संस्कृति
नंदा महोत्सव : हिमालयी संस्कृति को जोड़ने वाली मां नंदा सुनंदा की मूर्ति का आधार है कदली, आज जायेगा दल, अभिमंत्रित अक्षत से पूजित कदली वृक्ष लाये जायेंगे….
प्रो. ललित तिवारी, नैनीताल। सरोवरनगरी नैनीताल में आज नंदा महोत्सव 2026 का आगाज हो रहा है। देर सांय महोत्सव का आयोजन करने वाली प्रसिद्ध रामसेवक सभा का दल कदली वृक्ष लाने के लिए निकटवर्ती मंगोली गांव जायेगा। विशेष पूजन के बाद कदली वृक्ष को गुरुवार को नैनीताल लाया जायेगा। नगर भ्रमण के बाद कदली के तनों से मां नदा सुनंदा की प्रतिमाओं का निर्माण किया जायेगा। ऐसी एक लम्बी परंपरा चली आ रही है। उत्तराखंड की आराध्य राजराजेश्वरी हिमालयी संस्कृति को जोड़ने वाली मां नंदा सुनंदा की मूर्ति का आधार कदली है। कदली जिसे बनाना, केला, प्लेंटेन भी कहते है तथा इसका वानस्पतिक नाम मुजा पैराडाइसिएका कुल म्यूजेसियाई है। यह एक बार फल देता है। भारतीय संस्कृति को एक सूत्र में जोड़ने वाले कदली को पवित्र, पूजनीय, दिव्य, धार्मिक एवं आध्यात्मिक माना गया है जिसमें भगवान विष्णु, गुरुदेव बृहस्पति के साथ लक्ष्मी का वास माना जाता है। कदली के जड़ में शिव का तथा मूल में विष्णु विराजते है।इसके पत्तों से पवित्र आसन, पात्र तथा शुद्धता से भोजन पात्र भी है। केले के पेड में लकड़ी नहीं होती जो अहंकार माया के त्याग का प्रतीक है, यह वंश वृद्धि एवं निरंतरता की प्रेरणा देता है। आयुर्वेद में औषधि, ऊर्जा देने वाला, पचने में आसानी के साथ पारिस्थिकी में गलन शील है। केले को भानुफल, गज वसा, कुंजरसत, मोचा, रंभ भी कहते है जिसमें कैल्शियम, मैग्नीशियम, आयरन, फॉस्फोरस, कॉपर, फाइबर के साथ एंटी आक्सीडेंट भी मिलते है। यह पारिस्थितिक अनुकूल है। कदली वन हनुमान आराधना के लिए शुभ माना गया है। महर्षि दुर्वासा ने कदली की उत्पत्ति राख से की तथा इसका हर भाग लाभप्रद है। संपन्नता, अच्छे स्वास्थ्य के प्रतीक केले की उत्पत्ति 10 हजार वर्ष पूर्व मानी जाती है। साउथ ईस्ट एशिया से पैदा हुए यह सबसे ज्यादा भारत फिर चीन फिर इंडोनेशिया में होता है। कदली बड़े पत्तों के कारण कार्बन सिंक, कार्बन शोषण का कार्य करता है, मृदा अपरदन को रोकता, बायोमास के साथ खाद निर्माण, जल संचय, वाटर टेबल में सुधार, परागण, आश्रय के साथ फाइटरिमीडिएशन भी करता है। केला भोजन भी है तथा न्यूट्रिशियस भी। पारिस्थितिक अनुकूलन के कारण इसी काफली तने पर मां नंदा सुनंदा की मूर्ति का निर्माण किया जाता है जो प्रकृति के साथ अध्यात्म, शक्ति एवं परंपरा को प्रदर्शित करता है। कदली वृक्ष को मां नंदा सुनंदा का ही प्रतीक माना जाता है। कदली वृक्षों का चयन भी आध्यात्मिक तरीक़े से किया जाता है। पुरोहित व देवडांगर शुभमुहूर्त में मंत्रोच्चार के साथ अभिमंत्रित अक्षत कदली वृक्षों में फैंकते हैं। मान्यता है कि जो वृक्ष हिलता है उन्हीं को काट कर लाया जाता है। कदली वृक्षों के बावत एक लोक कथा भी प्रचलित है। कहा जाता है कि कुमाऊं के राजा चन्दों की नंदा सुनंदा नाम क बहने ससुराल जा रही थी तभी रास्ते में राक्षस रूपी भैंसे ने उनका पीछा. कर दिया। भागती हुई दोनों बहनें कदली वन में छिप गई। तभी वहां एक बकरे.ने कदली. के पत्ते खा लिए भैंसें ने.दोनों बहनों को देखते ही.उन पर हमला कर दिया। कहा जाता है कि तब से.भैंसे व बकरे की बलि देने.व कदली वृक्ष के तनों से प्रतिमाएं बनाने की परंपरा शुरू हुई। आज से तीन दशक पूर्व तक देवी मंदिरों में भैंसे व बकरे की बलि देने की परंपरा कुमाऊं में रही थी, लेकिन यह परंपरा लगभग समाप्त हो चुकी है। आज भी नैनीताल में नयना देवी मंदिर में आसपास के ग्रामीण बकरों.को लाते हैं। अब हाईकोर्ट के आदेशों के बाद उनकी बलि देने में रोक है, लिहाजा बकरों की बलि शहर के बाहर की जाती है। यह परंपरा अब लगभग समाप्ति की ओर है।









































