क्राइम
उत्तराखंड में बढ़ता नशे का जाल : युवा को तस्कर का ग्राहक बनने से रोकना पूरे समाज की जिम्मेदारी
विनीता यशस्वी, नैनीताल। उत्तराखंड को देवभूमि कहा जाता है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में इस देवभूमि की एक दूसरी तस्वीर भी सामने आई है—नशे के बढ़ते कारोबार की। पुलिस और एसटीएफ की लगातार कार्रवाई के बावजूद नशीले पदार्थों की तस्करी का नेटवर्क खत्म होने के बजाय अपना स्वरूप बदलता दिखाई दे रहा है। अब चिंता केवल चरस और गांजे तक सीमित नहीं है; सिंथेटिक ड्रग्स, नशीले इंजेक्शन और दवाओं के दुरुपयोग ने चुनौती को और गंभीर बना दिया है। उत्तराखंड में एनडीपीएस एक्ट के तहत दर्ज मामलों पर नजर डालें तो 2023 में 1,335 मामले दर्ज हुए और 1,789 गिरफ्तारियां हुईं। 2024 में 1,159 मामले और 1,489 गिरफ्तारियां हुईं। 2025 में मामले फिर बढ़कर 1,366 और गिरफ्तारियां 1,697 तक पहुंच गईं। यानी एक वर्ष की गिरावट के बाद फिर से मामलों और गिरफ्तारियों में उछाल आया। इन आंकड़ों का एक दूसरा पहलू भी है। गिरफ्तारी का आंकड़ा नशे की लत वाले लोगों की उम्र या संख्या नहीं बताता। उत्तराखंड के लिए 2023, 2024 और 2025 का कोई ऐसा समेकित सरकारी आंकड़ा सार्वजनिक नहीं है जिसमें यह बताया गया हो कि गिरफ्तार या उपचाराधीन लोगों में कितने 18 वर्ष से कम, कितने 18–25 वर्ष, कितने 26–40 वर्ष और कितने 40 वर्ष से अधिक उम्र के हैं, इसलिए उम्रवार लत का दावा केवल पुलिस की गिरफ्तारी के आंकड़ों से करना उचित नहीं होगा। युवाओं को लेकर भी उपलब्ध शोध गंभीर संकेत देता है। देहरादून जिले के डोईवाला और सहसपुर क्षेत्रों में 10 से 24 वर्ष की उम्र के 14,203 लोगों पर किए गए एक अध्ययन में पदार्थ-उपयोग की व्यापकता डोईवाला में 13.02 प्रतिशत और सहसपुर में 8.14 प्रतिशत पाई गई। अध्ययन में 10–17 वर्ष के पदार्थ-उपयोग करने वाले प्रतिभागियों में से 30 प्रतिशत में उच्च जोखिम के संकेत मिले। यह आंकड़ा पूरे उत्तराखंड पर लागू नहीं होता, लेकिन यह जरूर बताता है कि समस्या को केवल वयस्क आबादी तक सीमित मानना खतरनाक होगा। किशोर और युवा भी जोखिम के दायरे में हैं। यही वह बिंदु है जहां नशे की लड़ाई का सबसे महत्वपूर्ण सवाल सामने आता है—नशे की शुरुआत किस उम्र में हो रही है? यदि शुरुआती उम्र में प्रयोग शुरू हो रहा है तो रोकथाम की रणनीति भी उसी उम्र से शुरू करनी होगी। स्कूलों में केवल भाषण और पोस्टर पर्याप्त नहीं होंगे। बच्चों और किशोरों के लिए भरोसेमंद परामर्श, परिवार के साथ संवाद, खेल और रचनात्मक गतिविधियों के अवसर तथा जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ सहायता की व्यवस्था जरूरी होगी। चरस की बरामदगी इस समस्या की गंभीरता बताती है। 2024 में एसटीएफ के आंकड़ों में करीब 260.75 किलोग्राम चरस बरामदगी दर्ज हुई, जबकि 2025 में करीब 250.24 किलोग्राम चरस बरामद हुई। मात्रा में मामूली कमी जरूर आई, लेकिन इसे नशे की समस्या में कमी का प्रमाण नहीं माना जा सकता, क्योंकि इसी दौरान नशे के दूसरे रूप तेजी से सामने आए। 2025 में एसटीएफ की अलग-अलग कार्रवाइयों में 17.516 किलोग्राम चरस, 14.465 किलोग्राम अफीम, 3.763 किलोग्राम हेरोइन और 434.748 किलोग्राम गांजा बरामद करने की जानकारी दी गई। इन बरामदियों का अनुमानित मूल्य करीब 22.86 करोड़ रुपये बताया गया। 34 एनडीपीएस मामलों में 54 आरोपियों को गिरफ्तार किया गया और 28 मामलों को पीआईटी-एनडीपीएस कानून के तहत सरकार को भेजा गया। सबसे अधिक चिंता सिंथेटिक ड्रग्स को लेकर है। 