राष्ट्रीय
दिल्ली जंतरमंतर काक्रोच-छात्र आंदोलन : आखिर भारतीय मीडिया से इतना आक्रोश क्यों…..
राजगोपाल सिंह वर्मा, दिल्ली। राजधानी दिल्ली के जंतर -मंतर पर जब प्रदर्शनकारी “गोदी मीडिया वापस जाओ” के नारे लगाते हैं, या उनसे हाथापाई करते हैं तो कुछ टीवी एंकर स्टूडियो में बड़ी मासूमियत से पूछते हैं, “हमसे इतनी नफरत क्यों?” जवाब बहुत सीधा है। क्योंकि देश के युवाओं का भविष्य दाँव पर लगा था और आप कैमरा बंद करके या उनकी अनदेखी कर बैठे थे! परीक्षा-पत्र लीक हुए, परीक्षाएँ रद्द हुईं, लाखों अभ्यर्थियों का समय और पैसा बर्बाद हुआ, विद्यार्थी निराशा में टूटते रहे, निराश-हताश बच्चे आत्महत्या करने लगे लेकिन मुख्यधारा के अनेक चैनलों के प्राइम टाइम पर क्या चल रहा था? हिंदू-मुस्लिम बहसें, पाकिस्तान, विपक्षी नेताओं के बयान और निरर्थक राजनीतिक तमाशे। जंतर-मंतर पर आंदोलन कई सप्ताह तक चला, मगर राष्ट्रीय मीडिया के बड़े हिस्से को वह दिखाई ही नहीं दिया। जब सोशल मीडिया और विदेशी मीडिया ने इसे भारत के युवाओं के गुस्से और परीक्षा-व्यवस्था के संकट के रूप में प्रमुखता से दिखाया, जब सोशल मीडिया पर लाखों लोगों ने सवाल उठाए और जब प्रदर्शनकारियों की भीड़ को अनदेखा करना असंभव हो गया, तब बड़े चैनलों की ओबी वैन पहुँचने लगीं। लेकिन वहाँ भी सवाल यह नहीं था कि पेपर किसने लीक किया, जिम्मेदारी किसकी है और विद्यार्थियों को न्याय कब मिलेगा। पूछा जाने लगा कि आंदोलन के पीछे कौन-सी पार्टी है, कौन-सा नेता आया, कौन-सा नारा लगा और बैरिकेड किसने छुआ! युवाओं का आरोप है कि कुछ पत्रकार मूल प्रश्न छोड़कर बातचीत को हिंदू-मुस्लिम, राष्ट्रवाद और विपक्षी षड्यंत्र की ओर मोड़ने लगे। कैमरा विद्यार्थियों की मांगों पर नहीं, धक्का-मुक्की पर टिक गया। अनशन, तपती गर्मी, महिलाओं के साथ कथित दुर्व्यवहार और पुलिस कार्रवाई पीछे रह गई; सनसनीखेज तस्वीरें आगे आ गईं। अब युवा पूछ रहे हैं: जब हम शांतिपूर्वक बैठे थे, तब आप कहाँ थे? जब आंदोलन बड़ा हो गया, तब हमारी आवाज सुनने आए हैं या हमें बदनाम करने? यह पूरे भारतीय मीडिया का विरोध नहीं है। अनेक स्वतंत्र पत्रकारों और कुछ समाचार संस्थानों ने ईमानदारी से रिपोर्टिंग की है। आक्रोश उन चैनलों से है जो सत्ता से सवाल पूछने के बजाय प्रदर्शनकारियों से उनकी देशभक्ति का प्रमाण मांगते हैं।पत्रकारों के साथ मारपीट या दुर्व्यवहार किसी भी परिस्थिति में उचित नहीं है। लेकिन मीडिया को भी समझना होगा कि जनता की स्मृति इतनी कमजोर नहीं है। माइक्रोफोन पर चैनल का लोगो लगा लेने से कोई विश्वसनीय नहीं हो जाता। विश्वसनीयता निष्पक्षता, साहस और सत्ता से सवाल पूछने से मिलती है। जंतर-मंतर पर केवल सरकार के विरुद्ध गुस्सा नहीं था। वहाँ उस मीडिया का भी हिसाब हो रहा है, जिसने वर्षों तक जनता की आवाज दबाई, मुद्दों को भटकाया और सत्ता की असुविधाजनक सच्चाइयों पर पर्दा डाला। मीडिया ने युवाओं को नहीं दिखाया। अब युवा मीडिया को आईना दिखा रहे थे।





























