नैनीताल
भारत का भावी इतिहास बुलडोजरों की कलम से ही लिखा जाना है…..
प्रो. लक्ष्मण सिंह बिष्ट बटरोही, नैनीताल। यूपी-बिहार की मुझे कोई जानकारी नहीं है; राजनीति का कखग कुछ भी नहीं जानता, मगर आज अपने अध्यापन-काल में संपर्क में आए कुछ छात्रों से आपसे परिचय कराने का मन है. इन बच्चों की याद मेरे दिमाग में दो दिन पहले ही कौंधी, जब मैंने अख़बारों में पढ़ा कि बिहार के मुख्यमंत्री के पद पर माननीय सम्राट चौधरी की ताजपोशी कर दी गई है. आप सोच सकते हैं, इस प्रकरण का मुझसे और मेरे अध्यापन से क्या मतलब? मगर जिस तेजी से यह ग्लोबल दुनिया लोकल होती जा रही है, हम अध्यापकों की दीक्षा का संस्कार भी तो उसी तेजी से बदल रहा है. असल में इस ताजपोशी के साथ ही मेरे मन में अपने एक छोटे भाई राजनेता गोविन्द सिंह कुंजवाल, बीए की कक्षा में पढ़ने वाला, हमेशा किताब पर अपना ध्यान केन्द्रित किये रखने वाला गुमसुम-सा छात्र संजय कुमार ‘संजू’, पढ़ाई के दौरान नोट्स लेने के बजाय डेस्क पर तबले की थाप देने वाला मनोज जोशी ‘मंटू’, नई कविता आन्दोलन के साथ दादागिरी के गुरों पर बात करने वाला बीए फाइनल का लड़का भूपाल सिंह भाकुनी (उपनाम इस वक़्त याद नहीं आ रहा) वो खास चेहरे हैं, जिन्हें मैं कभी भूल नहीं सकता. गोविन्द मेरे पड़ोस के गाँव कुञ्ज के रहने वाले हैं, जिनके साथ मेरा अध्यापन का रिश्ता तो नहीं रहा, अलबत्ता मेरे मन में मानवीय संस्कार पैदा करने वाले उनके बड़े भाई स्वर्गीय केदार सिंह कुंजवाल की स्मृतियों का जरूर है, जो न होते तो न उनके छोटे भाई गोविन्द सिंह इतनी गंभीर सोच वाले राजनेता बन पाए होते, न मुझमें साहित्यिक संस्कार पनपते और न उनके भाई प्रदेश के एक गंभीर सरोकारी नेता के रूप में उभरते. हमारा लमगड़ा क़स्बा एक दौर में अपने उपद्रवों के कारण खासा बदनाम हो चुका था. औरतों-बेटियों का सड़क-मुहल्ले से गुजरना कठिन हो गया था, औरतें अकेले जंगल निकलने में डरती थीं. जाने कैसे गांधीवादी संत केदार सिंह कुंजवाल के अनुज गोविन्द सिंह में इस अनाचार को लेकर समाजोद्धार की भावना पनपी; उसने अकेले के बल पर इलाके के एक-एक शोहदे को चुन-चुन कर ऐसे ठिकाने लगाया कि जो इलाका कभी आतंक का पर्याय बन चुका था, शांत-प्रेरक शहर बन गया. बीए पहले साल में प्रवेश लेने के बाद आर्ट्स ब्लॉक के 33 नम्बर कमरे में चुपचाप नज़र नीची किये, हमेशा अपने पाठ पर नज़र गढ़ाए रखने रखने वाला संजय कुमार आर्य उर्फ़ संजू आज का जैसा कतई नहीं लगता था कि ये शर्मीला लड़का किसी दिन उत्तराखंड के सबसे आधुनिक शहर नैनीताल की नगर महापालिका का अध्यक्ष बन जायेगा. मैंने कभी उसे मुझसे आँख मिलाकर बात करते हुए नहीं देखा, कोई सवाल पूछने पर वह धीरे-से ‘गुरूजी’ कहता फिर मौन साध लेता था; उसका प्रश्न मुझे ही अनुमान से उसके दिमाग पर चस्पा करना पड़ता था, जिसे वो आसानी से समझ भी लेता था. एक समय में उत्तराखंड के बसपा अध्यक्ष भूपाल सिंह भाकुनी का भी मुख्य शौक पढ़ाई बिलकुल नहीं था; हमेशा उसकी नज़र छात्रसंघ की गतिविधियों पर रहती थी और इस फ़िराक में रहता था कि किसी तरह सचिव या अध्यक्ष का पद हासिल कर सके. बाहर से देखने पर तिकड़मी लगता जरूर था, मगर मन से शांत और कवि-हृदय था, जिसका पता मुझे तब लगा जब कॉलेज के सबसे बदनाम