उत्तराखण्ड
थोथा विकास पर रोता उत्तराखंड : कुर्सी को स्ट्रेचर बना कर दो किमी तक कंधों पर उठाकर गांव पहुंचाया युवक
सीएन, बड़कोट/देहरादून। उत्तराखंड राज्य का यह दुर्भाग्य ही कहा जाये कि कहीं सड़कें नही होने पर गंभीर रोगियों को डोली व कुर्सी के सहारे ग्रामीण मीलों ढो रहे हैं। कहीं सड़क हैं तो वह बदइंतजामी का शिकार हैं। कहीं दूषित पानी पीकर लोग मर रहे हैं। अस्पतालों में डाक्टर नही। पहाड़ के अस्पताल रेफरल सेंटर बन गये हैं। स्कूलों में शिक्षक नही। सरकारी दफ्तर बस चल रहे हैं। विकास कार्यों का जिम्मा बाहरी प्रदेशों से आये ठेकेदार व कम्पनियों के हवाले। जनप्रतिनिधि महज मीडिया तक सीमित है। सरकार थोथा विकास का ढिढोरा पीट अपनी गाल थपथपा रही है। सड़क सुविधा के अभाव में लोग अहसाय हैं। इसकी तस्वीर देहरादून के करनाली गांव से सामने आई। देहरादून के अस्पताल से उपचार कराने के बाद गांव लौट रहे एक बीमार युवक के चलने में असमर्थ होने पर परिजनों और ग्रामीणों ने कुर्सी को डंडों से बांधकर अस्थायी स्ट्रेचर बनाया और करीब दो किलोमीटर तक कंधों पर उठाकर गांव पहुंचाया। दुनकांणी तोक से करनाली गांव तक का यह सफर ग्रामीणों की वर्षों पुरानी सड़क की मांग और सरकारी व्यवस्थाओं की हकीकत बयां कर रहा है। राज्य दिव्यांग सलाहकार बोर्ड के सदस्य सुरेंद्र सिंह रावत ने बताया कि वह अपने बीमार भतीजे को देहरादून स्थित अस्पताल से उपचार कराने के बाद गांव लेकर लौट रहे थे। युवक की हालत ऐसी थी कि वह पैदल चलने में असमर्थ था। दुनकांणी तोक तक वाहन से पहुंचने के बाद आगे सड़क सुविधा नहीं होने के कारण परिजनों और ग्रामीणों के सामने उसे गांव तक पहुंचाने की बड़ी चुनौती खड़ी हो गई। इसके बाद ग्रामीणों ने कुर्सी को डंडों से बांधकर उसमें बीमार युवक को बैठाया और करीब दो किलोमीटर तक कंधों पर उठाकर करनाली गांव पहुंचाया। ग्रामीणों का कहना है कि करनाली गांव के लिए सड़क निर्माण की मांग लंबे समय से उठाई जा रही है, लेकिन वर्षों बीतने के बाद भी सड़क धरातल पर नहीं उतर सकी है। सड़क के अभाव में बीमार, बुजुर्ग और गर्भवती महिलाओं को सबसे अधिक परेशानी झेलनी पड़ती है। यह हाल केवल करनाली का नही बल्कि उत्तराखंड के दूरदराज के सैकड़ों गांवों का है। बीते 26 सालों में केन्द्र व राज्य सरकार बुनियादी सुविधाएं भी नही जुटा पाई। हद तो यह हो गई है कि विकास का थोथा ढिंढोरा पीटने के लिए सरकार ने हजारों करोड़ रूपये प्रचार में फूंक दिये।
























































