राष्ट्रीय
10 सितंबर को मनाई जा रही भारतरत्न पंत की जयंती : ग्रेनरी ऑफ इंडिया के रूप में प्रसिद्ध हुआ पंडित गोबिंद बल्लभ पंत का बसाया उत्तराखंड का तराई….
चन्द्रेक बिष्ट, नैनीताल। भारत रत्न पंडित गोविंद बल्लभ पंत की जयंती कल 10 सितंबर को पूरे देश में मनाई जायेगी। हिम पुत्र के नाम से पहचाने जाने वाले भारत रत्न गोबिंद बल्लभ पंत ने न केवल स्वतंत्रता आंदोलन में अहम भूमिका निभाई बल्कि उसके बाद पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान से भारत पहुंचे लोगों को बसाने में भी अपना अहम योगदान दिया। पंडित पंत के ही प्रयासों से अविभाजित उत्तर प्रदेश का तराई क्षेत्र न केवल आबाद हुआ बल्कि तराई की भूमि ने पहले ग्रेनरी ऑफ यूपी और बाद में ग्रेनरी ऑफ इंडिया यानी उत्तर प्रदेश और देश का अनाज गोदाम के रूप में अपनी पहचान बनाई। अगर पंत जी का तराई को बसाने का सपना नही होता तो उत्तराखंड के इस गुलदस्ते का न जाने क्या स्वरूप होता। हिमालय से अडिग इस महामानव का बचपन जैसे किवदंतियों से गुजरा हो। 10 सितंबर 1887 को अल्मोड़ा के खूंट गांव में जन्मे पंडित गोविंद बल्लभ पंत स्वतंत्रता सेनानी होने के साथ साथ एक कुशल अधिवक्ता और प्रशासक भी रहे। आजादी से पहले ही वह उत्तर प्रदेश संयुक्त प्रांत के मुख्यमंत्री व देश के पहले गृहमंत्री के रूप में अपनी काबिलियत दिखा चुके थे। आजादी के बाद देश बंटवारे की चुनौती उनके सामने थी। लेकिन पंत जी ने इस चुनौती को स्वीकार कर अपनी काबू का परिचय दिया, जो आज खुशहाल तराई हभारे सामने है। नैनीताल निवासी व जानेमाने इतिहासकार प्रो. अजय रावत का कहना है कि आजादी के बाद सबसे बड़ी समस्या बांग्लादेश समेत पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान से ट्रेनों में भरकर भारत आ रहे लोगों को बसाने की थी। तब तराई भाबर की जमीन दलदली थी, जिस कारण यह क्षेत्र बीमारियों के लिहाज से बेहद संवेदनशील था और यहां कोई बसना नहीं चाहता था। घने जंगलों में जंगली जानवरों का डर अलग बना रहता था। तब पंडित पंत यूनाईटेड प्रोविंस के मुख्यमंत्री थे। उनके ही प्रयासों से पहले पूर्वी व पश्चिमी पाकिस्तान से आने वाले शरणार्थियों को तराई भाबर में बसाया गया और उसके बाद पूर्वी उत्तर प्रदेश के। प्रो. रावत बताते हैं कि पंत तराई भाबर की भूमि को आबाद करने के साथ-साथ इस क्षेत्र को कृषि के क्षेत्र में विशेष पहचान दिलाना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने वर्ष 1945 में द्वितीय विश्व युद्ध खत्म होने के बाद बेरोजगार हो गए सैनिकों और अधिकारियों को तराई में कृषि कार्यों के लिए भूमि आवंटित कराई। पंत ने उन स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को भी तराई में बसाया जिनके पास तब कुछ भी नहीं था। इतिहासकार प्रो. रावत के मुताबिक विश्व युद्ध के बाद देश ही नहीं बल्कि दुनिया में अनाज की भारी कमी हो गई थी। इसे देखते हुए पंडित पंत ने कृषि की पढ़ाई कर कॉलेज और विश्वविद्यालयों से निकले बेरोजगार युवकों को भी तराई में कृषि कार्य के लिए भूमि आवंटित कराकर तराई की भूूमि को एडवांस एग्रीकल्चर एरिया के रूप में विकसित किया। आजादी के कुछ साल बाद ही तराई का क्षेत्र पहले ग्रेनरी ऑफ यूपी और बाद में ग्रेनरी ऑफ इंडिया के रूप में प्रसिद्ध हुआ। तब देश भर के विभिन्न प्रांतों को यहां से अनाज भेजा जाने लगा। यह पंडित पंत के ही प्रयास थे कि आज तराई भाबर खूब फल फूल रहा है। अन्न के भंडार के रूप में तराई न केवल उत्तराखंड की उदरपूर्ति कर रहा है बल्कि दूसरे प्रदेशों व दुनिया में अन्न देने का कार्य कर रहा है।
जब हुक्मरानो को पंत की पुस्तक फारेस्ट प्राब्लम इन कुमाऊं को ही प्रतिबंधित करना पड़ा
नैनीताल। इतिहासकार प्रो. अजय रावत बताते हैं कि आजादी से पूर्व अंग्रेज कृषि को अधिक और वनों को कम महत्व देते थे । मगर पंडित गोबिंद बल्लभ पंत ने इसके विपरीत कृषि के साथ साथ वनों को महत्व दिया। वह मानते थे कि यदि वन सुरक्षित रहेंगे तभी खेती भी सुरक्षित रहेगी। क्योंकि एक हेक्टेयर भूमि में खेती के लिए कम से कम छह हेक्टेयर जंगल का होना जरूरी होता है। वर्ष 1878 में पहला फारेस्ट एक्ट आया जिसमें वन प्रबंधन की बात कही तो गई थी लेकिन अंग्रेज कृषि वैज्ञानिक वाल्कर ने कहा था कि खेती ज्यादा महत्वपूर्ण है वन नहीं। इसे लेकर इंग्लैंड तक की संसद में बहस हुई और उसके बाद भी खेती को ज्यादा महत्व दिया जाने लगा लेकिन आजादी के बाद पंडित पंत एग्रीकल्चर एंड फारेस्ट्री कांसेप्ट लेकर आए और उन्होंने खेती के साथ साथ वनों को भी उतना ही महत्व दिया। प्रो. रावत बताते हैं कि पंडित गोविंद बल्लभ पंत ने वर्ष 1922 में एक किताब लिखी फारेस्ट प्राब्लम इन कुमाऊं। यह किताब अंग्रेजों की वन नीति के खिलाफ थी। पंत की इस किताब से अंग्रेज खासे भयभीत हो गए। इसके बाद उन्होंने इस किताब पर प्रतिबंध लगा दिया गया। पंत व नेहरू ने इसका जमकर विरोध किया। बाद में वर्ष 1980 में पंडित पंत की इस किताब को पुन: प्रकाशित किया गया। यह पुस्तक आज शोधकर्ताओं व कृषि वैज्ञानिकों के लिए महत्वपूर्ण दसतावेज साबित हुई है।




















