2024 में करीब 372 ग्राम एमडीएमए बरामद हुआ था, जबकि 2025 में इसकी बरामदगी बढ़कर लगभग 5.84 किलोग्राम हो गई। 2025 में करीब 69,860 नशीले इंजेक्शन और 10,472 बोतल सिरप की बरामदगी भी बताई गई। इससे नशे के बाजार में बदलाव का संकेत मिलता है। समस्या अब केवल पारंपरिक मादक पदार्थों तक सीमित नहीं है, बल्कि सिंथेटिक ड्रग्स और कुछ दवाओं के दुरुपयोग तक फैल रही है। 2026 के लिए जुलाई तक पूरे उत्तराखंड का समेकित, पदार्थवार आधिकारिक आंकड़ा अभी उपलब्ध नहीं है, लेकिन वर्ष के पहले सात महीनों में सामने आई कार्रवाइयां बताती हैं कि चुनौती बनी हुई है। मई में उत्तरकाशी में 678 ग्राम चरस की बरामदगी और गिरफ्तारी तथा जून में हरिद्वार के बहादराबाद क्षेत्र में 50 नशीले इंजेक्शनों के साथ गिरफ्तारी के मामले सामने आए। जुलाई में देहरादून में 48.55 ग्राम एमडीएमए और 40.75 ग्राम स्मैक बरामद होने की जानकारी सामने आई। जून में नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो ने देहरादून में पुराने मामलों में जब्त करीब 303 किलोग्राम मादक पदार्थ नष्ट किया। इन पदार्थों की अनुमानित कीमत 236 करोड़ रुपये बताई गई थी। इसमें चरस के साथ कुछ नियंत्रित दवाएं भी शामिल थीं। नशे के खिलाफ पुलिस की कार्रवाई जरूरी है, लेकिन क्या बरामदगी और गिरफ्तारी ही सफलता का अंतिम पैमाना है? किसी तस्कर को गिरफ्तार करना जरूरी है, लेकिन उसके नेटवर्क की अगली कड़ी तक पहुंचना और उसे तोड़ना उससे भी महत्वपूर्ण है। इसी तरह नशे की समस्या से जूझ रहे व्यक्ति को केवल अपराधी के रूप में देखने के बजाय उसके उपचार और पुनर्वास पर भी ध्यान देना होगा। नशे के खिलाफ लड़ाई में सप्लाई रोकना और डिमांड कम करना, दोनों जरूरी हैं। डिमांड कम करने की शुरुआत उस उम्र से करनी होगी जहां जोखिम पैदा होता है। देहरादून का उपलब्ध अध्ययन इसी ओर संकेत करता है कि किशोर और युवा आबादी को नशा रोकथाम की रणनीति के केंद्र में रखना जरूरी है। यदि राज्य वास्तव में ‘ड्रग्स फ्री देवभूमि’ का लक्ष्य हासिल करना चाहता है तो उसे केवल बरामदगी और गिरफ्तारी के आंकड़े जारी करने से आगे बढ़ना होगा। हर वर्ष यह भी सार्वजनिक किया जाना चाहिए कि नशे से संबंधित मामलों में गिरफ्तार लोगों की उम्र क्या थी, उपचार और पुनर्वास केंद्रों में आने वाले लोगों की उम्र क्या है, पहली बार नशे का सेवन करने की औसत उम्र कितनी है और किन जिलों तथा आयु-वर्गों में समस्या अधिक दिखाई दे रही है।ऐसे आंकड़ों के बिना नीति बनाना कुछ हद तक अंधेरे में निशाना साधने जैसा होगा। उत्तराखंड के लिए यह सिर्फ कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं है। यह उसके सामाजिक और आर्थिक भविष्य का सवाल है। जिस राज्य की सबसे बड़ी पूंजी उसकी युवा आबादी है, वहां किशोरों और युवाओं को नशे से बचाना केवल सरकार की नहीं, पूरे समाज की जिम्मेदारी है। ‘ड्रग्स फ्री देवभूमि’ की सफलता का पैमाना केवल यह नहीं होना चाहिए कि कितने किलो चरस या गांजा पकड़ा गया और कितने लोग गिरफ्तार हुए। सवाल यह भी होना चाहिए कि कितने बच्चों और युवाओं को नशे की शुरुआत से पहले बचाया गया, कितने लोगों को उपचार मिला और कितने लोग सफलतापूर्वक सामान्य जीवन में लौटे। तस्कर को पकड़ना कानून की जिम्मेदारी है, लेकिन युवा को तस्कर का ग्राहक बनने से रोकना पूरे समाज की जिम्मेदारी है। नैनीताल समाचार से साभार



