मवाली लड़के गुड्डू खान को, उसका काम न करने के कारण मुझे उसने जान से मार डालने की धमकी दी थी, भूपाल भाकुनी ने ही उससे मालरोड के चौराहे पर सरे-आम मेरे पाँव पकड़वाकर माफ़ी मंगवाई थी; खास बात यह कि दूसरे दिन इस उपकार के बदले मेरा फेवर प्राप्त करने के लिए अपनी कविता लेकर भूपाल मेरे कमरे पर आ धमका था, इस निवेदन के साथ कि गुरूजी, ये मेरी अपनी मौलिक अभिव्यक्ति है, अगर आपको साहित्यिक मानदंडों पर फिट लगे तो इसे कॉलेज मैगज़ीन में छाप दीजिये, मगर इसे कल की घटना के साथ मत जोड़िये प्लीज. कविता सचमुच बहुत अच्छी थी, जिसे मैंने कविता-खंड की पहली रचना के रूप में स्थान दिया. शायद उसी अंक के गद्यखंड की पहली रचना गोविन्द पन्त ‘राजू’ की अद्भुत शिल्प और कथ्य वाली कहानी भी शामिल है. बहरहाल, भूपाल भाकुनी अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा के कारण किसी एक राजनीतिक दल के साथ टिका नहीं रहा, जिस दल की हवा देखी, उसी के अनुसार अपनी पहचान बनाता चला गया. मनोज जोशी ‘मंटू’ अपनी रंगमंचीय प्रतिभा के कारण मेरे नजदीक आया था. हमारे बाज़ार की सबसे जीवंत सांस्कृतिक संस्था ‘श्री रामसेवक सभा’ से वह जुड़ा था, शायद इन दिनों वही उसका अध्यक्ष है. गोल-मटोल, सीधा-सरल, हमेशा संगीत के रागों में खोया रहने वाला मंटू जब तीसेक साल की उम्र में नैनीताल नगर महा-पालिका के अध्यक्ष के रूप में मेरा बॉस बनकर मेरे मकान की समस्या सुलझाने की खुद ही पेशकश करने लगा, उसे देखते ही मुझे तत्काल अपनी समस्या सुलझ गयी महसूस होने लगी. शुरू में तो चेयरमैन की अपनी कुर्सी पर से खड़े होकर मुझे उस पर बैठने के लिए कहता और जब तक हाथ पकड़ कर बैठाओ नहीं, खड़ा ही रहता। कलकी घटना, जिसमें सम्राट चौधरी की बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में ताजपोशी की गयी, इतने सारे अतीत के प्रसंगों का मेरे दिमाग में हवा के झोंके की तरह कौंध आना आपको भले सायास या दुराग्रही लगे, यकीन मानिये, मुझे एक क्षण के लिए भी उन्हें अपने दिमाग में जबरदस्ती लाना नहीं पड़ा. अलबत्ता इन प्रसंगों के आधार पर अपने विद्यार्थियों को दी गई अपनी दीक्षा की सार्थकता महसूस हुई. लगा कि एक अध्यापक जो पढ़ाता है, जरूरी नहीं कि छात्र के द्वारा उसका वही पाठ ग्रहण किया जाय जो उसके शिक्षक का उद्देश्य है. दुनिया इतनी बहुरंगी है कि उसकी एक छवि को पकड़ने के लिए सूरज के सात रंग भी फीके महसूस होते हैं. वो शरारती और चुप बच्चे अचानक सूर्य की तरह एक अलग ही पोषणकारी शक्ति बिखेरने लगते हैं और हम भोंचक होकर सिर्फ देखते रह जाते हैं. पता नहीं, यह संसार कब किस करवट बदल जाए, इसीलिए कहा गया है, अनुमान का सहारा न लें, समय-विधाता पर भरोसा रखें वह जिस करवट भी अपना स्थान ग्रहण करेगा, उसका कोई-न-कोई उद्देश्य तो होगा ही. सारा ज्ञान-विज्ञान-अनुमान एक दिन धरा-का-धरा रह जाएगा मगर जो बचा रहेगा, वह होगा मनुष्य का अपना पुरुषार्थ, परिश्रम और मानवीय संभावनाओं के प्रति आदमी की आस्था. फक्कड़ कबीर और उन्हें पहली बार संसार तक पहुँचाने वाले कविगुरू रवीन्द्रनाथ ऐसे ही वक़्त पर बेतरह याद आते हैं, जिनसे मैंने जीवन-भर सीखा और फिर उसे ही अपने देश-विदेश के विद्यार्थियों तक पहुँचाया।










































