह ताक रहा था कि बोले, “नैनीताल ने तुमको हंगरी भेज दिया था, देख रहा हूँ कि वहाँ से कितने ‘दाड-म्वट’ होकर लौटे हो!” अधिकांशतः वो कुमाउनी में ही बात करते थे; हालाँकि जो भी भाषा बोलते, उसकी मर्यादा और लहजे को पूरी तरह सुरक्षित रखते हुए. एक बार बाज़ार से निकलने के बाद उनका कार्यक्रम निश्चित नहीं रहता था, अलबत्ता पहले दिन किसी आत्मीय के घर जाकर बता देते कि कलको वो खाने या नाश्ते पर आयेंगे. उनकी यह अग्रिम खबर जरूरी नहीं कि पूरी हो ही; कई बार हमारे घर भी आए और बिना आहट रसोई में जाकर पत्नी से बोले, ‘यहीं खाऊंगा, कम तो नहीं पड़ेगा?’वह बात 1960 की है, जब मैं इंटर का छात्र था. मस्ती करते हुए मैं और मेरा लंगोटिया दोस्त पुरिया पन्त खिलखिलाते, सड़क की मिटटी-बजरी उछालते ठंडी सड़क पर उधम मचा रहे थे कि पीछे से मेरे मुँह पर एक जोर का झापड़ पड़ा. देखा, सामने चंद्रलाल बुज्यू खड़े हैं. “देखते नहीं, जगह-जगह पर लिखा हुआ है, तालाब के पानी में गंदगी डालना मना है. क्या नाम है तुम्हारा, किस क्लास में पढ़ते हो, अपना नाम और रोलनंबर बताओ! बदतमीज, तुम्हारे माँ-बाप ने यही सिखाया है तुमको?” हम दोनों दुम दबाकर भागे. कुछ दिनों बाद जब वो मिले, मेरे नमस्कार का उन्होंने जवाब भी नहीं दिया, मानो पहचाना ही न हो.

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